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बिहार: क्या कांग्रेस आने वाले समय में RJD से अलग होने की योजना बना रही है?

News18 Bihar
Updated: November 30, 2019, 12:13 PM IST
बिहार: क्या कांग्रेस आने वाले समय में RJD से अलग होने की योजना बना रही है?
राहुल गांधी

कांग्रेस अभी खुलकर मैदान में आरजेडी के खिलाफ तो नहीं आ रही है, लेकिन उसके हाथों अपना वोटबैंक गंवा चुकने के बाद खुद को धीरे-धीरे ही सही तैयार करने की कवायद भी कर रही है.

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  • Last Updated: November 30, 2019, 12:13 PM IST
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पटना. बिहार में 1990 का दशक सत्ता-समाज में बदलाव का दौर माना जाता है. इस कालखंड को पिछड़े और दलित समुदाय की महत्वाकांक्षाओं को नया आकाश मिलने का समय भी कहा जाता है. बिहार की राजनीति (Politics of Bihar) में भी इसका सीधा असर दिखा. पिछड़ा उभार के इस दौर में सामाजिक-राजनीतिक हालात ऐसे बने कि आजादी के बाद से अधिकतर समय सत्ता में काबिज रही कांग्रेस धीरे-धीरे प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य से गायब होती चली गई.

जनता दल के बिखराव के बाद पहले राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और फिर जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने इस अवधि में अपना काफी विस्तार किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि बदलते वक्त के साथ लोगों की आकांक्षाओं को पहचानने में शायद कांग्रेस (Congress) चूक गई.

दरअसल 1990 के दशक में जब मंडल राजनीति ने जोर पकड़ा तो कांग्रेस ऊहापोह में रही. न तो वह सवर्णों का खुलकर साथ दे पाई और न ही पिछड़े और दलित समुदाय को साध पाई. अब जब 2019 के लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक जमीन पर कई कारणों से राजद कमजोर दिख रही है तो इसे अपने लिए अवसर मान एक बार फिर कांग्रेस अपने अस्तित्व के उभार की कोशिश में लग गई है.

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इसको लेकर धीरे-धीरे ही सही, कांग्रेस ने कवायद शुरू कर दी है. पार्टी ने इसके लिए बीते कुछ दिनों में कुछ झलक भी दिखाई है. हालांकि अभी भी वह खुलकर अकेले मैदान में नहीं आई है, लेकिन ऐसा लगने लगा है कि अपने वोट बैंक को लेकर अहम रणनीतिक बदलाव के बारे में जरूर सोच रही है.

आरजेडी से नाखुशी
सबसे पहला संकेत तब मिला जब लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद उपचुनाव के दौरान महागठबंधन में सीटों के बंटवारे पर पेंच फंस गया. आरजेडी ने बिना अपने सहयोगियों से बात किए पांच विधान सभा सीटों में से चार सीटों दरौंदा, सिमरी बख्तियारपुर, बेलहर और नाथनगर से अपने उम्मीदवारों को पार्टी का सिंबल दे दिया. इससे नाराज प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने सभी पांचों सीटों पर लड़ने का ऐलान किया. हालांकि केंद्रीय नेतृत्व के दखल के बाद कांग्रेस समस्तीपुर लोकसभा सीट और किशनगंज विधानसभा सीट लेकर ही मान गई. हालांकि दोनों पार्टियों के बीच दूरी बढ़ गई और कार्यकर्ताओं ने एक दूसरे का सहयोग नहीं किया. परिणाम यह रहा कि कांग्रेस दोनों ही सीटें हार गई.

इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान भी कांग्रेस और आरजेडी में सुपौल सीट पर काफी तनातनी दिखी थी. तब राजद पर कांग्रेस कैंडिडेट रंजीत रंजन को हराने की साजिश का आरोप लगाया गया था. इसके अलावा कई अन्य सीटों पर भी कांग्रेस ने आरजेडी कार्यकर्ताओं के असहयोग की बात कही थी. जाहिर है कांग्रेस पार्टी और आरजेडी के बीच हितों का टकराव हो रहा है और कांग्रेस इससे खुद को उपेक्षित महसूस करने लगी है.
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कांग्रेस-कुशवाहा दोस्ती
विधानसभा उपचुनाव में जिस तरह से आरजेडी ने न सिर्फ कांग्रेस की अनदेखी की बल्कि उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को पूछा तक नहीं. दूसरी हकीकत ये है कि कांग्रेस ने कुशवाहा से अपनी दोस्ती बरकरार रखी. बीते जून में जब चमकी बुखार से बच्चों की हो रही मौतों से आहत कुशवाहा ने मुजफ्फरपुर से पटना तक का पैदल मार्च  निकाला तो कांग्रेस ने उनका साथ दिया.

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी ने जब महागठबंधन में आने का फैसला किया था तो उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रम के जरिए ही अपनी एंट्री की थी. तभी से माना जा रहा है कि कुशवाहा कांग्रेस से नजदीकी रखना चाहते हैं न कि आरजेडी से. (फाइल फोटो)


नवंबर के आखिरी हफ्ते में जब बेरोजगारी और महंगाई समेत कई बड़े मुद्दों को लेकर बिहार कांग्रेस 'जनवेदना मार्च' से सरकार को घेरने उतरी तो उपेंद्र कुशवाहा ने खुलकर समर्थन किया. वहीं, दूसरी ओर आरजेडी ने इस मार्च को अपना समर्थन नहीं दिया.

मांझी से बढ़ी नजदीकी
हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष और बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी ने भी बीते उपचुनाव में नाथनगर से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा की लेकिन, राजद ने उनकी भी बात को दरकिनार कर दिया और अपना उम्मीदवार उतार दिया. इससे मांझी आहत हो गए और राजद से काफी हद तक दूर रहने की कोशिश करते हैं. हालांकि कांग्रेस इसे अपने लिए मौके के तौर पर देखती है और मांझी से अपनी नजदीकी बढ़ाने में लगी है.

जीतन राम मांझी ने लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद कई बार तेजस्वी यादव को अनुभवहीन बताया है. इसके बाद कांग्रेस नेताओं से मांझी की नजदीकी की खबरें भी सामने आती रही हैं. (फाइल फोटो)


दरअसल मांझी का महत्व बिहार के महादलित वोटों से जोड़कर देखा जाता है. इस समुदाय में करीब 22 जातियां आती हैं और बिहार की आबादी में इसका हिस्सा करीब 18 से 20 फीसदी है. यह वही वोट बैंक है जिसके दम पर 1990 से पहले कांग्रेस बिहार की सत्ता पर हमेशा सुगमता से काबिज रहने में सफल रही थी. अगर कांग्रेस जीतन राम मांझी के बहाने महादलित वोटों में फिर से अपनी पैठ बनाने में कामयाब होते हैं तो आने वाले समय में बिहार की राजनीति को एक नई दिशा मिल सकती है.

सवर्ण को बनाया अध्यक्ष
बिहार में पिछड़ी राजनीति के परवान चढ़ने के साथ ही कांग्रेस ने अभिनव प्रयोग किया और अपनी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा को बना दिया. वह सवर्ण समुदाय में ब्राह्मण जाति से हैं और माना जाता है कि बीजेपी से पहले इस समुदाय का वोट कांग्रेस को ही जाता रहा है. जाहिर है कांग्रेस ने यह संकेत भी देने की कोशिश की थी कि सवर्ण समुदाय उससे जुड़ें. इसका नतीजा भी दिखा और वर्ष 2015 के चुनाव में कांग्रेस के 27 विधायक चुने गए जिनमें सवर्णों की संख्या अधिक है.

ओवैसी का डर
किशनगंज में हुए विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने जहां आरजेडी जैसी पार्टियों के कान खड़े कर दिए हैं, वहीं कांग्रेस के लिए खतरे के संकेत हैं. दरअसल यहां ओवैसी की AIMIM ने जीत हासिल की और हार कांग्रेस को मिली. जाहिर है यह कांग्रेस के वोट बैंक में बड़ी सेंध मानी जा रही है. ऐसे में कांग्रेस की ओर से फिर से इस बात की समीक्षा हो रही है कि क्या वजह है जो मुस्लिम वोटर उससे नाराज हो रहे हैं.

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने किशनगंज में जीत हासिल कर कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. (फाइल फोटो)


दरअसल 1989 के भागलपुर दंगे से पहले मुस्लिम कांग्रेस के लिए ही वोट करते थे. बाद के दौर में लालू यादव ने अपना 'माय' समीकरण बनाया और मुस्लिम वोटरों में अपनी गहरी पैठ बना ली. इसके बाद कांग्रेस ने अपने इस वोट बैंक को बचाने के लिए आरजेडी से गठजोड़ कर लिया. हालांकि हाल के दिनों में अली अशरफ फातमी की आरजेडी से और शकील अहमद की कांग्रेस से नाराजगी की वजह से दोनों ही पार्टियों की छवि पर गहरा असर किया.

बहरहाल अब कांग्रेस आरजेडी की इस 'मुस्लिमों की उपेक्षा' की छवि को अपने पक्ष में करने की कवायद में लग गई है. माना जा रहा है शकील अहमद फिर से कांग्रेस में वापस आ जाएंगे. जाहिर है कांग्रेस अभी खुलकर मैदान में आरजेडी के खिलाफ तो नहीं है, लेकिन आरजेडी के हाथों अपना वोटबैंक गंवा चुकी कांग्रेस खुद को धीरे-धीरे ही सही तैयार भी कर रही है.

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First published: November 30, 2019, 11:43 AM IST
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