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चिराग पासवान के लिए लिटमस टेस्ट क्यों माना जा रहा है झारखंड चुनाव? पढ़ें जानकारों की राय

News18 Bihar
Updated: November 20, 2019, 4:20 PM IST
चिराग पासवान के लिए लिटमस टेस्ट क्यों माना जा रहा है झारखंड चुनाव? पढ़ें जानकारों की राय
झारखंड विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने के फैसले को चिराग पासवान के आने वाले राजनीतिक करियर से जोड़कर देखा जा रहा है. (फाइल फोटो)

चिराग पासवान का झारखंड में अकेले लड़ने फैसला सही है तो उनके लिए चुनौती भी है. एक तरह से झारखंड चुनाव उनके लिए लिटमस टेस्ट होगा. इससे दो बातें तय होंगी. एक तो ये कि एलजेपी 50 में से कितनी सीटें जीतती है, इससे जनाधार का पता चलेगा. दूसरा यह कि चिराग का फैसला कितना सही रहा.

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पटना. बीते 5 नवंबर को चिराग पासवान (Chirag Paswan) ने लोक जन शक्ति पार्टी (LJP) के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल ली. इनके ये पद संभाले अभी 15 दिन ही हुए हैं, लेकिन उन्होंने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जो साहस भरे कहे जा सकते हैं. झारखंड में एनडीए (NDA) से अलग चुनाव लड़ना और सीधा 50 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा. दिल्ली में भी एलजेपी के एनडीए से अलग लड़ने का फैसला और फिर रविवार को एनडीए की बैठक में तल्ख तेवर का इजहार करना. ये कुछ ऐसी बातें हैं जो चिराग पासवान की ही पहल मानी जा रही है.

जाहिर है चिराग पासवान की ये पहल बीजेपी पर दबाव बनाने की राजनीति के तहत देखा जा रहा है वहीं, इसे चिराग पासवान के लिए लिटमस टेस्ट भी माना जा रहा है. अगर वे अपने इन दो प्रयोग में सफल होते हैं तो उनका राजनीतिक कद बढ़ना लाजिमी है, और वह इसका लाभ बिहार में अवश्य लेने की कोशिश करेंगे. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि अगर वे असफल होते हैं तो?

वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि चिराग पासवान अभी युवा हैं और राजनीति के लिए अपने पिता की तरह अनुभवी भी नहीं हैं. हालांकि उनके पास पार्टी का विस्तार करने की एक बड़ी जिम्मेदारी है, ऐसे में उनका झारखंड में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला सही माना जाएगा.

बकौल रवि उपाध्याय अगर उनका ये फैसला सही है तो उनके लिए चुनौती भी है. एक तरह से झारखंड चुनाव उनके लिए लिटमस टेस्ट होगा. इससे दो बातें तय होंगी. एक तो ये कि एलजेपी 50 में से कितनी सीटें जीतती है, इससे जनाधार का पता चलेगा. दूसरा यह कि चिराग का फैसला कितना सही रहा?

झारखंड में नीतीश कुमार की जेडीयू और चिराग पासवान की एलजेपी एक साथ चुनाव लड़ सकती है. (फाइल फोटो)


वहीं, इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार कहते हैं कि हर पार्टी विशेष का अधिकार है कि वह क्या निर्णय ले, और चिराग पासवान ने भी यही किया है. हालांकि चिराग पासवान ने जिस अंदाज में एनडीए में को-ऑर्डिनेशन नहीं होने की बात कही है, और तल्ख तेवर दिखाए हैं, इससे ये जाहिर होता है कि चिराग के मन में कुछ और भी है.

बकौल प्रेम कुमार अगर झारखंड के चुनाव में एलजेपी दो-तीन सीट भी जीत ले, या फिर अपना जनाधार ही बढ़ाने में कामयाब हो जाए तो, आने वाले समय में पार्टी की रणनीति बदल भी सकती है. वह आगे भी बीजेपी पर दबाव बना सकती है और बिहार में अगले साल होने वाले विधान सभा चुनाव में सीटों की बारगेनिंग से चिराग पासवान पीछे नहीं हटेंगे.हालांकि प्रेम कुमार ये भी कहते हैं कि जिस अंदाज में बीजेपी ने महाराष्ट्र मेंशिवसेना की जिद के आगे झुकने का फैसला नहीं किया. ठीक उसी अंदाज में झारखंड में आजसू को भी एक संदेश दिया है. झारखंड में अगर चिराग की पार्टी कुछ खास प्रदर्शन नहीं करती है तो चिराग के लिए बिहार में अपने लिए अधिक सीटों की मांग करना मुमकिन नहीं होगा.

नीतीश कुमार और रामविलास पासवान की पुरानी तस्वीर.


हालांकि अभी बिहार चुनाव में काफी वक्त बाकी है. बीजेपी की इस घोषणा के बाद कि सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ा जाएगा, बावजूद इसके सीटों के बंटवारे पर एनडीए के भीतर किचकिच तय बात मानी जा रही है. सीएम नीतीश की पार्टी की ओर से जो संकेत हैं उसके तहत पार्टी एक बार फिर 2010 जैसी बड़े भाई की भूमिका चाह रही है.

रवि उपाध्याय कहते हैं कि अभी तो काफी कुछ देखा जाना बाकी है क्योंकि पहले जेडीयू-बीजेपी में जब सीटों की हिस्सेदारी की बात होगी फिर एलजेपी का नंबर आएगा. जाहिर है एलजेपी के लिए क्या परिस्थिति बनेगी, और बिहार में उसके हिस्से कितनी सीटें आएंगी, यह काफी हद तक झारखंड में उसके अकेले लड़ने के बाद आने वाले चुनाव परिणाम पर निर्भर करेगा.

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First published: November 20, 2019, 4:18 PM IST
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