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नरसिंह राव की राह पर कांग्रेस, सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण की मांग

नरसिंह राव की राह पर कांग्रेस, सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण की मांग

पटना में सवर्णों के कई संगठन ने आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट में हुए बदलाव के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया

पटना में सवर्णों के कई संगठन ने आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट में हुए बदलाव के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया

सवर्ण आरक्षण को कांग्रेस के समर्थन से संबंधित एक खबर को पार्टी के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी री-ट्वीट करते हैं और उसके बाद बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अनिल शर्मा एलान करते हैं कि उकी पार्टी उच्च जातियों के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग करती है.

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    एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसे पलटने के लिए लाए गए संशोधन विधेयक से सवर्णों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रति जो गुस्सा है उसे भुनाने के लिए कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव की राह पकड़ी है. पार्टी ने गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की है.

    सवर्ण आरक्षण को कांग्रेस के समर्थन से संबंधित एक खबर को पार्टी के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी के री-ट्वीट करने के बाद बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अनिल शर्मा ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी उच्च जातियों के गरीबों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग करती है.

    दरअसल ये सवर्ण संगठनों के भारत बंद का नतीजा है. बिहार में इसका व्यापक असर हुआ. निष्कर्ष ये निकाला गया कि सवर्णों में बीजेपी के प्रति भारी गुस्सा है. लेकिन लालू यादव के शासनकाल की याद अभी भी इतनी कड़वी है कि उच्च जातियां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ नहीं जा सकती .

    महागठबंधन में शामिल होने के नाते सोची समझी रणनीति के तहत ये बीड़ा उठाया कांग्रेस ने. सामाजिक समीकरणों के लिहाज से ये पहले से तय है कि महागठबंधन सीट शेयरिंग में भी सवर्णों का कोटा कांग्रेस के खाते से पूरा करेगा.

    लेकिन कांग्रेस का ये जुमला नया नहीं है. 1991 में मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के ठीक बाद पीएम पीवी नरसिंह राव ने भी गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया था लेकिन 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया.

    बीजेपी ने अपने वोट बैंक को खुश करने के लिए 2003 में एक मंत्री समूह का गठन किया लेकिन कोई प्रगति नहीं हो सकी और वाजपेयी सरकार 2004 का चुनाव हार गई. फिर 2006 में कांग्रेस ने भी ऐसी ही कमेटी बनाई जिसे आर्थिक रूप से पिछड़े उन वर्गों को अध्ययन करना था जो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के दायरे में नहीं आते हैं. लेकिन इस पर भी कोई प्रगति नहीं हुई.

    इस लिहाज से कांग्रेस की ये मांग नई नहीं है. 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले और अगस्त के पहले हफ्ते में उसे पलटने के लिए केंद्र सरकार की ओर से संशोधन विधेयक पारित कराने के बीच न सिर्फ दलितों में असंंतोष उभरा बल्कि सवर्णों में भी नाराजगी फैली.

    2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी को किसी हिसाब से नुकसान पहुंचे इसका गणित सेट कर रहे विपक्ष के पास इससे बेहतर मौका नहीं है. तो लगे हाथ कांग्रेस ने 10 परसेंट का पासा फेंक दिया.

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