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बिहार का बहुचर्चित DM जी कृष्णैया हत्याकांड: 28 साल बाद पूर्व डीजीपी ने साझा किया इमोशनल संस्मरण

बिहार का बहुचर्चित DM जी कृष्णैया हत्याकांड: 28 साल बाद पूर्व डीजीपी ने साझा किया इमोशनल संस्मरण

बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद ने दिवंगत डीएम जी कृष्णैया को लेकर एक भावुक पोस्ट लिखा है.

बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद ने दिवंगत डीएम जी कृष्णैया को लेकर एक भावुक पोस्ट लिखा है.

Former DGP Abhayanand's Post on DM G Krishnaiah: पूर्व डीजीपी अभयानंद के फेसबुक पोस्ट से पता चलता है कि जी. कृष्णैया किस हद तक ईमानदार थे और आम जनता के बीच कितने पॉपुलर. पोस्ट पढ़ने के बाद दिवंगत अधिकारी के प्रति आदर और सम्मान का भाव बढ़ जाना अस्वाभाविक नहीं है. बिहार के पुलिस प्रमुख ( DGP ) के पद से रिटायर हुए अभयानंद अपने संस्मरण की शुरुआत इन शब्दों में करते हैं- “ श्री जी. कृष्णैया पश्चिम चम्पारण के जिला पदाधिकारी थे और मैं पुलिस अधीक्षक. एक दिन हम दोनों बगहा क्षेत्र में नहर की कच्ची सड़क पर चले जा रहे थे. बातों-बातों में अचानक उन्होंने मुझे अपनी ज़िन्दगी के कुछ किस्से सुनाए.

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पटना. आइएएस जी कृष्णैया (DM G. Krishnaiah) की निर्मम हत्या के 28 साल होने को आए हैं. तब से गंगा और गंडक में न जाने कितना पानी बह गया. उस बहुचर्चित कांड के सजायाफ्ता पूर्व सांसद आनंद मोहन आजीवन कारावास की सजा लगभग पूरी कर चुके हैं. उस वक्त जो बालक थे, अब प्रौढ़ हो रहे हैं और तब की युवा पीढ़ी उम्र के ढलान पर हैं. खुद कृष्णैया साहब आज जीवित होते तो कहीं रिटायरमेंट लाइफ गुजार रहे होते. इस लंबे कालखंड ने अनेक लोगों की स्मृतियों से उस नृशंस मॉब लिंचिंग (Mob Lynching ) को ओझल कर दिया है. लेकिन, बिहार के DGP रहे अभयानंद, जी. कृष्णैया को नहीं भूले हैं. उनको अभी भी पश्चिम चंपारण में जी. कृष्णैया संग बिताए लम्हे पूरी तरह याद हैं, जहां तब दोनों SP और DM के पद पर तैनात थे. अभयानंद ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया के निजी और पेशेवर जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी बातों की चर्चा की है, जिससे अधिकांश लोग अनजान हैं.

पूर्व डीजीपी अभयानंद के फेसबुक पोस्ट से पता चलता है कि जी. कृष्णैया किस हद तक ईमानदार थे और आम जनता के बीच कितने पॉपुलर. पोस्ट पढ़ने के बाद दिवंगत अधिकारी के प्रति आदर और सम्मान का भाव बढ़ जाना अस्वाभाविक नहीं है. बिहार के पुलिस प्रमुख ( DGP ) के पद से रिटायर हुए अभयानंद अपने संस्मरण की शुरुआत इन शब्दों में करते हैं- “ श्री जी. कृष्णैया पश्चिम चम्पारण के जिला पदाधिकारी थे और मैं पुलिस अधीक्षक. एक दिन हम दोनों बगहा क्षेत्र में नहर की कच्ची सड़क पर चले जा रहे थे. बातों-बातों में अचानक उन्होंने मुझे अपनी ज़िन्दगी के कुछ किस्से सुनाए.

उनके पिता रेलवे के क्लास 4 कर्मचारी थे. उनकी मां और पिता के पास बासगीत के पर्चे पर बनी एक झोंपड़ी थी. दोनों शिक्षित नहीं थे. वे स्वयं पढ़ने में अच्छे थे तो उनको हरिजन छात्रवृति मिली और वे चौथी कक्षा में हरिजन छात्रावास चले गए. उनके गांव में एक नहर थी. जब हॉस्टल से मन ऊब जाता तब वे नहर में तैरते हुए घर आ जाते, परन्तु किसी दिन भी घर के हड़िया में खाना नहीं मिलता. वे फिर भाग कर हॉस्टल चले जाते. कम से कम वहां उन्हें खाना तो मिल जाता था.

यह एक छोटा सा परिचय है, उस IAS DM का जिसने कभी जाति के आधार पर भेद-भाव नहीं किया. अगर वो अंतर करते भी थे, तो गरीब-अमीर पर, जाति पर कभी नहीं.” अभयानंद आगे लिखते हैं- “जिले का कोई व्यक्ति चाहे कितना भी धनाढ्य क्यों न हो, यह नहीं कह पाया कि कृष्णैया जी को उसने छोटा या बड़ा कुछ भी दिया हो. दूसरी ओर ऐसा भी कोई व्यक्ति नहीं था, जो यह कह सके कि वह उनसे मिलने उनके घर गया हो और उसे एक प्याला चाय नहीं मिला हो.”

जब जमींदार के घर का खाना ठुकराया
अभयानंद लिखते हैं- “जिले (पश्चिम चंपारण) में कई अमीर घराने हैं, जिनके घर महलों की भांति हैं. एक आम सभा आयोजित की गई थी, जिसका स्थान एक महल के बगल में था. लंच का समय हुआ तो उन जमींदार साहब ने DM और SP साहब को अपने महल में स्वागत का प्रस्ताव दिया. मैंने तुरंत जवाब दिया कि घर से टिफ़िन लाया हूं. DM साहब ने भी यही जवाब दिया. मुझे अत्यंत खुशी हुई. हम दोनों ने अपनी गाड़ी में साथ में बैठ कर घर से लाया टिफ़िन खाया. आम लोगों के बीच यह चर्चा थी कि इससे पहले DM और SP की ऐसी कोई जोड़ी नहीं आई जिसने ज़मींदारों के स्वागत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया हो.”

जब भीड़ के हत्थे चढ़ गया लोकप्रिय DM 
आम जनता में DM जी. कृष्णैया की लोकप्रियता का बखान करते हुए अभयानंद लिखते हैं- “जिले का आम आदमी उनसे बेहद प्यार करता था. उनकी इज़्ज़त करता था. वे उस जिले में किसी भी भीड़ में घुस जाते तो लोग सम्मान से उनके लिए रास्ता बना देते थे. दुर्भाग्य था कि जिस घटना में उनकी हत्या हुई, वह मुजफ्फरपुर जिले में घटित हुई थी. पश्चिम चम्पारण में यह घटना हो ही नहीं सकती थी.”

कैसे हुआ था जी. कृष्णैया हत्याकांड
वो 5 दिसम्बर, 1994 की मनहूस दोपहरी थी, जब अधिकारियों की बैठक में शामिल होने के बाद गोपालगंज के जिलाधिकारी जी.कृष्णैया वापस लौट रहे थे. एक दिन पहले ही उत्तर बिहार के एक नामी गैंगस्टर छोटन शुक्ला की गैंगवार में हत्या हुई थी और हजारों का जन समुदाय शव के साथ एनएच जाम कर रोष प्रदर्शन कर रहा था. अचानक नेशनल हाईवे-28 से एक लाल बत्ती वाली कार गुजरती दिखी. उसी गाड़ी में आईएएस अधिकारी जी. कृष्णैया बैठे थे.

लालबत्ती की गाड़ी देख भीड़ भड़क उठी और गाड़ी पर पथराव करना शुरू कर दिया. ड्राईवर और अंगरक्षक ने डीएम को बचाने की भरपूर कोशिश की लेकिन नाकाम रहे. उग्र भीड़ ने कृष्णैया को गाड़ी से बाहर खींच लिया और खाबरा गांव के पास पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी. आरोप था कि शुक्ला के एक भाई ने डीएम की कनपटी में एक गोली भी मार दी थी. उस हत्याकांड ने प्रशासनिक और सियासी हलके में उस वक्त तूफान ला दिया था.

पूर्व सांसद को हुई मौत की सजा
जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या मामले में पटना की निचली अदालत ने पूर्व सांसद आनंद मोहन को 2007 में फांसी की सजा सुनाई थी. आनंद मोहन के साथ पूर्व मंत्री अखलाक अहमद और अरुण कमार को भी मौत की सजा सुनाई गई थी. बाद में पटना हाईकोर्ट ने सजा को उम्रकैद में बदल दिया. इसी केस में आनंद मोहन की पत्नी और पूर्व सांसद लवली आनंद, छोटन शुक्ला के भाई मुन्ना शुक्ला, शशि शेखर और छात्र नेता हरेन्द्र कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने दिसंबर 2008 में सबूत के अभाव में इन्हें बरी कर दिया था. आनंद मोहन फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट भी गये, लेकिन अदालत ने 2012 में हाईकोर्ट के फैसले को बहाल रखा. बाकी आरोपी बरी हो गये, लेकिन आनंद मोहन अभी भी जेल में हैं, हालांकि उनकी सजा की अवधि पूरी हो चुकी है.

जी. कृष्णैया थे आंध्रप्रदेश के निवासी
आइएएस जी. कृष्णैया के जन्म आंध्रप्रदेश के महबूबनगर जिले ( अब तेलंगाना प्रांत) के एक दलित परिवार में हुआ था. उनका बचपन अभावों में गुजरा. वे 1985 बैच के बिहार कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे. हत्या के वक्त उनकी उम्र 35 साल थी. वे उस गोपालगंज में जिलाधिकारी थे, जो तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद का गृह जिला था. कृष्णैया के बारे में मशहूर था कि वे उच्च कोटि के ईमानदार और अत्यंत सादगी पसंद अधिकारी थे, जिनका दरवाजा हमेशा आम लोगों के लिए खुला रहता था.

समाज के अत्यंत निचले तबके और निर्धन लोगों के प्रति उनकी संवेदना देखने लायक थी. हत्या के बाद उनकी पत्नी उमा कृष्णैया को सरकार ने हैदराबाद के कॉलेज में शिक्षक की नौकरी दी. उनकी दो बेटियां निहारिका और पद्मा हैं, जो पिता की हत्या के वक्त क्रमश- 7 और 5 साल की थी. दोनों बेटियां अपने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने में जुटी हैं.

Tags: Muzaffarpur latest news, PATNA NEWS

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