बिहार चुनाव 2020: वक्त को पढ़कर 'पलटी' मारने के उस्ताद माने जाते हैं जीतनराम मांझी! जानें राजनीतिक सफर
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बिहार चुनाव 2020: वक्त को पढ़कर 'पलटी' मारने के उस्ताद माने जाते हैं जीतनराम मांझी! जानें राजनीतिक सफर
फाइल फोटो

जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) ने मुख्यमंत्री बनने से पहले बिंदेश्वरी दुबे, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, जगन्नाथ मिश्र, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्व काल में भी बतौर मंत्री काम किया था.

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  • Last Updated: September 3, 2020, 8:46 PM IST
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पटना. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) ने एनडीए (NDA) में जुड़ने के मीडिया के सवाल पर कहा कि- हम नीतीश कुमार (Nitish Kumar) से मिल रहे हैं। वह एनडीए में हैं. उस रिश्ते से हम भी एनडीए का हिस्सा होंगे. जाहिर है मांझी की राजनीति भी एक यूएसपी है. USP- यानी Unique selling proposition. दरअसल यह मार्केटिंग की एक विधा है जो राजनीति में भी सर्वथा उपयोगी है. मांझी के संदर्भ में तो यह खास तौर पर लागू होती है क्योंकि मांझी ने चुनाव के ठीक पहले अपना पाला बदल लिया है और वह एनडीए के हिस्सा माने जाने लगे हैं. हालांकि वे जेडीयू और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Chief Minister Nitish Kumar) से अपनी राजनीतिक नजदीकियां बताते हैं और उसे खूब प्रचारित भी कर रहे हैं.

वर्ष 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान सूबे में जेडीयू की करारी हार पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कुर्सी छोड़ने के बाद उनके ही कारम राज्य सरकार के मुखिया बने मांझी ने बाद में नीतीश कुमार को ही छोड़ दिया था. हालांकि अब वे यह भी कह रहे हैं कि सीएम नीतीश कुमार के कारण ही वे मुख्यमंत्री बने थे. दरअसल इतिहास पर नजर डालें तो यह साफ हो जाएगा कि जीतन राम मांझी सियासत में सिद्धांत से ज्यादा पॉलिटिकल सिनारियो को अहमियत देते रहे हैं.

मांझी ने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू किया था, लेकिन 1990 में कांग्रेस के गिरावट के दौर में वह   जनता दल में चले गए थे. छह साल बाद ही वह लालू यादव के साथ हो लिए और राष्ट्रीय जनता दल में शामिल हो गए.  2005 में जब जब जेडीयू का कुनबा बढ़ा और उसके सत्ता में आने के आसार बने तो वह जेडीयू में चले आए.



फिर कालांतर में वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कारण जनता दल में रहते हुए मुसहर जाति से पहले मुख्मंत्री बने. 20 मई 2014 को पद संभालने के बाद  20 फरवरी 2015 तक वे मुख्यमंत्री रहे. 2015 के सत्ता संघर्ष में नीतीश कुमार से मात खाने के बाद उन्होंने हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा नामक अपनी पार्टी बना ली. इसके बाद महागठबंधन में शामिल हो गए. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को बुरी हार झेलनी पड़ी लेकिन राजद की मदद से अपने बेटे संतोष सुमन को एमएलसी बनवाने में सफल रहे.  अब चुनावों के ऐन पहले मांझी एनडीए में शामिल हुए हैं.
गया जिले के खिजरसराय प्रखंड के महकार गांव में खेत मजदूर रामजीत राम मांझी और सुकरी देवी के घर 6 अक्तूबर 1944 को जन्मे मांझी ने ग्रेजुएशन के बाद टेलीफोन विभाग में नौकरी कर ली. लगभग 10 साल तक नौकरी करने के बाद जब छोटा भाई पुलिस अधिकारी बना तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी और सीधे विधानसभा चुनाव में कूद गए. वर्ष 1980 में कांग्रेस की टिकट पर फतेहपुर क्षेत्र से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.



इसके बाद मांझी चंद्रशेखर सिंह की सरकार में तुरंत मंत्री बन गए थे.  इसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस दौरान फतेहपुर के अलावा बाराचट्टी, बोधगया, मखदुमपुर और इमामगंज से भी चुनाव लड़े और जीते. हालांकि गया सीट से सांसद के रूप में निर्वाचित होने का उनका सपना अबतक पूरा नहीं हो सका. अब तो वह साफ तौर पर कह भी रहे हैं कि अब वे चुनाव नहीं लड़ेंगे. पर अपनी पार्टी का जेडीयू में विलय नहीं कर ये जरूर संकेत दे रहे हैं कि अगर जेडीयू में फिर कुछ उल्टा-पुल्टा हुआ तो वह पलटी मारने से फिर नहीं चूकेंगे.
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