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तो इस कारण नीतीश कुमार ने चला मंत्रिपरिषद विस्तार का दांव !

नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

30 मई को पीएम मोदी के शपथ ग्रहण के बाद 31 मई को वापस पटना पहुंचने पर जिस तरह से नीतीश कुमार ने केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जातिगत भागीदारी का सवाल उठाया था, इससे स्पष्ट था कि वे मंत्रिपरिषद में भागीदारी को लेकर नाराज हैं.

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पीएम मोदी के मंत्रिपरिषद में शामिल होने से जेडीयू के इनकार के बाद बिहार में सीएम नीतीश ने अपने मंत्रिपरिषद का विस्तार किया. इसमें उन्होंने जेडीयू कोटे से आठ मिनिस्टर तो बनाए, लेकिन न तो बीजेपी और न ही एलजेपी कोटे से किसी को मंत्री बनाया. जाहिर है जेडीयू के इस रुख से कई सवालों ने जन्म ले लिया है. क्या नीतीश कुमार ने बीजेपी को जैसे को तैसा वाले अंदाज में जवाब दे दिया है? क्या नीतीश ने बीजेपी से बदला ले लिया है?

दरअसल नीतीश कुमार ने जिस तरीके से अपने मंत्रिपरिषद का विस्तार किया है इसने नई राजनीतिक अटकलबाजियों को जन्म दे दिया है. दरअसल 30 मई को पीएम मोदी के शपथ ग्रहण के बाद 31 मई को वापस पटना पहुंचने पर जिस तरह से नीतीश कुमार ने केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जातिगत भागीदारी का सवाल उठाया था, इससे स्पष्ट था कि वे मंत्रिपरिषद में भागीदारी को लेकर नाराज हैं.

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गौरतलब है कि मोदी मंत्रिमंडल में कुल 58 मंत्रियों ने शपथ ली है और इसमें से 32 सवर्ण मंत्री हैं. यानि कुल में पिछड़े, अति पिछड़े और दलित जातियों को 45 प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है. बिहार से भी जिन छह नेताओं को केंद्र में मंत्री बनाया गया है इनमें छह में से चार सवर्ण जाति हैं, जबकि एक पिछड़ी और एक दलित जाति से आते हैं.

वहीं रविवार को किए गए नीतीश कुमार के मंत्रिपरिषद विस्तार में बिहार में अपने कोटे में मंत्री पदों पर ज़्यादातर पिछड़ी जाति, अति पिछड़ी जाति और दलितों को तवज्जो दी है.  नीतीश कुमार ने महज दो सवर्ण और छह पिछड़ी, अतिपिछड़ी और दलित जातियों को उन्होंने मंत्री बनाया है. यानि 75 प्रतिशत पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित को प्रतिनिधित्व दिया है.

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जाहिर है इससे ये लग रहा है कि सीएम नीतीश ने बीजेपी को उसी की भाषा में जवाब दिया है. अब तो बिहार में विपक्षी पार्टियों ने कहना शुरू कर दिया है कि बीजेपी और एनडीए में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. हालांकि राजनीतिक गलियारों में अब तो ये भी कहा जा रहा है कि जेडीयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने मोदी कैबिनेट में शामिल न होकर और अपने मंत्रिपरिषद में जातिगत भागीदारी को तवज्जो देकर अगले साल बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बड़ा दांव खेला है.

हालांकि एनडीए की ओर से यही कहा जा रहा है कि बीजेपी-जेडीयू के बीच किसी तरह की तल्खी नहीं है, लेकिन जिस अंदाज में सीएम नीतीश कुमार ने अपने मंत्रिपरिषद का विस्तार कर पीएम मोदी के मंत्रिपरिषद के सामने एक खाका पेश करने की कोशिश की है. बहरहाल आने वाले समय में देखने वाली बात ये होगी कि सीएम नीतीश के दांव की काट में बीजेपी की अगली रणनीति क्या होगी.

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