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राज ठाकरे वाला चुनावी दांव चल रहे चंद्रबाबू नायडू, कहीं डूब न जाए राजनीतिक नाव !

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: March 19, 2019, 3:48 PM IST
राज ठाकरे वाला चुनावी दांव चल रहे चंद्रबाबू नायडू, कहीं डूब न जाए राजनीतिक नाव !
फाइल फोटो

राजनीतिक रणनीतिकार और जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें 'बिहारी डकैत' कह दिया है. उन्होंने पीके पर आंध्र प्रदेश के लाखों वोटरों का नाम हटवाने की साजिश रचने का आरोप लगाया है.

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आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के एक विवादित बयान से नई चर्चा शुरू हो गई है. चर्चा ये कि क्या वे राजनीतिक हार के खौफ से घबरा गए हैं? क्या चंद्रबाबू जैसे बुद्धिजीवी माने जाने वाले नेता भी अपना बौद्धिक संतुलन खोकर राज ठाकरे जैसे नेताओं की कतार में खड़े हो गए हैं? क्या उनके जैसे संवेदनशील राजनेता भी नफरत की राजनीति के आसरे अपनी सियासत बढ़ाएंगे?

दरअसल उन्होंने राजनीतिक रणनीतिकार और जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें 'बिहारी डकैत' कह दिया है. उन्होंने पीके पर आंध्र प्रदेश के लाखों वोटरों का नाम हटवाने की साजिश रचने का आरोप लगाया है.



उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा, 'केसीआर राव आपराधिक राजनीति कर रहे हैं. वह कांग्रेस और टीडीपी (तेलुगु देशम पार्टी) के विधायकों को साधने की कोशिश कर रहे हैं. 'बिहारी डकैत' प्रशांत किशोर ने आंध्र प्रदेश के लाखों वोट हटा दिए. वह साइबर अपराध कर रहे हैं.'
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जाहिर है पीके पर ये टिप्पणी करते हुए चंद्रबाबू नायडू ने नस्लीय राजनीति के आसरे पूरे बिहारी समुदाय का अपमान किया है. उन्होंने वही बात की है जो आज तक उत्तर भारतीयों के नाम पर राज ठाकरे जैसे नेता करते रहे हैं.

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नवंबर 2008 में राज ठाकरे का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वे ऐसे केक पर चाकू चला रहे थे जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘भैया’ लिखा हुआ था. केक काटने के बाद राज ठाकरे बेहद खुश नजर आ रहे हैं. दरअसल महाराष्ट्र में यूपी, बिहार से आने वालों को भैया कहा जाता है.

वर्ष 2008 में राज ठाकरे ने 'नफरत का केक' काटा 


इस नफरत की राजनीति का क्या नतीजा रहा है, यह राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस को मिले वोटों से समझा जा सकता है. दिसंबर 2005 में राज ठाकरे ने शिव सेना छोड़ी थी और अपनी अलग पार्टी बनाई थी. 2009 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन कुल 4.6 फीसदी वोट ही मिले थे. एमएनएस ने मुंबई से तीन उम्मीदवार उतारे थे पर एक को भी जीत नहीं मिली.

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2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी ने एक भी सीट नहीं जीती थी. पार्टी ने 9 उम्मीदवार उतारे थे सबकी जमानत तक जब्त हो गई . इसके बाद के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भी, मनसे 250 सीटों में से केवल एक सीट जीत सकी.

हालत यह हो गई कि वर्ष 2019 का चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान भी करना पड़ गया. माना जा रहा है कि उन्हें उम्मीदवार भी नहीं मिल रहे और पार्टी से आम लोग भी नहीं जुड़ना चाह रहे हैं. जाहिर है यह राज ठाकरे की नफरत की राजनीति का ही नतीजा है.

देखा जाए तो चंद्रबाबू नायडू की भी यही गत होती जा रही है. तमाम सर्वे ये बता रहे हैं कि लोग उनकी राजनीति को पसंद नहीं कर रहे हैं और इस बार चंद्रबाबू नायडू की वापसी मुश्किल है. जाहिर है देश की जनता घृणा और विद्वेष की राजनीति नहीं चाहती.

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First published: March 19, 2019, 3:30 PM IST
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