गंगा में लाशें पहले भी देखी गईं, लेकिन इस बार शवों की संख्या ने चिंता बढ़ा दी

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कोरोना वायरस फैलने का मुख्य जरिया छोटी बूंदे होती हैं, जो सांस लेते, खांसते या छींकते समय बाहर निकलती हैं. (फाइल फोटो)

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि कोरोना वायरस फैलने का मुख्य जरिया छोटी बूंदे होती हैं, जो सांस लेते, खांसते या छींकते समय बाहर निकलती हैं. (फाइल फोटो)

कोरोना महामारी में शवों का अंतिम संस्कार बहुत मुश्किल और महंगी प्रक्रिया बनता जा रहा है. लाशों को एंबुलेंस से निकाल कर घाटों तक लाने और जलाने के लिए लकड़ियों की बढ़ती कीमतें, मृतकों के परिवारों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है.

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बक्सर और पूर्वी उत्तर प्रदेश में तैरती लाशें सनातन परंपरा में अंतिम संस्कार की परंपरा का प्रतीक हैं. वैदिक साहित्य के जानकार और प्रख्यात लेखक डॉ. विवेकानंद तिवारी गरुड़ पुराण का जिक्र करते हुए बताते हैं कि सनातन धर्म में साधु-संतों को समाधि और सामान्य लोगों का दाह संस्कार किया जाता है. इसके पीछे कई कारण हैं. साधु को समाधि या जल समाधि इसलिए दी जाती है क्योंकि ध्यान और साधना से उनका शरीर एक विशेष उर्जा लिए हुए होता है. उस ऊर्जा का समाधि या जल समाधि से प्रकृति में फैलाव होता है. जबकि आम व्यक्ति का शव इसलिए दाह यानी जलाया जाता है क्योंकि दाह संस्कार करने से यदि किसी भी प्रकार का रोग या संक्रमण हो तो वह नष्ट हो जाए. बाद में बची हुई राख या हड्‍डी को किसी नदी में विसर्जित कर दिया जाता है.  डॉ. विवेकानंद तिवारी बताते हैं कि गरुड़ पुराण में शवों के दाह संस्कार के लिए विशेष नियमों की जानकारी दी गई है. हिन्दुओं में साधु-संतों और बच्चों को दफनाया जाता है, जबकि सामान्य व्यक्ति का दाह संस्कार किया जाता है. उदाहरण के लिए गोसाईं, नाथ और बैरागी संत समाज के लोग अपने मृतकों को आज भी समाधि देते हैं. दोनों हीं तरीके यदि वैदिक रीति और सभ्यता से किए जाएं, तो उचित हैं.

हालांकि, डॉ. विवेकानंद तिवारी ये भी बताते हैं कि जो लोग अपने मृतकों को जल दाह देते हैं. धर्म के जानकार लोग इसे धर्म विरुद्ध मानते हैं. जल दाह देने की भी प्रथा है, जिसके चलते गंगा और अन्य नदियों में कई शव बहते हुए देखे जा सकते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में आज भी अविवाहितों, साधु-संतों, सांप काटे लोगों और किसी महाव्याधि से मरे लोगों की लाशों को जलाने की परंपरा नहीं है, बल्कि उन्हें जल समाधि दी जाती है. यूपी की सीमा से लगे बिहार के कुछ क्षेत्रों में भी ये परंपराएं वर्षों तक चली आ रही थीं लेकिन गंगा निर्मलीकरण अभियान शुरू होने के बाद अब शवों को जलाने का चलन बढ़ गया है. लेकिन नदियों में तैरती लाशों की संख्या बढ़ने पर चिंता इस बात की जरूर होनी चाहिए कि इन लाशों में कहीं कोरोना महामारी की वजह से मरने वाले लोगों की लाशें तो शामिल नहीं.

लाशों का इस तरह से तैरना कम-से-कम उन लोगों के लिए मुद्दा नहीं है, जो नदियों के किनारे रहते हैं. गंगा या उसकी सहायक नदियों के किनारे रहने वाले लोगों में शायद हीं ऐसा कोई होगा, जिसने इन नदियों में तैरती लाशें नहीं देखी होंगी. हिंदू कर्मकांड के जानकारों के मुताबिक, बिहार में ज्यादातर जगहों पर शवों को जलाने की परंपरा रही है लेकिन कुछ परिस्थितियों, जैसे साँप के काटने पर लाशों को नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है. कुछ जगहों पर अविवाहितों के शव के साथ घड़े में पानी भरकर, बांस या पत्थर बांध कर नदी में बीचों-बीच प्रवाहित कर दिया जाता है. कुछ जगहों पर सांप के काटने से शवों के साथ केले का थम्ब बांधकर प्रवाहित कर दिया जाता है.

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सनातन धर्म को मानने वाले कुछ साधु-संतों की इच्छा के मुताबिक, उनकी लाश को जलाया नहीं, बल्कि सीधे गंगा में प्रवाहित करने की परंपरा रही है, ताकि उनकी मृत शरीर को मछलियां और दूसरे जलचर जीव खा सकें. वर्षों से ऐसे कई वृद्ध भी अपने शव को जलाने की बजाय गंगा जल में प्रवाहित करने की इच्छा जाहिर करते रहे हैं लेकिन सनातन धर्म में इसके लिए विशेष नियम बनाए गए हैं, जिससे प्रकृति का नुकसान ना हो. कुछ लोग परंपराओं को जानकारी के अभाव में गलत तरीके से अंजाम देते हैं. वर्षों से चली आ रही इन परंपराओं की वजह से हीं यूपी और बिहार में बहने वाली गंगा और उसकी सहायक नदियों में तैरती लाशें दिखाई पड़ती हैं.

कर्मनाशा नदी, जो बिहार और यूपी के बीच बहती है, वहां यूपी के हिस्से के सैकड़ों गांवों में लाशों को मुखाग्नि देकर प्रवाहित करने की परंपरा चली आ रही है. इतिहास में ऐसे दृष्टांत और भी मिलते हैं जब शवों की संख्या इतनी बढ़ गई कि उनका अंतिम संस्कार करना मुश्किल हो गया. जिम क़ार्बेट ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि पहाड़ में हर महामारी के बाद आदमखोर बाघों की संख्या बढ़ जाने के प्रमाण मिले हैं.

उन्होंने पुस्तक में बताया है कि महामारी में इतने ज़्यादा लोग मरते हैं कि उन्हें जलाना या दफ़नाना सम्भव नहीं हो पाता इसलिए पहाड़ों में ऊंचे इलाक़ों में रह रहे लोग शवों के मुंह में एक अंगारा डाल कर



अंतिम क्रिया के बाद शव को पहाड़ी से नीचे लुढ़का देते हैं. जब बाघ/तेंदुओं को ये शव आसानी से मिल जाते हैं और उन्हें मानव-मांस की आदत लग जाती है. ग़ाज़ीपुर के गहमर में तैरती लाशें दिखने पर ज़िलाधिकारी मंगला प्रसाद सिंह ने मामले की जांच के लिए टीम गठित कर दी है. ग़ाज़ीपुर का गहमर गांव, बिहार के बक्सर ज़िले से लगा हुआ है. गंगा नदी गहमर से होते हुए ही बिहार में प्रवेश करती है.

बक्सर ज़िले में जब बड़ी संख्या में शव मिले थे, तब भी यही आशंका जताई जा रही थी कि ये शव उत्तर प्रदेश के विभिन्न जगहों से बहकर यहां आए होंगे. जब यूपी से बहते हुए बिहार के हिस्से

में गंगा नदी प्रवेश करती है तो बक्सर के चौसा में नदी का प्रवाह घुमावदार हो जाता है. यही वजह है कि चौसा श्मशान घाट पर यूपी से बहकर लाशें आती रही हैं, लेकिन इस बार इनकी संख्या बहुत ज़्यादा है. हालांकि चौसा से गंगा में बहती लाशों का मामला सामने आने के बाद बक्सर प्रशासन की तरफ़ से एक बयान भी आया कि हमारे यहां यानी बिहार में लाशों को नदी में प्रवाहित करने का रिवाज नहीं है.

कोरोना महामारी में शवों का अंतिम संस्कार बहुत मुश्किल और महंगी प्रक्रिया बनता जा रहा है. लाशों को एंबुलेंस से निकाल कर घाटों तक लाने और जलाने के लिए लकड़ियों की बढ़ती कीमतें, मृतकों के परिवारों के लिए परेशानी का सबब बनती जा रही है. श्मशान घाट पर 15 से 20 हज़ार रू ख़र्च हो रहे हैं. ऐसे में, यह

भी जांच का विषय है कि बिहार और पूर्वी यूपी की नदियों में तैरती लाशें कोरोना मृतकों की तो नहीं! कहीं, कोरोना के डर के मारे लोग शवों का अंतिम संस्कार करने की बजाय नदियों में हीं बहा रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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