बिहार: अपने विस्तार के लिए इस प्लान पर काम कर रही BJP, जानिये सियासी समीकरण

बदले दौर की राजनीति में बिहार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के बूते भारतीय जनता पार्टी ने पिछड़े और अति पिछड़े समाज में अच्छी पैठ बना ली है और लगातार अपने जनाधार का विस्तार कर रही है.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: July 12, 2019, 11:48 AM IST
बिहार: अपने विस्तार के लिए इस प्लान पर काम कर रही BJP, जानिये सियासी समीकरण
बिहार में विस्तार के लिए लगातार काम कर रही BJP (अमित शाह और पीएम मोदी की फाइल फोटो)
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: July 12, 2019, 11:48 AM IST
लोकसभा चुनाव में आरजेडी की करारी हार के बाद तेजस्वी यादव एक महीने के अज्ञातवास पर चले गए. वापस लौटे तो 6 जुलाई को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल हुए. मंथन और चिंतन के दौर के दौरान उन्होंने कहा कि परंपरागत राजनीति का दौर खत्म हो गया है, हमें नए सिरे से नई राजनीति करनी होगी. इसी मीटिंग में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने कहा- तेजस्वी आगे बढ़ें, वे कुछ लोग से घिरे नहीं दिखाई दें. एक ही जाति (यादव) के बीच तेजस्वी घिरे हुए रहते हैं. वहीं आरजेडी के अन्य नेताओं ने कहा कि पिछड़े और अति पिछड़े समुदाय के लोग हमसे अलग हो चुके हैं.

दरअसल ये सब बातें उस घबराहट का नतीजा है जिससे आरजेडी को लगता है इन तबकों के पार्टी से मुंह मोड़ लेने की वजह से ही हार हुई है. गौरतलब है कि बिहार में बदले दौर की राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के बूते भारतीय जनता पार्टी ने पिछड़े और अति पिछड़े समाज में अच्छी पैठ बना ली है और लगातार अपने जनाधार का विस्तार कर रही है.

अतिपिछड़ा समुदाय BJP के साथ!
आलम ये है कि बिहार मे इस बार अति पिछड़े वोटरों ने बीजेपी के पक्ष में मजबूती के साथ मतदान किया. सवर्णों के खुले समर्थन के बीच यह एक बड़ी वजह रही जो एनडीए ने 40 में से 39 लोकसभा सीटें जीत लीं. जाहिर है अति पिछड़े समुदाय में बीजेपी की पैठ से जहां जेडीयू चिंतित है वहीं आरजेडी में घबराहट है.

होमवर्क कर रही भाजपा
वहीं, बीजेपी अब इस समाज को अपने साथ जोड़े रखने के लिए लगातार होमवर्क कर रही है और आने वाले समय में इसे लागू भी करेगी. दरअसल बीजेपी नेतृत्व का मानना है कि बिहार में करीब 35 प्रतिशत आबादी अति पिछड़े तबके की है. लोकसभा चुनाव की तरह ही यह समुदाय अगर बीजेपी के साथ भविष्य में भी जुड़ा रहे तो वह बिहार में अजेय हो जाएगी.

नीतीश से छूट रहे अति पिछड़े
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बता दें कि लुहार, कुम्हार, बढ़ई, सुनार, कहांर, केवट जैसी करीब 55 जातियां मिलकर अति पिछड़ा वर्ग बनाती हैं. इन्हें बिहार में पचपनिया नाम से भी जाना जाता है. माना जाता है कि वर्ष 2009 से इन जातियों का समर्थन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मिलता रहा है, लेकिन बदले दौर में नीतीश कुमार पर भी कुर्मी और कोयरी जातियों को अत्यधिक तरजीह दिए जाने की भी बातें चर्चा में रही हैं. इससे ओबीसी जातियों में यदा-कदा क्षोभ भी जाहिर होते रहे हैं. लोकसभा चुनाव में यह साफ जाहिर था कि ओबीसी समुदाय पीएम मोदी के साथ खड़ा रहा.

बदले दौर की राजनीति में जहां अतिपिछड़े समुदाय का भरोसा बीजेपी ने जीता है वहीं, जेडीयू ने भी पीएम मोदी के नाम पर ही वोट मांगकर लोकसभा चुनाव में शानदार सफलता हासिल की.


मोदी सरकार की भी यही नीति
बीजेपी ने न सिर्फ बिहार बल्कि देश में यह संदेश देने की कोशिश की है कि वही पिछड़े और अतिपिछड़े समुदाय का हित सोचती है. इसके लिए केंद्र की मोदी सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया. ओबीसी के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षा में पहले से ही आरक्षित सीटों में अति पिछड़ा वर्ग के लिए विशेष कोटा निर्धारित कर दिया. इसी तरह न्यायिक आयोग बनाने की घोषणा की गई और ओबीसी का क्रीमी लेयर भी छह लाख से बढ़ाकर आठ लाख कर दिया गया.

अतिपिछड़े पर दांव लगा सकती है BJP
बिहार बीजेपी सूत्र बताते हैं कि इसी समीकरण को देखते हुए बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए अतिपिछड़े चेहरे पर दांव लगा सकती है. जानकारी के अनुसार बीजेपी किसी सांसद को अध्यक्ष बनाने जा रही है और इसमें भी वह अति पिछड़े समुदाय से चेहरा तलाश रही है.

अजय निषाद के नाम पर मंथन
मुजफ्फरपुर से सांसद अजय निषाद के नाम पर भी मंथन चल रहा है. दरअसल नदी और जल से जुड़ी हुई जातियों में निषाद, सहनी, बिन्द और गंगोता में भाजपा अभी तक नेतृत्व विकसित नहीं कर पाई है. इन जातियों का बिहार में 7 प्रतिशत आबादी है और ये जेडीयू के वोट बैंक माने जाते हैं, लेकिन बीजेपी इन्हें अपना बनाने की रणनीति पर लगातार काम कर रही है.

सूत्रों के अनुसार अगर बीजेपी किसी अति पिछड़े को अगर बिहार प्रदेश अध्यक्ष बनाती है तो मुजफ्फरपुर से पार्टी के सांसद अजय निषाद का नाम पर भी चर्चा हो सकती है. हालांकि अति पिछड़े समुदाय से आने वाले राजेंद्र गुप्ता का नाम भी रेस में माना जा रहा है.


राजेंद्र गुप्ता के नाम की भी चर्चा
अतिपिछड़ा समुदाय से आने वाले राजेन्द्र गुप्ता का नाम भी चर्चा में है, हालांकि वे सांसद नहीं हैं. दरअसल कानू जाति से आने वाले पूर्व विधान पार्षद गुप्ता लंबे समय से पहले ABVP और बाद में भाजपा में विभिन्न पदों पर रहे हैं. भाजपा के नवनियुक्त कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा के भी ये करीबी माने जाते हैं.

बीजेपी में बदलाव की ये बयार बीते बीते लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में भी दिखी. बिहार में बीजेपी के उम्मीदवारों की सूची में ब्राह्मणों के मुकाबले यादवों की संख्या ज्यादा रही. भूमिहारों को सिर्फ एक सीट दी गई और ओबीसी मतदाताओं को राजपूत के बराबर सीटें दी गईं. यह सामाजिक आधार बीजेपी की भविष्य की रणनीति का संकेत है. इससे यह भी जाहिर होता है कि पार्टी के चुनाव की रणनीति में ओबीसी की केंद्रीय भूमिका होगी.

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First published: July 11, 2019, 2:45 PM IST
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