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आखिर क्यों डूब गया 'स्मार्ट सिटी' पटना? कहां हुई चूक...

बाढ़ के मुद्दे पर बिहार के सीएम और डेप्युटी सीएम के खिलाफ शिकायत दर्ज

बाढ़ के मुद्दे पर बिहार के सीएम और डेप्युटी सीएम के खिलाफ शिकायत दर्ज

पटना कभी तालाबों का शहर था. सरकारी दस्तावेजों में 1005 तालाबों का जिक्र है, लेकिन आधे से अधिक गायब हो चुके हैं.

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पटना. 'बिहार में बहार है... नीतीशे कुमार है', 2015 के विधानसभा चुनाव (Assembly Election) के दौरान ये नारा बहुत लोकप्रिय हुआ था और लोगों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) पर भरोसा जताते हुए फिर सत्ता सौंप दी थी. वर्ष 2005 से वो लगातार शासन में बने हुए हैं. अब बिहार में बहार है या नहीं पता नहीं, लेकिन पटना (Patna) की हालत देखकर जरूर लगता है कि विकास के खोखले दावों की हकीकत अब राजधानी की गलियों में कमर तक भरे पानी के ऊपर तैर रही है. दरअसल नकली विकास या दिखावटी व्यवस्था की पोल चार दिन में ही खुल गई. सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह रही जो पटना जलमग्न हो गया और शासन-सत्ता लाचार दिखा?

बता दें कि पटना संसार के गिने-चुने उन विशेष नगरों में से एक है जो अति प्राचीन काल से आज तक आबाद है. गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित ये शहर गंगा घाघरा, सोन और गंडक जैसी सहायक नदियों के संगम बिंदु के पास सबसे ऊंचे स्थान पर अवस्थित है. इसी गुण के कारण हर्यक वंश के शासक अजातशत्रु ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस जगह में अपना दुर्ग स्थापित किया था. बाद में अजातशत्रु के उत्तराधिकारी 'उदायिन' या 'उदायिभद्र' ने पाटलिपुत्र नगर की नींव डाली थी और अपनी राजधानी को राजगृह से पाटलिपुत्र स्थानांतरित (ट्रांसफर) किया.

बाढ़ में पटना के डूब जाने के बावजूद चालक ने अपना रिक्‍शा छोड़ने से मना कर दिया और घर जाने की बात पर रोता रहा


1975 में भी आई थी बाढ़
आधुनिक पटना में वर्ष 1975 में बाढ़ एक बड़ी त्रासदी के रूप में सामने आई थी. तब मध्य और पश्चिमी पटना पूरी तरह बाढ़ के पानी में डूब गया था. सबसे खास ये कि सोन और गंगा में एक साथ बाढ़ आने के बावजूद राजेंद्र नगर और पटना सिटी का इलाका बच गया था, लेकिन इस बार इन इलाकों के साथ मध्य पटना भी जलप्रकोप का शिकार हो गया.

प्रकृति का प्रकोप नहीं, लापरवाही का नतीजा
हालांकि इस बार शासन की तरफ से कहा जा रहा है कि पटना में जलप्रकोप अत्यधिक बारिश के कारण आया, लेकिन जो कारण सामने आ रहे हैं वो मानवजनित समस्याएं हैं न कि प्रकृति का प्रकोप. दरअसल यह बाढ़ की नहीं, जल निकासी की व्यवस्था फेल होने की वजह से हुई है.

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बिहार में पिछले कुछ दिनों से भारी बारिश से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है. कई जिलों में भीषण जलभराव की स्थिति बनी हुई है


पानी बहाव के रास्ते बंद
पटना शहर में 31 बड़े नाले हैं. नगर निगम की लापरवाही इस बाढ़ के लिए मुख्य वजह मानी जा रही है. दरअसल शहर में बने नाला और नालियों में 50 प्रतिशत से अधिक की या तो सफाई नहीं की गई और यदि सफाई की भी गई तो मानदंड के अनुसार नहीं. नाला और नालियों की सफाई के नाम पर महज खानापूर्ति कर काम छोड़ दिया गया.

पूर्व सूचना के बावजूद तैयारी नहीं
मौसम विभाग ने लगातार अपडेट दिया कि 28 और 29 सितंबर को पटना में भारी बारिश होगी और 200 एमएम तक बरसात के आसार हैं. हालांकि शासन ने रेड अलर्ट और ऑरेंज अलर्ट घोषित कर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री (खत्म) कर ली. सबसे खास ये कि बीते कई वर्षों से राजेंद्र नगर और कंकड़बाग में यह स्थिति बार-बार दोहराई जाती रही है, बावजूद इसके शासन ने एहतियाती कदम नहीं उठाए.

ड्रैनेज को ब्लॉक कर दिया गया
गंगा नदी में उफान के कारण कई जगहों पर ड्रेनेज सिस्टम के मुहाने को ब्लॉक कर दिया गया. जाहिर है अगर ये कदम उठाए जाने थे तो पहले उन इलाकों के लोगों को निकालने के लिए बेहतर इंतजाम किए जा सकते थे जहां पर इस ब्लॉकेज का अधिक असर पड़ने वाला था. हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर फरक्का बांध के बैराज खोले गए तो ड्रैनेज के मुहाने खोल दिए गए, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

बिहार में बाढ़ से अब तक 43 लोगों की मौत हुई है. लगभग 24 घंटे से रूकी बारिश के बाद अब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है


1975 की बाढ़ से नहीं लिया सबक
वर्ष 1975 में पटना की बाढ़ आज भी कई लोगों के जेहन में जिंदा है. सीएम नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी जैसे शासन-सत्ता में बैठे कई नेताओं ने भी उस भयावह दृश्य को देखा है. बावजूद इसके ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त नहीं किया गया. हालांकि बीते एक साल से इसपर काम जारी है, लेकिन अभी इसका 20 प्रतिशत ही काम पूरा हो पाया है.

खत्म हो गए ताल-तलैये
पटना कभी तालाबों का शहर था. सरकारी दस्तावेजों में 1005 तालाबों का जिक्र है, लेकिन अब आधे से अधिक गायब हो चुके हैं. गर्मी के बाद बरसात में ये जल संचयन का कार्य करता था जिस कारण पटना में सड़कों और गलियों में जलजमाव की स्थिति उत्पन्न नहीं होती थी. अब इन तालाबों की जगह गगनचुंबी इमारतों ने ले ली है.

बेतरतीब बसता-बढ़ता शहर
कोई भी शहर सिविलाइजेशन (सभ्यता) का पार्ट होता है. खास तौर पर पटना जैसे प्राचीन शहर को तो विशेष संरक्षण की जरूरत है, लेकिन इसे बिजनेस मॉड्यूल के तौर पर विकसित किया जा रहा है. कंक्रीट आधारित इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए तो काफी योजनाएं हैं, लेकिन जल निकासी और सोख्ते के लिए कोई व्यवस्था जमीन पर नहीं दिखाई दे रही.

बहरहाल स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित किए जा रहे पटना में गंगा किनारे 4 बड़ी बोट या पानी का जहाज लगाकर उसमें कैफे खोल देने, कुछ गगनचुंबी इमारतें और मॉल खड़ी कर देने से पटना के मॉरिशस बन जाने की कल्पना की कलई खुल गई है.

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