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कैसे और क्यों जगदानंद सिंह को सौंपी गई बिहार RJD की कमान, पढ़िए इनसाइड स्टोरी

Pankaj Kumar | News18Hindi
Updated: November 29, 2019, 8:46 AM IST
कैसे और क्यों जगदानंद सिंह को सौंपी गई बिहार RJD की कमान, पढ़िए इनसाइड स्टोरी
पार्टी के कुछ नेता जगदानंद सिंह को बिहार आरजेडी का अध्यक्ष बनाने का विरोध कर रहे थे लेकिन लालू-तेजस्वी के आगे उनकी एक न चली (फाइल फोटो)

पार्टी के एक सीनियर नेता के मुताबिक लालू यादव (Lalu Yadav) ने तेजस्वी समेत अपने नजदीकी सिपहसलारों से कहा कि राजनीति दिल से नहीं बल्कि दिमाग से की जानी चाहिए. अपने खास लोगों को समझाते हुए, जिसमें तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) समेत कई नेता मौजूद थे, लालू ने आरजेडी (RJD) को बीजेपी (BJP) और संघ (RSS) से वोट हासिल करने के तौर-तरीकों को सीखने की नसीहत दी.

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  • Last Updated: November 29, 2019, 8:46 AM IST
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नई दिल्ली. अक्टूबर में हुए उपचुनाव (Bye Election) के नतीजों ने साफ कर दिया था कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) अपनी राजनीति के तौर-तरीकों में बदलाव लाने जा रही है. सिमरी बख्तियारपुर और बेलहर में राजपूत मतदाताओं (Rajput Voters) ने जिस तरह खुलकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) का विरोध किया और आरजेडी के सिर जीत का सेहरा बांधने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तभी से तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) के दिमाग में अगड़ी जातियों को रिझाने का ख्याल आना शुरू हो गया. दरअसल लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) खुद 1990 के दशक वाली राजनीति में लौटने के पक्षधर थे और वो चाह रहे थे कि राजपूत, मुसलमान और यादव का तगड़ा गठजोड़ आरजेडी के लिए मजबूत जमीन तैयार करे. पार्टी के एक सीनियर नेता के मुताबिक लालू यादव  ने तेजस्वी समेत अपने नजदीकी सिपहसलारों से कहा कि राजनीति दिल से नहीं बल्कि दिमाग से की जानी चाहिए. अपने खास लोगों को समझाते हुए, जिसमें तेजस्वी यादव समेत कई नेता मौजूद थे, लालू ने आरजेडी को बीजेपी और संघ (RSS) से वोट हासिल करने के तौर-तरीकों को सीखने की नसीहत दी.

लालू ने कहा कि जिस तरह बीजेपी मुस्लिमों को दरकिनार कर वोट हासिल कर जीत का परचम लहराती है उसी तरह आरजेडी को भी समझना होगा कि वो किस तरह के गठजोड़ के सहारे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पा सकती है. दरअसल लालू अपने सिपहसलारों को संदेश देना चाह रहे थे कि बीजेपी मुसलमानों को छोड़ अन्य वोटरों को रिझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती है. वो किसी भी समाज को अछूत नहीं मानती है इसलिए यादव मतदाता भी बीजेपी से नफरत नहीं करते हैं.

आरजेडी संदेश देना चाह रही कि वो सवर्ण विरोधी पार्टी नहीं

जाहिर है राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी लालू भले ही सलाखों के पीछे हों लेकिन समय-समय पर वो अपने अपने परिवार और सिपहसलारों को राजनीतिक कौशल से परिचय करवाते रहते हैं. लालू का इशारा साफ था कि 1990 के दशक में पिछड़ा और अतिपिछड़ा समेत सवर्णों (अगड़ी जातियों) में राजपूतों का वोट उन्हें हासिल होता था लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में वो गठजोड़ संभव नहीं जान पड़ता है. लेकिन राजपूत मतदाताओं को अपनी ओर खींचा जा सकता है. जाहिर है वृहद (बड़े) पैमाने पर देखें तो ऐसा कर आरजेडी ये संवाद कायम करने में कामयाब हो सकेगी कि आरजेडी सवर्ण विरोधी पार्टी नहीं है. वहीं सूक्ष्म (छोटा) दृष्टि से नजर डालें तो आरजेडी बारह फीसदी सवर्णों में सेंधमारी करने में कामयाब हो सकेगी. आरजेडी 90 के दशक की तरह राजपूतों को अपने साथ जोड़े रखने में कामयाब हो सकी तो चालीस से पचास सीटों पर राजपूत, यादव और मुसलमान का गठजोड़ सीधा लाभ पहुंचा सकेगा और तकरीबन 90 विधानसभा सीटों पर इसका असर दिखाई पड़ेगा.

माना जा रहा है कि अपने भरोसेमंद जगदानंद सिंह को बिहार में पार्टी की कमान सौंपकर लालू यादव ने एक तीर से कई निशाना साधा है (फाइल फोटो)


आरजेडी के पितामह लालू यादव के फैसले को बेटे तेजस्वी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योंकि वो अक्टूबर में हुए उपचुनाव में राजपूत मतदाताओं से मिले भारी समर्थन से खासे उत्साहित थे. सिमरी बख्तियारपुर में खास तौर पर राजपूतों ने खुला ऐलान कर दिया था कि इस बार वो जनता दल युनाइडेट (जेडीयू) के खिलाफ वोट करेंगे और आरजेडी के सिर जीत का सेहरा बांधेंगे. पिछले उपचुनाव में आरजेडी को बेलहर और सिमरी बख्तियारपुर में मिली जीत जबकि नाथनगर में थोड़े मतों से मिली हार, यह भरोसा दिलाने में मददगार साबित हुआ कि आरजेडी को सवर्ण मतदाताओं के नजदीक जाना चाहिए और उनके दिल-दिमाग से ये बात निकालनी चाहिए कि आरजेडी सवर्ण विरोधी पार्टी है..

पार्टी के एक बड़े नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि जल्द ही आरजेडी अलग-अलग फोरम से यह ऐलान करने वाली है कि वो सवर्ण आरक्षण की विरोधी नहीं बल्कि जिस तौर-तरीके से आनन-फानन में केंद्र सरकार द्वारा उसे लागू किया गया है वो उसकी विरोधी है.
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कुछ नेताओं के विरोध के बावजूद जगदानंद सिंह को अध्यक्ष चुनने की वजह

पार्टी सूत्रों की मानें तो आरजेडी के कद्दावर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री जयप्रकाश यादव ने जगदानंद सिंह के अध्यक्ष चुने जाने का अंदर ही अंदर विरोध किया. पार्टी के उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने भी जगदानंद सिंह के अध्यक्ष चुने जाने को लेकर नाराजगी जाहिर की लेकिन लालू और तेजस्वी दोनों के ग्रीन सिग्नल दिए जाने के बाद दोनों ने अपने विरोध के स्वर को दबा देना ही बेहतर समझा. पार्टी के एक नेता के मुताबिक जयप्रकाश यादव पिछड़ों की राजनीति के पैरोकार रहे हैं इसलिए वो संगठन का सर्वोच्च पद ऊंची जाति के नेता को दिए जाने का विरोध कर रहे थे. लेकिन शिवानंद तिवारी के विरोध की असली वजह साफ नहीं है पर पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि जगदानंद सिंह पार्टी के वफादार सिपाही हैं और शिवानंद तिवारी सरीखे नेता, जो पार्टी से कई बार रिश्ता तोड़ कर दोबारा इंट्री पाए हैं, के लिए सूट नहीं करता है.

जगदानंद सिंह के पार्टी के प्रति वफादारी की दुहाई इस बात को लेकर भी दी जाती है वो खुद ऐलान कर अपने बेटे को वर्ष 2015 में हरा चुके हैं जो बीजेपी की टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे. आरजेडी नेताओं के मुताबिक जगदानंद सिंह बेहद अनुशासित और वफादार नेता रहे हैं. लालू यादव की गैरमौजूदगी से दिशाहीन हो चुकी आरजेडी को हालिया उपचुनाव में मिली जीत ने जोश भर दिया है. पार्टी को लालू की अनुपस्थिति में एक ऐसे नेता की जरूरत है जो ऊंचे मापदंड की कसौटी पर सही बैठता हो और जिस पर लालू और तेजस्वी यादव दोनों आंख बंद कर भरोसा करते हों. जाहिर है वर्ष 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले लालू-तेजस्वी ने जगदानंद सिंह को आरजेडी की कमान सौंप कर एक तीर से कई निशाना साधे हैं.

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First published: November 29, 2019, 8:36 AM IST
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