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बिहार में भ्रष्टाचार का खुला खेल, सार्वजनिक उपक्रम के संस्थानों में सामने आई बड़ी गड़बड़ी

74 में से सिर्फ 12 निगमों और बोर्डों ने दिया खर्च का ब्यौरा.

74 में से सिर्फ 12 निगमों और बोर्डों ने दिया खर्च का ब्यौरा.

भले बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने भ्रष्टाचार (Corruption) के मामले में जीरो टॉलरेंस (Zero Tolerance) की नीति अपना रखी है, लेकिन राज्‍य के 62 निगम और बोर्डों में भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा है.

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पटना. बिहार की सत्‍ता में सुशासन की वह सरकार काबिज है जिसके मुखिया नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने भ्रष्टाचार (Corruption) के मामले में जीरो टॉलरेंस (Zero Tolerance) की नीति अपना रखी है. लेकिन आज हम आपके सामने बिहार में भ्रष्टाचार की ऐसी गाथा बताने करने जा रहे हैं, जिसकी जद में राजनेता से लेकर नौकरशाह हैं. बिहार में लोकसेवा के नाम पर निगम और बोर्डों की स्थापना कर दी गई, लेकिन इनमें अधिकांश पर काबिज लोगों ने साल दर साल नियमों को ताक पर रखकर उसे दूधारू गाय के रूप इस्तेमाल किया है. न्‍यूज़ 18 की पड़ताल में जो खुलासा हुआ है उससे ना केवल कई सवाल खड़े किए हैं बल्कि खलबली मच गई है. आर्थिक मामलों के जानकार नवल किशोर चौधरी (Naval Kishore Chaudhary) जहां सिस्टम के भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे होने का आरोप लगा रहे हैं, तो वहीं विधानसभा की कमिटी ने मामले को गंभीर बताते हुए इसकी जांच का भरोसा दिलाया है.

चल रहा है भ्रष्‍टाचार का बड़ा खेल
बिहार के सार्वजनिक उपक्रमों में सालों से वितिय अऩियमितता का बड़ा खेल चल रहा है. खेल भी ऐसा जिस पर शायद किसी का नियंत्रण या वश नहीं है. बिहार में सार्वजनिक उपक्रम के तहत 74 निगम और बोर्ड संचालित हैं. सरकार इन संस्थानों को हर साल राशि आवंटित करती है, ताकि उनका बेहतर ढ़ग से संचालन हो सके. नियमानुसार सभी बोर्डों और निगमों को हर साल अपना वर्षिक प्रतिवेदन राज्य विधायिका को देना अऩिवार्य है, जो कि पारदर्शिता के लिए जरूरी है. बिहार में महज में 12 से अधिक निगम और बोर्डो ने ही इस तरह की रिपोर्ट बिहार विधानसभा में सौंपी है. जबकि 62 निगम और बोर्डों ने अपने स्थापना काल से लेकर आज तक वार्षिक रिपोर्ट सौंपी ही नहीं है. हैरानी की बात तो यह है कि इसके बाद भी सरकार हर वितिय वर्ष में इन निगमों और बोर्डो को राशि का आवंटन करती रही है.

bihar
62 निगम और बोर्डों ने अपनी स्थापना से लेकर आज तक वार्षिक रिपोर्ट नहीं सौंपी.


एक नजर...
निगम/ बोर्ड                                                        लंबित अवधि(वार्षिक प्रतिवेदन)
बिहार पुलिस भवन निर्माण निगम लिमिटेड                 5 साल
बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद                          11 साल
बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड                    6 साल
बिहार राज्य पाठय पुस्तक प्रकाशन लिमिटेड             11 साल
बिहार राज्य बीज निगम लिमिटेड                             17 साल
बिहार राज्य पिछड़ा वर्ग वित एवं विकास निगम          19 साल
बिहार खाद्ध एवं असैनिक आपूर्ति निगम लिमिटेड       23 साल
बिाहर राज्य पथ परिवहन निगम                               11 साल
बिहार राज्य खनिज विकास निगम लिमिटेड               16 साल
बिहार राज्य मत्स्य विकास निगम लिमिटेड                 24 साल
बिहार राज्य चीनी निगम लिमिटेड                             32 साल
बिहारराज्य वित्तिीय निगम                                        5 साल
बिहारराज्य पर्यटन विकास निगम                             13 साल

समिति ने किया जांच का वादा
निगम और बोर्डों के नामों की फेहरिस्त लंबी है. आरटीआई कार्यकर्ता शिवप्रकाश रा्य की मानें तो उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जो जानाकरी मांगी है उसमें कई आयोग के नाम भी शामिल हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि खुद सूचना आयोग ने भी 2015-16 के बाद कोई वार्षिक प्रतिवेदन रिपोर्ट विधानसभा में जमा नहीं की है. आर्थिक मामलों के जानकार प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी इसे वितिय अऩियमितता का बड़ा मामला बता रहे हैं. उधर न्‍यूज़ 18 ने जब विधानसभा की सार्वजनिक उपमक्रम समिति के सामने यह मामला लाया तो तब समिति ने मामले को गंभीर मानते हुए जांच करने और कार्रवाई की बात कही है.समिति के सभापति हरिनारायण सिंह ने कहा कि मामले की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की अनुशंसा की जाएगी.

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