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Opinion: क्या भाषा विवाद जैक के निर्माण में हुई हड़बड़ी का है नतीजा?

Jharkhand Language Dispute: झारखंड जिस भाषा समस्या का सामना कर रहा है, इसके मूल में इसके निर्माण की प्रक्रिया है.

Jharkhand Language Dispute: झारखंड जिस भाषा समस्या का सामना कर रहा है, इसके मूल में इसके निर्माण की प्रक्रिया है.

Jharkhand Language Dispute: जैक के गठन के बावजूद अलग राज्य का निर्माण हो गया और जैक का जो कार्यक्षेत्र था, उसे झारखंड प ...अधिक पढ़ें

रांची. आज झारखंड जिस भाषा समस्या का सामना कर रहा है, इसके मूल में इसके निर्माण की प्रक्रिया है. इसका निर्माण 1995 में किया गया. उस समय केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और बिहार में लालू यादव के दल की सरकार थी. राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं. वह अल्पमत सरकार का नेतृत्व कर रही थी और अपने वजूद के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायकों पर निर्भर थी. यह समर्थन उसे इसी शर्त पर मिला था कि राबड़ी सरकार झारखंड के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी. लालू यादव ने अपने वादे के अनुसार काम किया और केन्द्र की बीजेपी सरकार तो पहले से ही अलग प्रदेश के समर्थन में थी. किसी भी नये प्रदेश के गठन के लिए सीमा आयोग का गठन किया जाता है, जो राज्य की सीमा निर्धारित करता है. लेकिन, झारखंड के गठन के मामले में ऐसा नहीं किया गया.

सच कहा जाय, तो इसे जरूरी भी नहीं समझा गया, क्योंकि गठन के पहले जैक( झारखंड एरिया आॅटोनोमस काउंसिल) यानी झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद काम कर रही थी और परिषद जिस क्षेत्र पर प्रशासन कर रही थी, वह क्षेत्र अपने आप झारखंड मान लिया गया. जैक का गठन 1994-95 में आनन फानन में किया गया था. उस समय भी सीमा तय करने के लिए कोई मेकैनिज्म नहीं बन पाया था. झारखंड आंदोलनकारी जिन क्षेत्रों को झारखंड मान रहे थे, उन्हें स्वायत्त परिषद द्वारा शासित प्रदेश मान लिया गया. सीमावर्ती लोगों की क्या भाषा है, इस पर विचार नहीं किया गया. वे विभाजन की स्थिति में बिहार में रहना चाहेंगे या झारखंड में यह भी नहीं पूछा गया. तब शायद लालू सरकार ने मान लिया था कि परिषद के गठन के बाद राज्य की मांग ही समाप्त हो जाएगी और झारखंड प्रदेश के लिए आंदोलन समाप्त हो जाएग. इसलिए सीमावर्ती लोगों से पूछना भी जरूरी नहीं समझा गया.

लेकिन जैक के गठन के बावजूद अलग राज्य का निर्माण हो गया और जैक का जो कार्यक्षेत्र था, उसे झारखंड प्रदेश मान लेने में कोई समस्या नहीं हुई. किसी ने विरोध नहीं किया. किसी ने आपत्ति भी नहीं की. जिन क्षेत्रों के लोगों को झारखंड में शामिल किया गया, उनमें से भी किसी ने आपत्ति नहीं की. उस एक बड़ा कारण यह था कि विभाजन के बाद झारखंड बहुत ही समृद्ध प्रदेश हो जाएगा, क्योंकि उसके पास अकूत भूसंपदा है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह विभाजन भाषा के आधार पर नहीं हो रहा था. अगर प्रदेश के सीमावर्ती इलाके के लोगों को लगता कि उनके ऊपर संथाली या मुंडारी भाषा थोपी जाएगी, तो वे झारखंड में शायद शामिल नहीं होना चाहते, क्योंकि बिहार के मगध इलाके से सटे लगभग सभी लोग मगही ही बोलते हैं. उधर बिहार के अंग इलाके से सटे झारखंड के लोग अंगिका ही बोलते हैं. बिहार से सटे एक या दो जिलों के अलावा अन्य जिलों में आदिवासी संख्या बहुत कम है. इसलिए यदि राज्य के गठन का उद्देश्य आदिवासी राज्य की स्थापना करना होता, तो फिर बिहार से सटे गैर आदिवासी वाले जिले नये राज्य में शामिल होते ही नहीं.

जाहिर है, झारखंड के गठन के समय भाषा समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया. खुद वहां के लोगों ने भी भाषा पक्ष पर ध्यान नहीं दिया और अब उन्हें इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि कुछ जिलों के नेता अपने अपने जिलों की भाषा को संरक्षण दे रहे हैं और उन भाषाओं को बोलने वालों को भी नौकरियों में प्राथमिकता देने की नीति बना रहे हैं, लेकिन बिहार से सटे इलाकों के मगही भाषियों और अंगिका भाषियों के हक को मार रहे हैं.

अगर भाषा ही नये प्रदेश का आधार होना था, तो फिर बिहार से सटे उन जिलों को जिसमें बिहारी बोलियां बोली जाती हैं, हरगिज झारखंड का हिस्सा नहीं बनाया जाता. लेकिन, अब वे जिले भी झारखंड के भाग हैं और उन्हें तो बिहारी बोलियों की वही हैसियत चाहिए, जो झारखंडी बोलियों को हैसियत दी जा रही है. जाहिर है, गलती राज्य के निर्माण और जैक के गठन के समय ही हुई.

Tags: Jharkhand news, Jharkhand Politics, Regional languages

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