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बिहार: कोरोना की दूसरी लहर में टूटा गांव का सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना

कोरोना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया है.

कोरोना के कारण रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर यानि सड़क, आवास, सिंचाई और निर्माण संबंधी परियोजनाओं की धीमी रफ्तार ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डाला है. हालांकि सरकार कोरोना काल में ग्रामीणों की समस्या से अवगत है और परेशानी को दूर करने का प्रयास कर रही है.

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    रजनीश चंद्र.

    कोरोना ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया है. रोजी-रोटी का जुगाड़ करने में ग्रामीणों को कठिनाई हो रही है. किसानों को अपनी उपज को बाजार तक पहुंचाने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. कोरोना की पहली लहर में गांव उतने प्रभावित नहीं हुए थे, लेकिन दूसरी लहर में ग्रामीण जनजीवन भी खासा प्रभावित हुआ. इसके असर से सामाजिक व आर्थिक ताना-बाना भी अछूता नहीं रह सका. दरअसल जागरुकता की कमी, कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था, मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव के कारण कोरोना की दूसरी लहर में गांवों में भी मौत हुई है जिससे खेती और दूसरी आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुई है.

    उचित कीमत का संकट
    गांवों में लोग साधारणतया खेती, पशुपालन या मजदूरी कर के जीवन गुजर-बसर करते हैं. सब्जी, फल, डेयरी उत्पाद का बाजार प्रभावित हो गया है. व्यापारी गांव आ नहीं रहे हैं. किसान खुद अपने उत्पाद को बाजार तक ले नहीं जा पा रहे. नतीजतन उनकी उपज का उचित कीमत नहीं मिल पा रहा है. बड़े पैमाने पर शादी ब्याह, सामाजिक धार्मिक कार्यों पर भी रोक लगी है. होटल, रेस्तरां, मिठाई या खान-पान की दुकान भी बंद है. इससे दूध और दूसरे डेयरी उत्पाद, सब्जी की मांग भी कम हो गयी है. जानकारों के अनुसार कुल दूध उत्पादन का 60 प्रतिशत इस्तेमाल होटलों, मिठाई या चाय की दुकानों में हैं जबकि 40 प्रतिशत इस्तेमाल सरकारी, सहकारी या निजी कंपनियां प्रोसेसिंग के लिए करती हैं. कोरोना की दूसरी लहर ने उन किसानों की हालत और खराब कर दी है जो भूमिहीन हैं. सब्जी उपजाने वाले किसानों का हाल भी बुरा है.

    मुजफ्फरपुर की बात करें तो यहां करीब पचास हजार किसान सब्जी की खेती करते हैं. करीब 250 एकड़ में सब्जी की खेती होती हैं. हर महीने एक से सवा करोड़ का उत्पादन होता है. यहां की सब्जी दरभंगा, मधुबनी, मधेपुरा, वैशाली, सीतामढ़ी और शिवहर और झारखंड के भी कई जिलों में जाती है. जिले के कई गांवों में असम, नेपाल और पश्चिम बंगाल तक के व्यापारी टमाटर की खरीद के लिए पहुंचते थे. कोरोना के कारण इस बार वे नहीं आ रहे हैं. इस वजह से दो माह में करीब 80 लाख से एक करोड़ का नुकसान हुआ है. अगर बात समस्तीपुर की करें तो वहां के भी छोटे-बड़े 10 हजार से अधिक किसान उचित कीमत का संकट झेल रहे हैं. ये तो चंद उदाहरण है. कमोबेश हर जिले में ऐसी ही स्थिति है. मोटे अनाज जैसे गेहूं-चावल, मक्का,चना उपजाने वाले किसान भी बेहाल हैं. फसल खलिहान में तैयार पड़ी है. यहां भी बाजार का संकट है. स्टोरेज के अभाव में कम कीमत पर किसान उपज को बेच रहे हैं. बाहर नहीं भेजे जाने के कारण कीमत में गिरावट आयी है.

    परियोजनाओं की रफ्तार धीमी 

    कोरोना के कारण रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर यानि सड़क, आवास, सिंचाई और निर्माण संबंधी परियोजनाओं की धीमी रफ्तार ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डाला है. जानकारों के अनुसार ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती का हिस्सा 40 प्रतिशत ही है. शेष हिस्सा गैर कृषि कार्यों का है. स्पष्ट है इनमें परियोजनाओं या फिर अन्य स्रोतों से प्राप्त धनराशि ही प्रमुख है. वैसे भी अप्रैल से जून तक गांवों में खेती का काम गौण ही होता है. लोग रोजी-रोटी के लिए साधारणतया मजदूरी पर निर्भर रहते हैं. लेकिन कोरोना काल में निर्माण का काम धीमा पड़ गया है जिससे पैसे का प्रवाह प्रभावित हुआ है. कोरोना की दूसरी लहर जितनी लंबी होगी, किसानों-खेतिहरों और मजदूरों की आमदनी और क्रय शक्ति भी उसी अनुपात में कमजोर होती जाएगी.

    सरकार की कोशिश
    हालांकि सरकार कोरोना काल में ग्रामीणों की समस्या से अवगत है और उनकी परेशानी को दूर करने का प्रयास कर रही है. मनरेगा के जरिए गांव में लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान कर रही है. बाहर से लौटे लोगों को गरीब कल्याण रोजगार अभियान के तहत भी कम से कम 125 दिनों तक रोजगार देने की व्यवस्था की जा रही है. वहीं कामगारों की पिछली बार की तरह ही स्किल मैपिंग कराई जा रही है ताकि उनकी क्षमता का सही इस्तेमाल हो सके और उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार मुहैया कराया जा सके. प्रखंड स्तर पर सामुदायिक किचन की व्यवस्था की गयी है ताकि लोगों को आसानी से भोजन मिल सके लेकिन आवश्यकता इस बात की है सरकार की योजना का क्रियान्वयन और बेहतर ढंग से हो, ताकि जिनके लिए ये योजनाओं बनी है. उसका लाभ उन तक अवश्य पहुंचे.

    (ये लेखक के निजी विचार हैं.)