दो गुटों में बंटा महागठबंधन! दोराहे पर खड़ी बिहार कांग्रेस के लिए और मुश्किल हुई राह, जानें वजह
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दो गुटों में बंटा महागठबंधन! दोराहे पर खड़ी बिहार कांग्रेस के लिए और मुश्किल हुई राह, जानें वजह
लेकिन सवाल कांग्रेस को लेकर है, क्योंकि वह कंफ्यूजन में है. (फाइल फोटो)

बिहार (Bihar) में नाम के लिए बचे महागठबंधन में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. महागठबंधन दो हिस्सों में बंट गया है. एक तरफ़ आरजेडी है तो दूसरी तरफ़ मांझी के नेतृत्व में उपेंद्र कुशवाह और मुकेश सहनी की पार्टी है.

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पटना. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) सर पर है लेकिन कांग्रेस अभी भी कंफ्यूजन में है. कांग्रेस (Congress) एक तरफ़ राजद पर ज्यादा से ज्याद सीट के लिए दबाव भी बनाना चाहती है तो दूसरी तरफ़ मांझी और कुशवाह के साथ खड़े होने से भी उसे परहेज़ है. जबकि राजद पिछले कई चुनाव में कांग्रेस को सीट बंटवाते में ठेंगा दिखा चुकी है. इस बार के विधानसभा चुनाव में भी उम्मीद यही है. बावजूद इसके कांग्रेस खुलकर अपनी बात भी नहीं रख पा रही है. जबकि जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) , उपेन्द्र  कुशवाह और मुकेश सहनी लगातार बैठकें करके राजद पर दबाव बना रहे हैं.

बिहार में नाम के लिए बचे महागठबंधन में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है.  महागठबंधन दो हिस्सों में बंट गया है. एक तरफ़ आरजेडी है तो दूसरी तरफ़ मांझी के नेतृत्व में उपेंद्र कुशवाह और मुकेश सहनी की पार्टी है. इन दो गुटों में जमकर दबाव की पोलिटिक्स हो रही है. लेकिन सवाल कांग्रेस को लेकर है, क्योंकि वह कंफ्यूजन में है. न तो वो खुलकर आरजेडी के साथ खड़ी हो रही है और न ही मांझी गुट के साथ जा रही है.

कांग्रेस भी राजद के मोनोपोली से परेशान है
दरअसल अंदर खाने कांग्रेस भी राजद की मोनोपोली से परेशान है और गाहे बगाहे पार्टी के कुछ नेता ये बात बोलते भी हैं. लेकिन दूसरी तरफ़ कांग्रेस खुल कर राजद के विरोध में आने से बचना चाह रही है. जबकि विधानसभा की सीट को लेकर कांग्रेस भी नाख़ुश है और इसबार अधिक सीट पर चुनाव लड़ना चाह रही है. लेकिन राजद इसबार भी कांग्रेस को ज़्यादा भाव देने के पक्ष में नहीं दिख रही है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा एक तरफ़ अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की इक्षा जताते हैं लेकिन साथ हीं राजद  के प्रती अपना समर्पण भी दिखा देते हैं. यानी साफ़ है कि कांग्रेस ये जान रही है कि बिहार में उनका वजूद राजद की बैसाखी पर हीं टिका है.
राजद के पीछे चलना कांग्रेस की मजबूरी


बिहार में राजद की पिछलग्गू पार्टी का तमग़ा हासिल कर चुकी कांग्रेस को पिछले कई चुनावों में राजद के सामने न चाहते हुए घुटने टेकने पड़े हैं. चाहे वो पिछले लोकसभा का चुनाव हो जिसमें न चाहते हुए कांग्रेस को कम सीटों पर समझौता करना पड़ा जिसे लेकर महागठबंधन में खूब हो हंगामा मचा था. लेकिन आख़िरकार कांग्रेस की राजद के सामने एक न चली और कांग्रेस को कम सीटों पर मान जाना परा. दूसरा वाक़या हाल मे हुए राज्यसभा के चुनाव में देखने को मिला जहां राजद ने वादा करके भी कांग्रेस को एक सीट नाहीं दी. तब माना जा रहा था की अब कांग्रेस इस अपमान के बाद अलग होगी. पार्टी के भी कुछ नेताओं ने खुलकर राजद के इस बरताव का विरोध किया था. लेकिन नतीजा यहां भी कुछ न निकला और राजद ने यहां भी कांग्रेस को उसकी हैसियत बता दी. कांग्रेस को अब डर है कि इसबार के विधानसभा चुनाव में भी वही हाल न हो जाय. लेकिन कांग्रेस की मजबूरी है कि वो खुलकर राजद की ख़िलाफ़त भी नहीं कर सकती.

मांझी, कुशवाह और सहनी ने खोल रखा है मोर्चा
कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद राजद के ख़िलाफ़त की ताक़त नहीं जुटा पा रही है लेकिन महागठबंधन में अपने अधिकारों को लेकर हम, रालोसप और वीआईपी जैसी छोटी पार्टियों ने राजद के नाक में दम कर दिया है. राजद के मोनोपोली के ख़िलाफ़ इन नेताओं की लगातार बैठकें हो रही हैं. साथ ही मांझी और उपेंद्र कुशवाह खुलकर राजद के कदम की ख़िलाफ़त भी करते रहे हैं. लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद बिहार में लगातार अपना जनाधार खो रही कांग्रेस आज बिहार की राजनीति में परजिवि की भूमिका में आ गई है. उसे पता है कि वो बिना राजद के जनाधार के टिक नहीं सकती है. यही वजह है कि राजद के सामने अपने अधिकार की बात करने में भी कांग्रेस को सौ बार सोचना पड़ता है.

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