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Bihar News: शराबबंदी की सफलता के लिए 2021 में 2010 के नीतीश चाहिए, डराने वाले हैं आंकड़े

बिहार में शराबबंदी सख्ती से लागू करने के लिए 2021 में 2010 के नीतीश की जरूरत है.

बिहार में शराबबंदी सख्ती से लागू करने के लिए 2021 में 2010 के नीतीश की जरूरत है.

अगर बिहार में सख्ती बरती जा रही है तो शराब माफिया के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं कि वो पुलिस पर गोली चलाने, हमला करने और उनकी हत्या करने में भी खौफ नहीं खाते हैं. हाल ही में सीतामढ़ी में शराब माफिया ने एक दारोगा की गोली मारकर हत्या (Murder) कर दी. वहीं, हर साल कहीं ना कहीं से शराब माफियाओं का पुलिस पर हमले की खबरें आती रहीं. 

  • News18 Bihar
  • Last Updated: February 26, 2021, 10:47 PM IST
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सुमित झा (सीनियर एंकर न्यूज 18 बिहार/झारखंड)

पटना. अप्रैल 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू (Liquor Ban) होने के बाद जनवरी 2021 तक दो लाख 55 हजार 111 मामले दर्ज किए गए. करीब 51.7 लाख लीटर देशी शराब और 94.9 लाख लीटर विदेशी शराब जब्त की गई. तीन लाख 39 हजार 401 की गिरफ्तारी हुई. 470 अभियुक्तों को कोर्ट से सजा मिली. सीमावर्ती राज्य और नेपाल के 5401 तस्कर गिरफ्तार किए गए. 619 पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई की गई. 348 कर्मचारियों पर प्राथमिकी दर्ज की गई. 186 लोगों को बर्खास्त किया गया और 60 पुलिस पदाधिकारी थानाध्यक्ष पद से हटाए गए.

26 फरवरी को बिहार पुलिस सप्ताह के दौरान शराबबंदी को लेकर ये आंकड़े खुद सीएम नीतीश कुमार गिनवा रहे थे. इन आंकड़ों के जरिए शराबबंदी को लेकर सख्ती का हवाला दे रहे थे. अब सोचिए जिस राज्य में पूर्ण शराबबंदी है वहां पांच सालों में करीब 147 लाख लीटर देशी विदेशी शराब बरामद की गई. इसका दो ही मतलब हो सकता है. या तो बिहार में शराबबंदी को लेकर सख्ती बरती जा रही है या फिर शराब की खरीद बिक्री और तस्करी लगातार जारी है. फिर सवाल उठते हैं कि अगर सख्ती है, तो फिर महाराष्ट्र जहां शराब वैध है. वहां से ज्यादा शराबबंदी वाले बिहार में लोग शराब पीते हैं. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र के मुकाबले बिहार में दो प्रतिशत ज्यादा पुरुष शराब पीते हैं.



बिहार में 15.50 फीसदी पुरुष पीते हैं शराब
बिहार में 15.50 फीसदी पुरुष शराब पीते हैं, जबकि यह आंकड़ा महाराष्ट्र में 13.90 फीसदी. सवाल ये भी कि अगर सख्ती है तो फिर जहरीली शराब से कैमूर में दो, गोपालगंज में 6 और मुजफ्फरपुर में 5 लोगों की मौत कैसे हो गई. सख्ती अगर बरती जा रही है तो शराब माफिया के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं कि वो पुलिस पर गोली चलाने, हमला करने और उनकी हत्या करने में भी खौफ नहीं खाते हैं. हाल ही में सीतामढ़ी में शराब माफिया ने एक दारोगा की गोली मारकर हत्या कर दी. वहीं पिछले पांच सालों में हर साल कहीं ना कहीं से शराब माफियाओं का पुलिस पर हमले की खबरें आती रहीं. अब तक हुए हमले में 3 पुलिसकर्मी की जान शराब माफियाओं ने ले ली, जबकि कई जख्मी हो गए.

जाहिर है सरकार के दावों से उलट शराबबंदी पर जमीनी सच्चाई कुछ और ही है, जिसे एनडीए के कुछ नेता भी गाहे बगाहे स्वीकार करते हैं. हाल ही में सरकार में मंत्री मुकेश सहनी ने कहा कि शराबबंदी सख्ती से लागू नहीं हो पा रही है. वहीं सहयोगी पार्टी बीजेपी के एमएलसी संजय पासवान भी शराबबंदी के लागू होने पर सवाल उठाते हुए शराबबंदी पर फिर से विचार करने की मांग की थी. अब सवाल है कि शराबबंदी को लेकर सीएम नीतीश अगर इतने सख्त हैं, तो सख्ती ज़मीन पर नजर क्यों नहीं आती है. शराब माफियाओं में खौफ क्यों नहीं पैदा होता है. तो इसके जवाब में आपको साल 2010 के नीतीश बनाम 2021 के नीतीश को देखना होगा.

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2021 में जो नीतीश शराबबंदी कानून के तहत तीन लाख 39 हजार 401 की गिरफ्तारी में 470 अभियुक्तों को कोर्ट से सजा मिलने को सख्ती बताते हैं. यही नीतीश कुमार 2010 में थे, जिनकी पहल पर महज 3 सालों में 30 हजार से ज्यादा बड़े और छोटे अपराधियों को सज़ा दिलाई गई थी, जो एक रिकार्ड था. तब सीएम नीतीश ने सत्ता में आते ही अपराधियों को तुरंत सजा दिलाने के लिए जनवरी 2006 में स्पेशल कोर्ट का गठन किया था. 2010 में सबसे ज्यादा 14 हजार 311 अपराधियों को स्पीडी ट्रायल के तहत सजा दिलाई गई थी. इसका असर भी दिखा और अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा हुआ. लेकिन 2021 के नीतीश शराबबंदी के जिन आंकड़ों का हवाला देते नजर आए, उसके मुताबिक महज 0.13 प्रतिशत कन्विक्शन रेट के साथ 5 सालों में 3 लाख 39 हजार 401 गिरफ्तारियों में सिर्फ 470 को सजा मिली, यानी महज औसतन हर साल 94 अभियुक्तों को सजा मिली. दरअसल यही एक बड़ी वजह है कि शराब माफियाओं और शराब तस्करों के बेखौफ होने के पीछे. उन्हें लगता है कि गिरफ्तारी होगी भी तो तुरंत सजा मिलेगी नहीं और जमानत पर छूट जाएंगे। होता भी यही है. इसीलिए बिहार में शराबबंदी सख्ती से लागू करने के लिए 2021 में 2010 के नीतीश की जरूरत है.
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