कोऑर्डिनेशन कमिटी पर अब आर-पार की लड़ाई के मूड में मांझी! 10 जुलाई को ले सकते हैं बड़ा फैसला
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कोऑर्डिनेशन कमिटी पर अब आर-पार की लड़ाई के मूड में मांझी! 10 जुलाई को ले सकते हैं बड़ा फैसला
कोऑर्डिनेशन कमिटी पर राजद के रवैये से नाराज मांझी ने 10 जुलाई को पार्टी कोर कमिटी की बैठक बुलाई है.

कोऑर्डिनेशन कमिटी (Coordination Committee) पर राजद (RJD) से बात नहीं बनती देख जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) अब बड़ा फैसला लेने की तैयारी में हैं.

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पटना. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi) की ओर से लगातार कोशिश के बावजूद आरजेडी (RJD) टस से मस होने को तैयार नहीं है. लिहाजा पूर्व सीएम ने चार दिन बाद यानी 10 जुलाई को हम कोर कमेटी की बैठक बुलाई है. माना जा रहा है कि इस बैठक में मांझी कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं.

एक सप्ताह पहले जीतन राम मांझी ने कांग्रेस आलाकमान से मुलाकात कर बिहार चुनाव में कांग्रेस को अगुआई करने की मांग रखी थी. मांझी को लग रहा था कि कांग्रेस के हस्तक्षेप के बाद कोऑर्डिनेशन कमिटी बनाने के लिए आरजेडी तैयार हो जाएगा. लेकिन कांग्रेस की कोशिशों के बावजूद आरजेडी की तरफ से इसको लेकर कोई पहल नहीं की गई.

कोऑर्डिनेशन कमिटी पर एक सप्ताह का समय खत्म 



मांझी ने कांग्रेस से मुलाकात के बाद कोऑर्डिनेशन कमिटी पर फैसला लेने के लिए एक सप्ताह का समय दिया था, ताकि कोई बात बन सके. लेकिन कांग्रेस के प्रयास के बावजूद कोई फल नहीं निकलता देख पूर्व सीएम ने 10 जुलाई को पार्टी कोर कमिटी की बैठक बुलाई है. इस बैठक में वे कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं.
फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं मांझी- आरजेडी 

इससे पहले हम पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर कोई भी फैसला लेने के लिए जीतन राम मांझी को अधिकृत कर दिया गया था. उधर आरजेडी ने साफ कह दिया कि मांझी कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं. आरजेडी नेता मृत्युंजय तिवारी ने कहा कि मांझी सीनियर लीडर हैं, पर जिद से राजनीति नहीं चलती. ऐसे में वे फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं.

बिहार में विधानसभा चुनाव अक्टूबर महीने में प्रस्तावित हैं. यह कहा जा चुका है कि चुनाव नियत समय पर ही होंगे. सभी राजनीतिक दल भी इस बात को लेकर सहमत हैं कि चुनाव समय से हो जाने चाहिए. इसके लिए राज्य में बड़ी संख्या में ऑनलाइन चुनावी रैलियां होने लगी हैं. चुनावी गठबंधन को लेकर भी खूब बयानबाजी हो रही है. ग्रामीण इलाकों में भी संभावित प्रत्याशी अपनी पैठ बढ़ाने में जुट गये हैं. सोशल डिस्टेंसिंग को ताक में रख कर कई आयोजन हो रहे हैं. राजनीतिक दलों द्वारा एक दूसरे के नेताओं और कार्यकर्ताओं को तोड़ने और अपने दल में शामिल करने की भी कवायद जारी है.

 
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