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यादव वोट की चिंता में तेजस्वी ने लगाया 'दलित-ओबीसी टकराव' की साजिश का आरोप

तेजस्वी यादव (File Photo)
तेजस्वी यादव (File Photo)

जैसे ही लगा कि अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न विधेयक पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को कटघरे में खड़ा कर राजनीतिक फायदा उठाने की रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है, सामाजिक न्याय का दंभ भरने वाली पार्टियां सकते में आ गई हैं.

  • News18 Bihar
  • Last Updated: September 13, 2018, 10:53 AM IST
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जैसे ही लगा कि अनुसूचित जाति-जनजाति उत्पीड़न विधेयक पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को कटघरे में खड़ा कर राजनीतिक फायदा उठाने की रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है, सामाजिक न्याय का दंभ भरने वाली पार्टियां सकते में आ गईं. खास कर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) जैसी पार्टी जिसका राजनीतिक वजूद ही MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण पर टिका हुआ है.

आरजेडी को मालूम है कि मंडल की राजनीति के उत्तरार्ध वाला नीतीश काल वोट बैंक के मामले में लालू युग के समीकरण को ध्वस्त कर चुका है. तेजस्वी काल का आरजेडी 17 फीसदी अनुसूचित जातियों के वोट बैंक के प्रति खुद ही आश्वस्त नहीं है. दूसरी ओर 15 प्रतिशत यादव आरजेडी का कोर वोट बैंक हैं.

नब्बे के दशक में लालू यादव ने हाशिए पर खड़ी जमात में जागरूकता की जो क्रांति पैदा की, उससे अनुसूचित जातियों से ज्यादा सशक्तिकरण यादवों का हुआ. ऐसा हुआ कि ये 2018 तक आरजेडी के साथ हैं. 2014 को मोदी लहर का विलगाव काल मान सकते हैं. ये 2019 में भी प्रधानमंत्री चुनने के लिए कमल दबाएं और मुख्यमंत्री के लिए लालटेन थाम लें तो कोई आश्चर्य नहीं.



बिहार की राजनीति में तेजस्वी की ओजस्वी इंट्री जातीयता की दीवार ध्वस्त करती हुई नहीं दिखाई देती. सर्वजन के मुद्दे उठाते हुए जातीय कोर वोट बैंक को साधना मजबूरी है. यही बात 10 सर्कुलर मार्ग पर राबड़ी देवी के आवास में आरजेडी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में निकल कर सामने आई.
एससी-एसटी एक्ट पर 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से लेकर अब तक जारी राजनीतिक समर में पहली बार तेजस्वी यादव ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार 'दलितों और पिछड़ा वर्ग को लड़ाना चाहती है'. ये बड़ा बयान है.

तेजस्वी को शायद आभास हुआ होगा कि एससी-एसटी एक्ट के बेजा इस्तेमाल की जब बात होती है तो इसकी गैर जमानती धारा सिर्फ सवर्णों के लिए नहीं, बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल जातियों पर भी लागू होती है और यादव इसमें शामिल हैं.

साफ तौर पर तेजस्वी 2019 के चुनाव से पहले ये रिस्क नहीं ही लेना चाहेंगे कि द्वारका के यदुवंशियों की बात करने वाला देश का नेता एक बार फिर उनके कोर वोट बैंक में सेंध लगा जाए. उनकी कोशिश होगी कि एससी-एसटी एक्ट पर आरजेडी से ज्यादा जीतनराम मांझी बोलें.

तेजस्वी के लिए एससी-एसटी एक्ट से ज्यादा कारगर हथियार है आरक्षण पर अपने पिता की रणनीति पर टिके रहना. उन्होंने इसका आभास भी करा दिया. तेजस्वी ने आरएसएस और बीजेपी को आरक्षणविरोधी बताया और इसे खत्म करने की साजिश रचने का आरोप लगाया.

ये जुमला 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू आजमा चुके हैं और फल पा चुके हैं. इसलिए आने वाले समय में एससी-एसटी एक्ट पर तेजस्वी कम बोलें और आरक्षण के रटे-रटाए राग को अलापें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. कम से कम वो जय सवर्ण-जय ओबीसी के नारे को दोबारा सुनना पसंद नहीं करेंगे.

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