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OPINION: 'सेंटिमेंटल' बिहार में 'आग' लगाने-बुझाने की पॉलिटिक्स

फाइल फोटो

2015 के विधानसभा चुनाव में आरक्षण की समीक्षा वाले संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान को जिस तरह से आरजेडी ने भुनाया था, उसका फायदा भी मिला था. हाशिए पर पड़ी आरजेडी दोबारा मेनस्ट्रीम में आ गई थी.

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश में जातिगत जनगणना की मांग का समर्थन किया है. साथ ही यह भी कहा कि यह जरूरी नहीं किआरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत ही रहे. वहीं तेजस्वी यादव ने खुलकर कहा है कि वह आर्थिक आधार पर सवर्णों के आरक्षण का समर्थन नहीं करते हैं. इसके साथ ही आज लालू यादव ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने को लेकर संविधान संशोधन की आलोचना की है. यानि उन्होंने आरजेडी का आधिकारिक स्टैंड भी बता दिया है. वहीं नीतीश कुमार ने लोगों का आह्वान किया है कि वोट के लिए तनाव फैलाने वालों को करारा जवाब दें.

सवर्ण आरक्षण पर संसद में लाए गए बिल का जिस अंदाज में आरजेडी ने विरोध किया वह काबिले गौर है. इससे सवाल उठता है कि क्या फिर से आरजेडी सवर्ण विरोध की बुनियाद पर ही अपनी राजनीति आगे बढ़ाना चाह रही है. हालांकि जिस तरह से पार्टी के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने इसे पार्टी की चूक करार दिया था. इससे लगा था कि पार्टी शायद इसपर पुनर्विचार करेगी, लेकिन वह सवर्ण आरक्षण के अपने स्टैंड पर कायम है.

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दरअसल आरजेडी को लग रहा है कि वह सवर्णों का विरोध कर फिर से वही दौर वापस लाएगी जब मंडल कमीशन लागू होने के बाद जातीय गोलबंदी का फायदा उठाकर लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे पिछड़े समुदाय से आने वाले नेताओं ने अपनी राजनीतिक जमीन काफी मजबूत कर ली, जिसकी फसल आज तक काट रहे हैं. 2015 के विधानसभा चुनाव में आरक्षण की समीक्षा वाले संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान को जिस तरह से आरजेडी ने भुनाया था, उसका फायदा भी मिला था. हाशिए पर पड़ी आरजेडी दोबारा मेनस्ट्रीम में आ गई थी.

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दरअसल सच्चाई ये है कि बिहार के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में जातीयता की गहरी पैठ रही है. एक वक्त ऐसा भी था जब अगड़े-पिछड़े की राजनीति में बिहार सबसे आगे रहता था. सवर्णों के विरुद्ध 'भूरा बाल साफ करो' (भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और लाला) का नारा भी लालू यादव और उनकी पार्टी असली ताकत बनी थी.

आरजेडी ने सवर्ण आरक्षण का विरोध कर यह जता भी दिया है कि वह पिछड़े समुदाय और दलितों को यादवों के साथ मुसलमानों का समीकरण बनाकर एक नई रणनीति पर चलना चाह रही है. इसमें उपेन्द्र कुशवाहा, मुकेश सहनी और जीतनराम मांझी के चेहरे को आगे किया जा रहा है. हालांकि कुशवाहा और मांझी ने सवर्ण आरक्षण का समर्थन किया है.

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वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ये बयान भी उसी संदर्भ में माना जा सकता है कि आरजेडी कहीं इस मुद्दे पर लीड न ले ले और वह अपने ही समर्थक वोटरों को खो दे. क्योंकि माना जाता है कि अतिपिछड़ा समुदाय जहां पीएम मोदी के नाम पर बीजेपी के साथ अब भी खड़ा है, वहीं कुर्मी और कुशवाहा जैसी पिछड़ी जातियां नीतीश कुमार को ही अपना चेहरा मानती हैं. इसके साथ ही महादलितों की 22 जातियों में नीतीश कुमार ने गहरी पैठ बनाई है.

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एनडीए के महत्वपूर्ण सहयोगी और दलित राजनीति का बड़ा चेहरा माने जाने वाले रामविलास पासवान भी खुलकर कह रहे हैं कि सवर्णों ने हमेशा दलितों और पिछड़ों को आगे बढ़ने में मदद की है. वे इसकी सीमा 15 प्रतिशत करने की भी मांग उठा रहे हैं. यह इसलिए कि आरजेडी कभी सवर्णों के नाम पर पिछड़े समुदाय को सेंटिमेंटल ब्लैकमेल न कर सके. जाहिर है ये सारे बयान चुनावी गणित के हिसाब से ही दिए जा रहे हैं ताकि बीजेपी-जेडीयू की ओर बनी जातीय गोलबंदी में टूट न हो.

बहरहाल जातीय राजनीति के लिहाज से 'सेंटिमेंटल' रहे बिहार में एक बार फिर अगड़े-पिछड़े के बीच नफरत की आग लगाने की एक बार फिर कोशिश शुरू हो चुकी है. लेकिन इस बार फर्क इतना है कि पिछड़ी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा नीतीश कुमार एनडीए के साथ हैं. जबकि रामविलास पासवान भी पूरे दम खम से सवर्ण आरक्षण को जायज ठहरा रहे हैं.

साथ ही बिहार के पिछड़ समुदाय में फिलहाल कोई रोष नहीं दिख रहा है. इसका कारण शायद ये है कि 50 प्रतिशत के दायरे से बाहर सवर्ण आरक्षण का प्रावधान किया जाना है. जाहिर है आने वाले वक्त में अगर इस आग में घी डालने वाला कोई पिछड़ा नेता (लालू यादव ) होगा तो उसे बुझाने के लिए भी पिछड़ा नेता ही अगुआई करेगा.

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