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लालू यादव को आज भी क्यों याद करते हैं गणितज्ञ वशिष्ठ बाबू के गांववाले? ये है खास वजह

गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण को ढूंढ़ने वाले को लालू की पहल पर मिली थी नौकरी.

गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण को ढूंढ़ने वाले को लालू की पहल पर मिली थी नौकरी.

वर्ष 1989 में लापता हो गए वशिष्ठ नारायण सिंह के 1993 में मिलने के बाद लालू प्रसाद उनसे मिलने बसंतपुर पहुंचे थे. वे तब इतने भावुक हो गए थे कि उन्होंने कहा था कि बिहार को हमें भले ही बंधक रखना पड़े, हम महान गणितज्ञ का इलाज विदेश तक कराएंगे.

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पटना. बिहार के रोल मॉडल माने जाने वाले गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह (Vashistha Narayan Singh) शुक्रवार को पंचतत्व में विलीन हो गए. वशिष्ठ बाबू के पैतृक गांव भोजपुर (Bhojpur) जिले के बसंतपुर में उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए हजारों की संख्या में लोगों ने नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी. इस दौरान वहां पहुंचे लोग जिस खास व्यक्ति की चर्चा बड़ी शिद्दत से कर रहे थे वे थे रांची जेल में बंद आरजेडी चीफ लालू प्रसायद यादव (RJD chief Lalu Prasad Yadav). दरअसल वे जब बिहार के मुख्यमंत्री थे तो वशिष्ठ बाबू के  नाम पर उन्होंने कुछ ऐसे काम किए जो आज भी स्मरणीय हैं.

खास तौर पर गुरुवार को जब वशिष्ठ बाबू के निधन के बाद उनके शव को ले जाने के लिए जब एंबुलेंस तक देने में बिहार सरकार नाकाम रही तो लोगों को लालू यादव की वो बात बरबस ही याद आ गई जो उन्होंने बसंतपुर में वशिष्ठ बाबू के बगल में बैठकर कही थी.

गौरतलब है कि वर्ष 1989 में लापता होने के बाद जब 1993 में छपरा के डोरीगंज से भिखारी जैसी हालात मिले गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह को उनके परिजन घर ले आए तो लालू प्रसाद उनसे मिलने बसंतपुर पहुंचे थे. लालू प्रसाद तब इतने भावुक हो गए थे  कि उन्होंने कहा था कि बिहार को हमें भले ही बंधक रखना पड़े, हम महान गणितज्ञ का इलाज विदेश तक कराएंगे.

वशिष्ठ नारायण सिंह, गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह
पटना के एक अस्पताल में भर्ती वशिष्ठ नारायण सिंह की अंतिम तस्वीर.


इसके बाद लालू प्रसाद ने 1994 में ही वशिष्ठ बाबू को बेहतर इलाज के लिए बंगलुरू स्थित निमहंस अस्पताल में सरकारी खर्चे पर भर्ती कराया जहां 1997 तक उनका इलाज चला. इससे उनकी स्थिति में सुधार हुआ और वहां से वे अपने गांव बसंतपुर लौट आए थे.

गांव के लोग इस बात को भी नहीं भूलते हैं कि आइंस्टीन की सापेक्षता के सिद्धांत को चुनौती देने वाले इस गणितज्ञ को ढूंढ़ने वाले 5 लोगों को लालू प्रसाद यादव की पहल पर नौकरी मिली थी. यही नहीं वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय में वर्ष 2005 से कुछ सालों तक स्नातकोत्तर गणित में प्रथम स्थान पाने वाले विद्यार्थियों को वशिष्ठ नारायण स्वर्ण पदक से अलंकृत किया जा रहा था. हाल के वर्षों में इसे बंद कर दिया गया है.

ग्रामीण बताते हैं कि गांव के सुदामा पासवान व कमलेश पासवान सारण जिले में अपनी बहन की शादी में फर्नीचर खरीदने के लिए गए थे. इस दौरान डोरीगंज में एक झोपड़ीनुमा होटल के बाहर फेंके गये जूठन में खाना तलाशते दोनों ने देख लिया. सूचना पर परिजन व मित्र सारण के डोरीगंज पहुंचे और उन्हें घर ले आए.

सात फरवरी 1993 को डोरीगंज (छपरा) में एक झोपड़ीनुमा होटल के बाहर प्लेट साफ करते मिले. (फाइल फोटो)


सूचना के बाद वर्ष 1993 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव बसंतपुर पहुंचे थे. उनकी पहल पर डॉ वशिष्ठ सिंह को ढूंढने वाले के भाई हरिशचंद्र सिंह, भतीजा संतोष सिंह व अशोक सिंह को नौकरी मिली. साथ ही डोरीगंज में होने की सूचना देने वाले सुदामा पासवान और कमलेश पासवान को भी नौकरी मिली.

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