लोकसभा चुनाव 2019: यूपी की तरह बिहार में कांग्रेस के लिए अकेले आसान नहीं है डगर !

1990 के दशक से पहले के दौर की बिहार की राजनीति पर गौर करें तो एक दो मौके को छोड़कर कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा है. लेकिन 1990 के बाद पिछड़ा उभार के दौर में कांग्रेस बिहार की राजनीति में लगातार पिछड़ती चली गई.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: February 13, 2019, 3:06 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019: यूपी की तरह बिहार में कांग्रेस के लिए अकेले आसान नहीं है डगर !
राहुल गांधी (फाइल फोटो)
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: February 13, 2019, 3:06 PM IST
कांग्रेस के विधायक अजीत शर्मा ने दावा किया कि उनकी पार्टी बिहार में आरजेडी के बराबर सीटों की हकदार है. उन्होंने कहा कि हम आरजेडी से अधिक नहीं बल्कि बराबरी का हिस्सा मांग रहे हैं और इस बात की जानकारी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को दे दी गई है. जाहिर है कांग्रेस विधायक भी उसी लाइन पर चल रहे हैं जो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद खींची है. वे बार-बार हर राज्य में 'फ्रंट फुट' पर खेलने की बात कह रहे हैं.

यूपी में इसकी शुरुआत भी कर दी है और महागठबंधन से अलग अकेले चुनाव मैदान में उतरने को तैयार हो गई है. लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस अपने दम पर बिहार में इतनी मजबूत है कि वह अकेले चुनाव लड़ने का जोखिम ले सकती है ?

1990 के दशक से पहले के दौर की बिहार की राजनीति पर गौर करें तो एक दो मौके को छोड़कर कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा है. लेकिन 1990 के बाद पिछड़ा उभार के दौर में कांग्रेस बिहार की राजनीति में लगातार पिछड़ती चली गई.



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1989 का भागलपुर दंगा और उसके बाद मंडल राजनीति के दौर में कांग्रेस अपना जनाधार लगातार खोती चली गई. हाल ये हो गया कि 1995 में उसे 989 में भागलपुर दंगे के बाद बिहार में कांग्रेस से मुस्लिम समुदाय छिटक गया. वहीं हिंदुओं में भी कांग्रेस की नीतियों को लेकर नाराजगी रही.

ऐसे में दोतरफा घिरी कांग्रेस की पैठ बिहारी राजनीति में कम होती चली गई. 1990 के दशक में जब मंडल राजनीति ने जोर पकड़ा तो कांग्रेस ऊहापोह में रही. हाल ये हो गया कि 1995 के चुनाव में कांग्रेस मात्र 29 सीटों पर सिमट गई. बीजेपी इन चुनावों में 41 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनने में सफल हुई.

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आरजेडी की बैशाखी पकड़े कांग्रेस का जनाधार घटता गया और वह लगातार आरजेडी में शिफ्ट होता गया. बदले दौर की राजनीति में कांग्रेस के वोट बैंक(मुस्लिम-दलित-यादव) के आसरे आरजेडी इतनी बढ़ गई कि कांग्रेस का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया.

2000 में वह 23, 2005 में 9 और 2010 में महज 5 सीटें ही जीत पाई. इस बीच बिहार के जनमानस में भी यह छवि बनी कि आरजेडी और कांग्रेस एक ही हैं. लालू यादव जैसे माहिर राजनीतिज्ञ ने कांग्रेस के वोट बैंक को पूरी तरह अपने कब्जे में कर लिया और कांग्रेस लगातार बिहार की राजनीति में पिछड़ती चली गई.

हालांकि 2005 के बाद जेडीयू-बीजेपी ने दलित-पिछड़ा और सवर्णों के साथ नया राजनीतिक समीकरण बनाया और कांग्रेस का सवर्ण कोर वोट भी धीरे-धीरे बीजेपी में शिफ्ट हो गया. हालांकि 2015 में नीतीश कुमार और लालू यादव के सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया जिसमें कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं.

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लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि सवर्णों ने फिर भी कांग्रेस का पूरा साथ नहीं दिया और आरजेडी-जेडीयू के साथ पिछड़े-दलित और मुस्लिम लगभग इंटैक्ट रहे. हालांकि अतिपिछड़ा वोट अधिकतर बीजेपी के खाते में गया. लेकिन कांग्रेस के लिए यहां भी कुछ नहीं था.

आरजेडी से नजदीकियों ने कांग्रेस का इतना बड़ा नुकसान कर दिया जिसका अनुमान शायद कांग्रेस नेताओं को भी नहीं था. 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस तो केंद्रीय राजनीति से भी सिमटने लगी. ऐसे में बिहार में वह आरजेडी के सहारे ही रही.

हालांकि अब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत से उत्साहित कांग्रेस लगातार फ्रंट फुट पर खेलने की बात कर रही है. इसी आधार पर वह आरजेडी से बराबरी का दर्जा चाह रही है. ठीक उसी तर्ज पर जैसे जेडीयू-बीजेपी के बीच 17-17 सीटों पर समझौता हुआ है.

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लेकिन सवाल ये है कि अगर आरजेडी बराबरी का हक देने को तैयार नहीं हुई तो कांग्रेस अकेले दम पर अभी भी अपना वोट बैंक तैयार नहीं कर पाई है. क्योंकि कांग्रेस के कोर वोटर रहे मुस्लिम अभी भी बिहार में आरजेडी के साथ खड़े हैं, वहीं यादवों में तो किसी भी तरह का बिखराव नहीं दिख रहा. वहीं सवर्ण वोटर अब भी बीजेपी-जेडीयू गठबंधन में अपना विश्वास जता रही है.

बीते 3 फरवरी को तीन दशक के बाद बिहार में हुई कांग्रेस की रैली को लेकर कांग्रेस जितनी आशान्वित थी उतना रिस्पॉन्स भी नहीं मिला. इतना ही नहीं आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे ने भी बीते 6 फरवरी को दो टूक कह दिया था कि पार्टी 20 से 22 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगी.

जाहिर है ऐसे में कांग्रेस कांग्रेस के लिए अकेले आरजेडी से विक्षुब्ध महागठबंधन के घटक दलों के साथ चुनाव मैदान में जाती भी है तो डगर आसान नहीं है. क्योंकि न तो कांग्रेस के पास नीतीश या लालू यादव जैसा चेहरा है और न ही अब वह जनाधार ही बचा है जिसके दम पर कांग्रेस चुनाव लड़ने का जोखिम उठा सके.

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