बिहारी इस तरह नहीं मरा करते सुशांत... This is not fair, man !
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बिहारी इस तरह नहीं मरा करते सुशांत... This is not fair, man !
सुशांत सिंह राजपूत बिहार के पूर्णिया जिले के मूल निवासी थे.

सुशांत (Sushant) का यूं हार मानकर सुसाइड कर लेना एक बिहार निवासी को ऐसा खला कि दिल को छू लेने वाला भावुक पोस्ट लिख डाला. सोशल मीडिया पर ये पोस्ट खूब शेयर किया जा रहा है.

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पटना. बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) ने रविवार को आत्महत्या कर ली और सोमवार को पिता केके सिंह के सामने उनका मुंबई में अंतिम संस्कार भी पूरा किया गया. 34 साल के सुशांत के इस तरह अचानक चले जाने से सभी सकते में हैं. जो खबरें आ रही हैं उसके अनुसार वे डिप्रेशन (Depression) में थे. उनके डिप्रेशन में जाने की क्या वजहें थीं, ये कोई नहीं जानता. हालांकि वरिष्ठ फिल्मकार शेखर कपूर, नामचीन अभिनेत्री कंगना रनौत और प्रसिद्ध खिलाड़ी बबीता फोगाट जैसे लोगों की बातों से तो यही जाहिर हो रहा है कि छोटे शहर से आने वाला यह उम्दा कलाकार बॉलीवुड के बड़े-बड़े कलाकारों के लिए भी खतरा बन गया था और इसी वजह से 'साजिश' का शिकार हुआ है!

इन सबके बीच यह भी साफ हो रहा है कि एक लॉबी थी, जिसके कारण इस प्रतिभाशाली अभिनेता का कई बड़े प्रोडक्शन हाउस ने Boycott कर दिया था. हालांकि कई अन्य बातों को भी उनके डिप्रेशन की वजह बताया जा रहा है. बहरहाल इतनी कम उम्र में इतनी शोहरत पाने के बाद इस तरह चले जाने के बहुत सारे कारण होंगे, लेकिन ये बात हर बिहारवासियों को खल रही है. इसी क्रम में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट वायरल हो रहा है, जो दिल को छू जाता है.

बिहार के सीतामढ़ी के रहने वाले छात्र अमन आकाश का यह फेसबुक पोस्ट बिहारवासियों के संघर्ष और अंत-अंत तक हार न मानने की जिद और उनके जज्बे को साबित करता है. ऐसे में बीच समर में सुशांत का यूं हार मानकर सुसाइड कर लेना एक बिहार निवासी को ऐसा खला कि दिल को छू लेने वाला भावुक पोस्ट लिख डाला. सोशल मीडिया पर ये पोस्ट खूब शेयर किया जा रहा है. News 18 के पास भी ये इसी माध्यम से पहुंचा है. ऐसे में हमने भी इस बात को आप सभी तक पहुंचाने की पहल की है.



''सुशांत, सिर्फ तुम्हारे पैरों तले स्टूल नहीं खिसकी है, पूरे बिहारियों के पैरों तले जमीन खिसकी है. हमारा सैकड़ों बरसों का गुमान एक झटके में बिखर गया. बिहारी इस तरह मरा नहीं करते. This is not fair, man..!!
जीवनभर संघर्ष की भट्टी में तपकर बनता है कोई बिहारी. आखिरी सांस तक हार नहीं मानकर बनता है कोई बिहारी. कोई बिहारी इसलिए बिहारी नहीं है कि वो बिहार से है, कोई बिहारी इसलिए बिहारी है कि वो ढीठ है. ऐसा नहीं है ...''ऐ बिहारी बावले लौंडे, ऐ बिहारी तेरी... की'' सुनकर उसका खून नहीं खौलता, लेकिन वो अनसुना करता है. मुस्कुरा देता है. दरअसल पैदा होने से लेकर आजतक बिहारवासियों ने ऐसी विपरीत परिस्थितियों में खुद को संभाला है कि इन सब बातों को वो दिल से ही नहीं लगाता.


ऐसा नहीं है वो कमजोर है, कोई बिहारी जब हथौड़ी-छेनी उठा लेता है तो पहाड़ का घमंड तोड़कर ही रुकता है. वह कड़ी धूप में रिक्शा खींच लेता है, ईंटें ढो लेता है, रेहड़ियां लगा लेता है, लेकिन हार नहीं मानता. विपरीत परिस्थितियों में भी डटा रहता है. सरकारें आयीं, सरकारी गयीं. हमारे संघर्ष कम नहीं हुए. संघर्ष को हमने अपने हाथों की रेखा मान ली. घर, घर से पटना, पटना से दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, बिहारी जहां भी गया उसने अपने को उस माहौल में ढाल लिया.

कोरोना जैसी वैश्विक विपरीत परिस्थितियां आयीं. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, गुजरात ने पहचानने से इनकार कर दिया. बिहारियों ने गहरी सांस ली. झोला समेटा और पैदल निकल पड़ा. 1200-1300 किलोमीटर दूर अपने घर के लिए. आग बरसाते मौसम, डंडे बरसाते पुलिसवाले. सबको झेलकर बिहारी घर आ गया. ऐसे राज्य में जहां की प्रति व्यक्ति आय न्यूनतम है. जहां उसे करने को कोई काम मिलेगा कि नहीं इसका भी कुछ पता नहीं था. लेकिन वह डटा रहा, अड़ा रहा.


सुशांत, तुम कोसी क्षेत्र से थे न ? वहां के बच्चे-बच्चे भी बाढ़ की भयानक त्रासदी को चुल्लू में भरकर पी जाते हैं. इससे भी बड़ी त्रासदी थी क्या तुम्हारे जीवन में कि ऐसा कदम उठाना पड़ा. तुम आदर्श थे यार हमारे. हम बिहारियों के. तुम्हारी लाइफ, तुम्हारा संघर्ष, तुम्हारी सफलता सबको हमने सिर-आंखों से लगाया था. सुशांत, अपने जीवन की सुंदर कहानी का तुमने अपने हाथों दुखांत कर लिया है. कुछ नहीं कहूंगा.

''इरफ़ान साहब की रुखसती का ग़म था, तुम्हारे इस तरह जाने का गुस्सा है. और हो भी क्यों न, सुशांत... सिर्फ तुम्हारे पैरों तले स्टूल नहीं खिसकी है, पूरे बिहारियों के पैरों तले जमीन खिसकी है. हमारा सैकड़ों बरसों का गुमान एक झटके में बिखर गया है. बिहारी इस तरह मरा नहीं करते सुशांत. This is not fair, man..!!''

 
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