बिहार विधानसभा चुनाव के बीच उभरी चंद्रशेखर आजाद की जाति की चर्चा

यह तस्वीर रुड़की में लगी चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति की है. आजाद की एक मूर्ति 2019 में फारबिसगंज में भी लगाई गई है, जिसपर उनका नाम बताया गया है - चंद्रशेखर तिवारी आजाद.
यह तस्वीर रुड़की में लगी चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति की है. आजाद की एक मूर्ति 2019 में फारबिसगंज में भी लगाई गई है, जिसपर उनका नाम बताया गया है - चंद्रशेखर तिवारी आजाद.

फारबिसगंज के पोस्ट ऑफिस चौराहे पर लगी चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति का परिचय कुछ इस तरह अंकित है - चंद्रशेखर तिवारी आजाद, माता-जगरती देवी, पिता-पंडित सीताराम तिवारी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 30, 2020, 12:11 PM IST
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पटना. भारत के वीर सपूत चन्द्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) को जाति में बांधना क्या उनके अनमोल योगदान का अपमान है? बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar assembly elections) के दौरान अचानक यह सवाल उठ खड़ा हुआ है. हालांकि चुनावी राजनीति से इस मुद्दे का कोई वास्ता नहीं. इसके आधार पर न तो वोट मांगा गया है और ही सामाजिक ध्रुवीकरण की कोशिश की गई है. लेकिन चंद्रशेखर आजाद की जाति बताने वाली मूर्ति का बिहार में होना, ऐन चुनाव के बीच चर्चा में आ गया. चर्चित कथाकार फणीश्वर नाथ 'रेणु' (Phanishwar Nath 'Renu') की भूमि फारबिसगंज (Forbesganj) के पोस्ट ऑफिस चौराहे पर महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद की मूर्ति स्थापित है. इस मूर्ति पर इस वीर शिरोमणि का परिचय कुछ इस तरह अंकित है - चंद्रशेखर तिवारी आजाद, माता-जगरती देवी, पिता-पंडित सीताराम तिवारी. यशस्वी आत्मबलिदानी चंद्रशेखर आजाद की पूरे भारत में संभवत: यह पहली मूर्ति है जो उनके जातिसूचक नाम के साथ स्थापित है. यह मूर्ति जुलाई 2019 से ही फारबिसगंज में मौजूद है. तब कोई खस चर्चा नहीं हुई. लेकिन 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान समाचार संकलन के लिए जब मीडियाकर्मी फारबिसगंज गए तो इस मूर्ति के परिचय के रूप में अंकित जातिवादी अंदाज ने उनका ध्यान बरबस अपनी तरफ खींच लिया.

चंद्रशेखर आजाद की जाति !

महापुरुष किसी जाति विशेष के नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश के होते हैं. उनके बहुमूल्य योगदान पर पूरे देश को गर्व की अनुभूति होती है. देश हित में उनकी कुर्बानी को जाति के दायरे में बांधने की कोशिश करना एक तरह से उनका अनादर करना है. फारबिसगंज में इस मूर्ति की स्थापना हिन्दू युवा शक्ति नामक संगठन ने की है. संगठन का दावा है कि उसने कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद यह मूर्ति स्थापित की है. लेकिन अमर बलिदानी चंद्रशेखर आजाद की जाति बताने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? इस सवाल के जवाब में संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि हमने केवल इस महापुरुष का पूरा नाम लिखा है. क्या उनका पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी नहीं है? यहां तक कि क्रांतिकारी संगठन में उनके सहयोगी उन्हें पंडितजी कह कर ही संबोधित करते थे. उनकी हर तस्वीर नें उनका जनेऊ प्रमुखता से दिखता रहा है. क्या ये बातें उनकी जाति की तरफ इशारा नहीं करती रही हैं? अगर इस मूर्ति में उनका सरनेम लिख दिया गया तो क्या गलत किया गया? अब अगर इस नाम में लोग जाति खोजने लगें तो यह उनकी समस्या है. क्या फारबिसगंज में किसी उम्मीदवार ने चंद्रशेखर आजाद की जाति को बता कर वोट मांगा है? अगर नहीं तो फिर समस्या क्या है?

जाति खोजो अभियान क्यों?

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