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क्या खत्म हो जाएगी बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी की पार्टी ?

जीतन राम मांझी (फाइल फोटो)

जीतन राम मांझी (फाइल फोटो)

नीतीश विरोध के नाम पर बनी इस पार्टी का गठन वर्ष 2015 में तब हुआ था, जब जेडीयू के अंदर हुए विवाद के बाद मांझी ने 20 फरवरी 2015 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद उन्होंने एक मार्च 2015 को जीतन राम मांझी ने अपनी नयी राजनीतिक पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा यानि 'हम' बनाई.

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बुधवार को दो बड़े नेताओं के एक के बाद एक अचानक इस्तीफे के बाद हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा में भगदड़ सी स्थिति हो गई. पहले राष्ट्रीय प्रवक्ता दानिश रिजवान और फिर प्रदेश अध्यक्ष वृषिण पटेल ने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी. हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी की अनुपस्थिति में हुए इस घटनाक्रम के बाद कयास लगाए जाने लगे कि क्या बिहार में मांझी की पार्टी खत्म हो जाएगी?

ये सवाल इसलिए कि नीतीश विरोध के नाम पर बनी इस पार्टी का गठन वर्ष 2015 में तब हुआ था, जब जेडीयू के अंदर हुए विवाद के बाद मांझी ने 20 फरवरी 2015 को इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद उन्होंने एक मार्च 2015 को जीतन राम मांझी ने अपनी नयी राजनीतिक पार्टी हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा यानि 'हम' बनाई. तब एनडीए छोड़ चुके नीतीश कुमार से अदावत के बाद बीजेपी ने मांझी को हाथों हाथ लिया और बिहार में दलित चेहरे के तौर पर पेश कर दिया.

ये भी पढ़ें- RJD का 20 से 22 सीटों पर लड़ने का दावा, कांग्रेस के 'फ्रंट फुट' पर खेलने की तैयारी को झटका !

हालांकि 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की जीत और बीजेपी एनडीए गठबंधन की हार के साथ ही मांझी की पार्टी का प्रदर्शन भी बेहद फीका रहा. एक मात्र सीट पर जीतन राम मांझी को ही जीत मिली. इसके बाद मांझी का कद एनडीए में भी घटता चला गया. इसी क्षोभ में उन्होंने एनडीए का दामन छोड़ दिया और महागठबंधन का हिस्सा बन गए. हालांकि इस बीच नीतीश कुमार ने महागठबंधन से नाता तोड़ एनडीए का दामन थाम लिया था.

जाहिर है नीतीश विरोध के नाम पर खड़े हुए मांझी एनडीए में असहज महसूस करने लगे थे. लेकिन बदलते दौर में महागठबंधन में उन्हें दलित चेहरे के तौर पर प्रोजेक्ट तो किया जाता रहा, लेकिन उन्हें उतना महत्व नहीं मिला. इस बीच गठबंधन के बीच सीटों की खींचतान में पार्टी के भीतर ही आपसी अनबन बहुत बढ़ गई है. इस्तीफा दे चुके प्रदेश अध्यक्ष वृषिण पटेल मुंगेर लोकसभा सीट से लड़ना चाह रहे थे, लेकिन बात नहीं बन रही थी.

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वहीं राष्ट्रीय प्रवक्ता दानिश रिजवान पार्टी के भीतर पैसों की लूट-खसोट को लेकर प्रदेश अध्यक्ष पर आरोप लगा रहे थे. ऐसे में दोनों के बीच तू-तू-मैं-मैं काफी बढ़ गई. अंदरुनी खबर तो ये भी है कि आपस में हाथापाई भी हुई. जाहिर है पार्टी के भीतर कलह परवान पर है. वहीं दानिश रिजवान मांझी के करीबी माने जाते हैं जबकि वृषिण पटेल खुद को बड़ा नेता मानते रहे हैं.

बहरहाल बुधवार को लगातार दो बड़े इस्तीफों से जीतनराम मांझी की दावेदारी महागठबंधन में भी अब कमजोर होती दिख रही है. जिस तरह से शरद यादव की स्थिति हो गई है वैसी ही कमोबेश मांझी की भी हो गई है. ऐसे में आरजेडी उन्हें अपने दल से चुनाव लड़ने का ही ऑफर दे दे तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. पहले भी पार्टी के बड़े नेता रघुवंश प्रसाद सिंह कहते रहे हैं कि छोटी पार्टियों को आरजेडी के सिंबल पर चुनाव लड़ना चाहिए.

अब देखना दिलचस्प होगा कि 20 से 22 सीटों पर दावा करने वाली आरजेडी जब कांग्रेस के 'फ्रंट फुट' पर खेलने के दावे को भी भाव देने के मूड में नहीं लग रही है तो बिखरती जा रही जीतन राम मांझी की पार्टी को कितना महत्व देती है?

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