चमकी का कहर: शासन-सत्ता नाकाम रही, खामखां लीची बदनाम हुई!

इस बीच एक बात जरूर हुई है कि मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची को सबने टारगेट किया है. खास तौर पर शासन-सत्ता के लोग लीची को इस बीमारी की वजह बता रहे हैं.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 19, 2019, 10:19 AM IST
चमकी का कहर: शासन-सत्ता नाकाम रही, खामखां लीची बदनाम हुई!
AES से बच्चों की मौत का आंकड़ा 141 पहुंचा
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 19, 2019, 10:19 AM IST
बिहार के मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतमढ़ी और चम्पारण समेत 12 जिलों में एक के बाद एक बच्चों की मौत हो रही है. आंकड़ा 141 पहुंच गया है. बीमारी क्या है यह किसी को पता नहीं है. कभी यह एक्यूट इन्सेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) तो कभी ये चमकी बीमारी के नाम से जाना जाता है, लेकिन अभी तक इस पर कोई एक राय नहीं बन पाई है.

लीची को बताई बीमारी की वजह
हालांकि इस बीच एक बात जरूर हुई है कि मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची को सबने टारगेट किया है. खास तौर पर शासन-सत्ता के लोग लीची को इस बीमारी की वजह बता रहे हैं. बीते दिनों जब केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री मुजफ्फरपुर के दौरे पर थे तो उन्होंने इसकी वजह लीची को बताई थी.

लीची की आड़ में छिपने की कोशिश

हालांकि विशेषज्ञों और जानकारों की मानें तो यह शासन-सत्ता की नाकामी छिपाने का महज बहाना है. क्योंकि न तो लीची खाने से बीमारी होती है इसका कोई उदाहरण सामने नहीं आया है. खास तौर पर जिन बच्चों की मौत हुई है उनमें कोई वायरस नहीं पाया गया है बल्कि शुगर और सोडियम की कमी पाई गई है.

हीट और ह्यूमिडिटी है बड़ा कारण
डॉ गोपाल शंकर सहनी मुजफ्फरपुर SKMCH के शिशु रोग विशेषज्ञ हैं और हेड ऑफ डिपार्टमेंट भी हैं. वे बताते हैं कि इस बीमारी का कारण लीची नहीं, बल्कि हीट और ह्यूमिडिटी बड़ा कारण है. इलाके में गर्मी जब 40 डिग्री के पार होती है और ह्यूमिडिटी 60 पार होती है, और यह स्थिति कई दिनों तक लगातार बनी रहती है तो बच्चे बीमार होने लगते हैं.
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1934 के भूकम्प से बदली भौगोलिक स्थिति
डॉ गोपाल इसका एक और पहलू जोड़ते हुए कहते हैं कि 1934 में जब बिहार में भूकंप आया तो इस पूरे इलाके की भौगोलिक स्थिति थालीनुमा आकार की स्थिति में आ गई. इस कारण इन इलाकों में गर्मी और ह्यूमिडिटी दोनों ही अधिक होती है. इन इलाकों में जो बच्चे कुपोषित होतें हैं, उनपर ये बीमारी अपना अधिक दुष्प्रभाव छोड़ती है.

सोडियम-ग्लूकोज की कमी से बीमारी
डॉ गोपाल के अनुसार मेटाबॉलिक रीजन से शरीर में सोडियम और ग्लूकोज की कमी हो जाती है. इसे ही हाइपोग्लाइसेमिया कहा जाता है. अगर सोडियम ग्लूकोज 4 घंटे के अंदर किया जाता है तो बीमारी ठीक हो जाती है. यही कारण है कि जो बच्चे समय सीमा के अंदर अस्पताल आ जाते हैं उसकी जान बच जाती है और जिनके इलाज में देरी होती है उनकी मौत हो जाती है.

लीची खाने से नहीं हुई बीमारी
मुजफ्फरपुर में केजरीवाल अस्पताल के के प्रसिद्ध शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. चैतन्य कुमार कहते हैं कि पीड़ित बच्चों की केस हिस्ट्री में किसी ने भी लीची खाने की बात नहीं बताई है. इससे यह कहना कि लीची से यह बीमारी होती है यह पूरी तरह गलत है.

लीची में भरपूर शुगर और विटामिन्स
लीची अनुसंधान केंद्र के डायरेक्टर डॉ विशाल नाथ कहते हैं कि लीची को बदनाम करने की साजिश है. लीची सालों से है, गुणवत्तायुक्त और शरीर को भरपूर पोषण देती है. इसमें कई प्रकार के विटामिन्स होते हैं और ग्लूकोज भरपूर मात्रा में होती है. जबकि इस बीमारी में ग्लूकोज की ही कमी होती है. स्वस्थ लीची का इस बीमारी से कोई संबंध नहीं है.

जनवरी में आया पहला मामला
वहीं किसान श्री से सम्मानित किसान भोलानथ झा कहते हैं कि लीची 12 मई से ही बाजार में आ जाती है. जबकि इस बीमारी से छह महीने, एक साल का बच्चा भी प्रभावित होता है. वह लीची नहीं खाता है. वहीं इसका पहला मामला जनवरी के अंतिम सप्ताह में आया था तब लीची का अस्तित्व तक नहीं था.

'शक' के आधार पर बदनाम हुई लीची
बता दें कि लीची को बदनाम करने की प्रक्रिया वर्ष 2014 से चल रही है. दरअसल इस अज्ञात बीमारी की पड़ताल के लिए नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल की ओर से डॉक्टर जैकब जॉन के नेतृत्व में टीम आई थी. जैकब जॉन ने तब महज शंका जाहिर की थी कि लीची की गुठली में एक तरह का तत्व है जो घातक हो सकता है. हालांकि न तो कभी इस पर कोई रिसर्च हुआ और न ही इसकी पुष्टि हुई.

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First published: June 19, 2019, 10:10 AM IST
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