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गरीब बच्चों को ही शिकार बना रहा है AES, जानिए क्या है बिहार में 101 बच्चों के मौत की वजह

मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल में बीमार बच्चों से मिलते स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन

मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल में बीमार बच्चों से मिलते स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन

एईएस से हो रहे बच्चों की मौत के बीच एक चीज जो निकल कर सामने आई है वो है गरीबी. इस बीमारी से अधिकांश गरीब बच्चों की ही मौत हो रही है.

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बिहार में AES यानी एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से बच्चों की हो रही मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है. रविवार को जहां मुजफ्फरपुर के अस्पताल के आईसीयू में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन और उनकी टीम की मौजूदगी में बच्चों ने दम तोड़ दिया. तो वहीं सोमवार को डॉक्टरों की हड़ताल के बीच भी मौत का यह सिलसिला जारी है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर क्या कारण है कि बच्चों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है लेकिन मौत को रोकने के कारगर उपाय नहीं हो सके हैं.

ये भी हैं मौत के कारण

डॉक्टरों की तरफ से मिले जवाब के बाद हमने इस बीमारी के कारणों की तह में जाने की कोशिश की तो एक साथ कई चीजें सामने आईं. बच्चों की मौत का कारण न केवल एईएस बल्कि गरीबी, कुपोषण और सामाजिक चेतना का अभाव भी है. मुजफ्फरपुर के सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश पिछले कई साल से इस विषय को लेकर अपनी राय दे रहे हैं. जब न्यूज़18 ने अनिल से बात की तो उन्होंने कहा कि 2014 के बाद ये दूसरा मौका है जब एईएस मासूम बच्चों को राक्षस की तरह निगल रहा है.

100 से कहीं अधिक है मौत का आंकड़ा!

बातचीत में अनिल ने बताया कि एईएस से मौत का आंकड़ा 100 से कहीं अलग है क्योंकि ये आंकड़े तो केवल सरकारी अस्पतालों के हैं. बच्चों की मौत के आंकड़े में तो सिर्फ अस्पतालों में होने वाली मृत्यु के दर्ज किए जाते हैं. आज भी कई बच्चे इलाज या फिर एंबुलेंस के अभाव में झोलाछाप डॉक्टरों और केमिस्ट के यहां जाकर आधे-अधूरे इलाज के कारण दम तोड़ रहे हैं.

मरने वाले बच्चों में गरीब ही

बच्चों की मौत के बीच एक चीज जो निकल कर सामने आई है वो है गरीबी. इस बीमारी से अधिकांश गरीब बच्चों की मौत हो रही है. उन्होंने कहा कि ये मरने वाले बच्चे सिर्फ गरीब घरों के हैं. अनिल ने बताया कि गरीब बच्चे जिन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता उन्हें ये बीमारी ज्यादा अटैक कर रही है. आप जब मरने वाले बच्चे की आर्थिक स्थिति का पता लगाएंगे तो वो आपको गरीब ही मिलेगा.

लीची फैक्टर

अनिल प्रकाश ने न्यूज़18 को बताया कि बीमारी का कारण लीची नहीं है लेकिन हाल के दिनों में लीची की फसल में होने वाले कीटनाशकों और केमिकल के छिड़काव से इसे भी एक कारण माना जा सकता है. उन्होंने बताया कि जिन बच्चों के माता-पिता बाजार से लीची नहीं खरीद पाते उनके बच्चे भूलवश बागानों में गिरे लीची का सेवन करते हैं. ऐसे में संभव है कि जमीन पर गिरी लीची से उनको इस बीमारी का खतरा हो. डॉक्टरों और वैज्ञानिकों का मानना है कि लीची बच्चों में घातक मेटाबॉलिक बीमारी पैदा करता है, जिसे हाइपोग्लाइसीमिया इंसेफेलोपैथी कहा जाता है. लीची में मिथाइल साइक्लोप्रोपाइल-ग्लाइसिन नामक केमिकल भी पाया जाता है.

हर साल होता है मौत का इंतजार

जब हमने अनिल से इस रोग की रोकथाम के लिए किए गए सरकारी प्रयासों को लेकर सवाल किया तो उन्होंने बताया कि नेताओं की मानवीय संवेदना यहां हर साल सोई ही रहती है. इसकी बानगी देश के लोगों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में सोते हुए खुद स्वास्थ्य मंत्री ने दे दी है. उन्होंने बताया कि हर साल यहां बच्चों की मौत के बाद आईसीयू और रिसर्च सेंटर बनाने की घोषणा होती है लेकिन बीमारी के जाते ही ये प्रस्ताव ठंडे बस्ते में पड़ जाता है.

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