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बिहार में बच्चों की मौत के पीछे लीची नहीं बल्कि ये हैं दो वजह

बिहार में बच्चों की मौत के पीछे लीची नहीं बल्कि ये हैं दो वजह

FILE PHOTO: इंसेफलाइटिस से हर साल बिहार में काफी बच्चों की मौत हो जाती है

FILE PHOTO: इंसेफलाइटिस से हर साल बिहार में काफी बच्चों की मौत हो जाती है

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) से करीब 93 बच्चों की मौत हो चुकी है.

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) से करीब 93 बच्चों की मौत हो चुकी है. यह बताया जा रहा है कि इन बच्चों की मौत लीची खाने से हो रही हैं. बिहार के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने दावा किया है कि अधिकांश मौतें हाइपोग्लाइसीमिया (शुगर लेवल में अचानक भारी कमी) के कारण हुई हैं. स्वास्थ्य विभाग के ये अधिकारी बिहार के इस इलाके में चिलचिलाती गर्मी, नमी और बारिश का नहीं होना बता रहे हैं. इंसेफलाइटिस से बच्चों की मौत का यह सिलसिला 1995 से ही जारी है.



गौरतलब है कि मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके में लीची की खेती बड़े पैमाने पर होती है. मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके में हर साल एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) यानी चमकी बुखार के कारण काफी बच्चों की मौत हो जाती है.

मरने वाले बच्चे सिर्फ गरीब घरों के हैं

इस बारे में समाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद अनिल प्रकाश ने न्यूज 18 हिंदी. कॉम से बातचीत में बताया कि एईएस से बच्चों की मौत के आंकड़ें में तो सिर्फ अस्पतालों में होने वाली मृत्यु के दर्ज किए जाते हैं. कई बच्चे तो झोलाछाप डॉक्टरों और केमिस्ट के यहां जाकर आधे-अधूरे इलाज के कारण दम तोड़ रहे हैं. उन्होंने कहा कि ये मरने वाले बच्चे सिर्फ गरीब घरों के हैं.

कुपोषित बच्चों को लीची से है सर्वाधिक खतरा

इस इलाके में गर्मी के चरम पर पहुंचने और मानसून के शुरू होने के समय हर साल एईएस से बच्चों की मौत होती है. इस लिहाज से 24 सालों में इन मौतों से बचने के लिए कोई विशेष शोध या उपाय नहीं किए गए हैं. इस बारे में विश्व की प्रसिद्ध पत्रिका द लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल में एक विशिष्ट शोध प्रकाशित किया गया था. द लांसेट के अनुसार लीची में हायपोग्लायसिन-ए और मेथिलीन साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसीन होते हैं, जो कुपोषित बच्चों के खून में शुगर का लेवल बहुत कम कर देते हैं.

द लांसेट के मुताबिक यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब इन कुपोषित बच्चों को पिछली रात भोजन नहीं मिला होता है और दूसरे दिन सुबह अपनी भूख मिटाने के लिए वे लीची के बागानों में गिरे हुए अधपके या पके फल उठाकर खा लेते हैं.

लीची बच्चों में घातक मेटाबॉलिक बीमारी पैदा करता है

लीची हमारे लिए बेहद जरूरी है क्योंकि इसमें मौजूद विटमिन, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण और पाचन-प्रक्रिया के लिए जरूरी है. इसमें मौजूद फोलेट हमारे शरीर में कॉलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है. यह हमारे तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद पहुंचाता है. लीची में कार्बोहाइड्रेट, विटमिन सी, विटमिन ए और बी कॉम्प्लेक्स, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं.

सावधानी नहीं बरती तो लीची खाने से हो सकता है ये नुकसान

हालांकि, डॉक्टरों और वैज्ञानिकों का मानना है कि लीची बच्चों में घातक मेटाबॉलिक बीमारी पैदा करता है, जिसे हाइपोग्लाइसीमिया इंसेफेलोपैथी कहा जाता है. लीची में मिथाइल साइक्लोप्रोपाइल-ग्लाइसिन नामक केमिकल भी पाया जाता है.

शोध में ये सब थे शामिल

यह शोध सेंटर फ़ॉर डिजीज कंट्रोल, संयुक्त राज्य अमेरिका और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल, भारत के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था और तब यह निष्कर्ष निकाला गया था कि अधपकी लीचियों को खाने पर यह समस्या और बढ़ जाती है. वैज्ञानिकों-डॉक्टरों के अनुसार समस्या लीची नहीं है ​बल्क कुपोषण है. इस शोध में यह पाया गया है कि सभी मरने वाले बच्चों के खून में शुगर लेवल बहुत ही न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाता है.

एंडोसल्फान का प्रयोग भी मौत की बन रही वजह

बांग्लादेशी वैज्ञानिकों ने भी लीची खाने से मरने वाले बच्चों पर एक शोध किया है और उसके अनुसार लीची की खेती के लिए प्रतिबंधित एंडोसल्फान समेत अन्य कीटनाशकों का प्रयोग होता है जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बहुत खतरनाक है. इस इलाके में गरीबी में बहुत ज्यादा है.  बच्चे बागानों में से लीचियों को उठाकर उसे धोए बगैर ही दांतों से छीलकर खा लेते हैं जिसके चलते खतरनाक रसायन उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं.

एंडोसल्फान पर 2011 में बैन को तैयार हुआ था भारत

जिनेवा में 2011 में आयोजित हुए 'स्टॉकहोम कंनवेंशन ऑन परसिस्टमेंट आर्गेनिक पॉल्यूटेंट्स' पर हुई बैठक में भारत ने एंडोसल्फान के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने में अपनी सहमति जताई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आठ हफ्तों के लिए इस रसायन के उत्पादन और बिक्री पर बैन लगाया था. केरल में इस कीटनाशक के उपयोग पर सबसे पहले वर्ष 2005 में ही पाबंदी लगी थी.

अकेले केरल में इस रसायन से 400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और ​करीब 4000 से ज्यादा लोग शरीर के किसी हिस्से की अपंगता के शिकार हुए हैं.

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Tags: Bihar News, Health News, Muzzafferpur, Suspicious death

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