धोती-कुर्ता-गमछा और गंवई अंदाज, इन 5 बातों के लिए सदा यादों में जिंदा रहेंगे 'रघुवंश बाबू'
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धोती-कुर्ता-गमछा और गंवई अंदाज, इन 5 बातों के लिए सदा यादों में जिंदा रहेंगे 'रघुवंश बाबू'
रघुवंश प्रसाद सिंह का निधन (फाइल फोटो)

रघुवंश बाबू (Raghuvansh Prasad Singh) का शुद्ध देसी अंदाज, मुद्दों पर बेबाक राय और बेदाग छवि लोगों को सदा आकर्षित करती थी. लालू यादव (Lalu Yadav) के साथ रहकर भी उन पर कभी कोई आरोप नहीं लगा.

  • News18 Bihar
  • Last Updated: September 13, 2020, 7:07 PM IST
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पटना. विश्व के प्रथम लोकतंत्र वैशाली के लाल पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह (Raghuvansh Prasad Singh) का दिल्ली के एम्स में रविवार को निधन (Demise) हो गया. राजनेता, समाजसेवी से लेकर आम लोग उन्हें अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि दे रहे हैं. इस सबके बीच कुछ खास बात थी, जिसके चलते रघुवंश बाबू हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगे. रघुवंश बाबू का वो गंवई अंदाज लोग भुलाये नहीं भूल पाएंगे.

देसी अंदाज को बनाई पहचान
रघुवंश प्रसाद सिंह ने अपने तीन दशक से ज्यादा के सियासी सफर में कभी अपने देसी अंदाज को नहीं बदला. उन्होंने हमेशा जीवन की सादगी को पंसद किया. धोती, कुर्ता और गमछा यही उनकी पहचान थी. जब भी लोग उनसे मिलने घर जाते थे वे धोती और बनियान में नजर आते थे. ठंड के दिनों में बंडी और शॉल साथ रहता था.


रघुवंश बाबू हर मुद्दे पर बेबाकी से अपनी राय रखते थे. वो भी बिलकुल ठेठ गंवई अंदाज में. उनकी बात करने की यही शैली लोगों को आकर्षित करती थी.



इसलिए कहलाए 'मनरेगा मैन'
वे मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार में 2004 से 2009 तक केंद्रीय ग्रामीण विकास कार्य मंत्री रहे. इस दौरान उनके कार्यों की खूब चर्चा हुई. खास तौर पर देश में मनरेगा को लागू कराने में उनकी बड़ी भूमिका रही. मनरेगा के तहत ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को गांव में रोजगार के अवसर प्रदान करना था. इसे लागू कराने के लिए रघुवंश बाबू ने पूरी ताकत झोंक दी. इसी योजना की वजह से उन्हें 'मनरेगा मैन' भी कहा जाने लगा.

ईमानदार और बेदाग छवि
रघुवंश प्रसाद सिंह अपनी पार्टी और कार्यों को लेकर हमेशा ईमानदार रहे. उनके कार्यकाल की सराहना पीएम मोदी समेत बीजेपी और दूसरे दलों नेता भी करते थे. जहां आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद चारा घोटाले में सजायाफ्ता हैं, वहीं रघुवंश बाबू उनके साथ रहकर भी बेदाग रहे.

सियासत में परिवारवाद से दूर रहे
आमतौर पर ऐसा देखा जाता है कि राजनीति में अक्सर राजनेता अपने परिवार, पुत्र-पुत्री आदि को किसी न किसी तरीके से लाभ पहुंचाने के लिए प्रयास करते हैं. लेकिन जानकारों के अनुसार रघुवंश प्रसाद सिंह ने कभी भी अपने दोनों पुत्रों या बेटी के लिए किसी सीट या किसी राजनीतिक लाभ की मांग नहीं की. यहीं नहीं जब लालू यादव जेल जाने वाले थे और बिहार का मुख्यमंत्री कौन हो, इस पर चर्चा हो रही थी तब भी रघुवंश बाबू ने अपना नाम आगे नहीं किया. यूपीए-2 की सरकार में उन्होंने मंत्री पद के ऑफर को ठुकरा दिया.

समाजवाद के प्रखर नेता
भले ही आज कई नेता अपने आप को असली समाजवादी बताते हों, लेकिन रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे समाजवादी नेता उनके समकालीन में कम ही नजर आते हैं. रघुवंश बाबू सही मायने में कर्पूरी ठाकुर को अपना नेता मानते थे और उनके सिद्धांतों पर चलते थे. रघुवंश बाबू से मिलना, उनके सामने अपनी बात रखना, उनसे कुछ भी पूछ लेना बहुत ही सहज था. उन्हें अधिकांश लोग उनके स्वभाव की वजह से रघुवंश बाबू बुलाते थे.

कोरोना संक्रमण के बाद दिल्ली एम्स में कराया गया था भर्ती
बताते चलें कि कोरोना से संक्रमित होने के बाद बीते 4 अगस्त को रघुवंश प्रसाद सिंह को इलाज के लिए दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया था. उसके बाद से ही उनकी तबीयत खराब चल रही थी. हालांकि बीच में उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ था, लेकिन इस हफ्ते उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर रखा गया था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी.
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