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Lockdown में फंसे मजदूरों की घर वापसी के लिए परिजनों ने बेच डाली गाय, भैंस और बकरियां, फिर भी पूरे नहीं हुए पैसे
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Shailendra Singh Negi | News18 Uttarakhand
Updated: May 19, 2020, 10:57 AM IST
Lockdown में फंसे मजदूरों की घर वापसी के लिए परिजनों ने बेच डाली गाय, भैंस और बकरियां, फिर भी पूरे नहीं हुए पैसे
बिहार सरकार की तरफ से मजदूरों की घर वापसी का कोई इंतजाम न होने से 36 साल के मजदूर विभोर दास का गुस्सा फूट पड़ा.

लॉकडाउन(Lockdown) की वजह से बुरी तरह फंसे ये मजदूर तीन महीने पहले ही अपने 15 साथियों के साथ बिहार के बेतिया से उत्तराखंड के अल्मोड़ा आए थे.

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हल्द्वानी. उत्तराखंड (Uttarakhand) में पुराने दौर में बुजुर्ग कहते थे कि सोना और चांदी बुरे वक्त में काम आते हैं. इसलिए अच्छे वक्त में इसे जोड़ना चाहिए. बुजुर्गों की ये सीखें हम तक पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह पहुंची हैं. गरीब के घर में आपको सोना या चांदी मिले य न मिले, लेकिन गाय, भैंस, बकरी और मुर्गियां जरूर मिल जाएंगी. क्योंकि यही इनका अनमोल धन होता है. और कोरोना (Corona) महामारी ने इसे सच साबित किया है. बिहार के बेतिया (Bettiah) के रहने वाले विभोर दास, रमेश यादव और लाल बाबू के लिए उनकी गाय, भैंस और बकरियां किसी सोने से कम साबित नहीं हुई हैं. क्योंकि कोरोना के मुश्किल दौर में तीनों अगर घर लौट पा रहे हैं तो इन्हीं गाय-भैंसों के बदौलत.

दरअसल, इनके पास उत्तराखंड से बिहार अपने घर लौटने भर का पैसा नहीं था. लिहाजा बच्चों की घर वापसी के लिए इनके घरवालों ने अपना सबसे अनमोल धन गाय, भैंस और बकरियां ही बेच डाली. इसके बाद इनकी घर वापसी के लिए पैसा भेजवाया.

लॉकडाउन की वजह से बुरी तरह फंसे ये मजदूर तीन महीने पहले ही अपने 15 साथियों के साथ बिहार के बेतिया से उत्तराखंड के अल्मोड़ा आए थे. पेशे से मजदूर रोजगार की आस लिए  ढाई हजार किलोमीटर की यात्रा कर अल्मोड़ा पहुंचे थे. लेकिन रोजगार शुरू करते उससे पहले ही कोरोना की मार पड़ गई. ऐसे में रोजगार तो छोड़िए दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़ गए. ऐसे में मजदूरों के सामने दोहरा संकट था. लिहाजा घर लौटने के भी पैसे नहीं थे. हालात ऐसे रहे कि मजदूरों को घर से रुपये मंगाने पड़े. किसी के घर से दो हजार आए तो किसी के घर वाले ने चार हजार रुपए भेज दिए.



सरकार से नहीं मिली मजबूर मजदूरों को मदद



बिहार सरकार की तरफ से मजदूरों की घर वापसी का कोई इंतजाम न होने से 36 साल के मजदूर विभोर दास का गुस्सा फूट पड़ा. न्यूज18 से बात करते हुए विभोर दास बोले चुनाव के समय सभी को गरीबों, मजदूरों की याद आती है. नेता पैसा देकर वोट देने के लिए गांवों में बुलाते हैं. कई बार फोन करते हैं. लेकिन इस महामारी में सब भूल गए. जबकि उन्हीं के साथ राम बाबू कहते हैं कि घर से दो हजार रुपए मंगाए थे लेकिन बस वाला 3500 रुपए किराया ले रहा है. सरकार का इंतजाम होता तो हमारा पैसा बच जाता.

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First published: May 19, 2020, 10:36 AM IST
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