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Opinion: कुशवाहा NDA से अलग हुए तो बिहार की राजनीति पर क्या होगा असर?

Opinion: कुशवाहा NDA से अलग हुए तो बिहार की राजनीति पर क्या होगा असर?

फाइल फोटो

फाइल फोटो

2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी ने एनडीए गठबंधन के साथ गठबंधन किया था, लेकिन अकेले दम पर महज 3 प्रतिशत वोट ही ला पाई थी. दूसरी ओर उस समय नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने 2014 के चुनाव में अकेले 15 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था.

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    बिहार में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला सामने आते ही एनडीए में बिखराव की खबरें सामने आने लगी हैं. प्रदेश के राजनीतिक दलों के बीच सियासी ‘खीर’ पकनी भी शुरू हो चुकी है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिहार में एनडीए गठबंधन का पूरा स्वरूप बदल जाएगा? ये सवाल इसलिए कि उपेन्द्र कुशवाहा की महागठबंधन के कई नेताओं से मुलाकात हो चुकी है. शरद यादव और तेजस्वी यादव से उनकी मुलाकात के बाद एनडीए में बिखराव के संकेत सामने आने लगे हैं. अब सवाल है कि अगर उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए छोड़ते हैं और महागठबंधन में शामिल होते हैं, तो बिहार की राजनीति पर इसका क्या असर होगा?

    वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर के अनुसार अगर उपेन्द्र कुशवाहा एनडीए से अलग होते हैं इससे एनडीए को ज्यादा नुकसान नहीं होगा. उन्होंने कहा, इससे एनडीए गठबंधन को नहीं, बल्कि खुद कुशवाहा का नुकसान होगा. इसके लिए उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि नीतीश कुमार से दूरी दिखाने और बीजेपी के साथ जुड़े रहने की जो मजबूरी कुशवाहा ने दिखाई है ये उनके राजनीतिक कौशल पर भी सवाल उठाते हैं.

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    मणिकांत ठाकुर के अनुसार उपेन्द्र कुशवाहा अपने स्टैंड और विचार लगातार बदलते रहते हैं. उनके बयानों के जरिये भी ये विरोधाभास सामने आते रहे हैं. उन्होंने दोनों तरफ जो दबाव बनाने की कोशिश की वह उनके कन्फ्यूजन को दिखाता है. दूसरी ओर कुशवाहा के मुकाबले नीतीश कुमार की विश्वसनीयता अब भी बनी हुई है. ऐसे में बीजेपी ने भी नीतीश कुमार पर ही अपना भरोसा जताया है.

    आंकड़े भी मणिकांत ठाकुर की बातों की पुष्टि करते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी ने एनडीए गठबंधन के साथ गठबंधन किया था, लेकिन पार्टी अकेले दम पर महज 3 प्रतिशत वोट ही ला पाई. दूसरी ओर, उस समय नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने 2014 के चुनाव में अकेले 15 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था.

    जाहिर है वोट शेयर के मामले में आरएलएसपी से जेडीयू ने पांच गुना ज्यादा वोट शेयर हासिल किए थे. 2015 के विधानसभा चुनाव में आरएलएसपी के साथ आने के बाद भी कुशवाहा वोटर एनडीए के साथ नहीं आए थे. यही नहीं, कई उपचुनाव में भी कुशवाहा समाज ने एनडीए का साथ नहीं दिया है.

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    दूसरी ओर अब सियासी समीकरण बदल गए हैं, नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन में शामिल हो गए हैं. उनके एनडीए से जुड़ने से इस बात की पूरी संभावना है कि गठबंधन का वोट शेयर और बढ़ेगा. निजी चैनलों के तमाम सर्वे भी यही बता रहे हैं कि नीतीश के आने से एनडीए की स्थिति और मजबूत हो गई है. ऐसी स्थिति में अगर कुशवाहा एनडीए से अलग भी होते हैं तो बीजेपी को इसका खास मलाल नहीं होगा.

    वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद का भी मानना है कि 2013 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के गठन के बाद भी कुशवाहा मास के नहीं मीडिया के लीडर रहे हैं. जमीन पर उनका जनाधार नगण्य है. उन्होंने कहा कि चार साल तक केन्द्रीय मंत्री रहते हुए भी कुशवाहा का बिहेवियर सीजन्ड पॉलिटिशियन का रहा है. ऐसे में उनकी विश्वसनीयता पर हमेशा सवाल रहे हैं. दूसरी ओर 2005 में नीतीश में एक विश्वसनीयता बनी है, 15 साल में काम के बदौलत बिहार की राजनीति में अपना एक इम्पैक्ट बना लिया है.

    बकौल फैजान अहमद, कुशवाहा के समर्थन में जो नेता नजर आ रहे हैं उनमें सांसद अरुण कुमार एनडीए के साथ रहने की दलील दे रहे हैं. वहीं, नागमणि और भगवान सिंह कुशवाहा जैसे नेता ‘फ्रीक्वेंट पार्टी चेंजर’ (दलबदल में माहिर) रहे हैं. ऐसे में अगर वे उनके सपोर्ट में भी बोलते हैं तो उसका कोई महत्व नहीं है.

    बहरहाल, उपेन्द्र कुशवाहा को एनडीए में कितना महत्व मिल रहा है यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि रामविलास पासवान भी नीतीश कुमार के पक्ष में खड़े हैं. दूसरी ओर अमित शाह से बार-बार समय मांगने के बाद भी कुशवाहा को मिलने का वक्त नहीं मिल रहा है. जाहिर है सियासी नफा-नुकसान को देखकर बीजेपी ने भी यह आकलन कर लिया है कि कुशवाहा एनडीए के फॉर्मूले के तहत 2 सीटों पर मान गए तो ठीक, नहीं तो उन्हें बॉय-बॉय करने में भी एनडीए को कम और कुशवाहा का नुकसान ज्यादा होगा.

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    Tags: Amit shah, Bihar NDA, Jdu, Nitish kumar, Upendra kushwaha

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