बिहार: क्यों आया सूबे में सियासत के सिरमौर रहे लालू परिवार का अवसान काल? पढ़ें 5 वजह

अपनी स्थापना के बाद पहली बार आरजेडी लोकसभा चुनाव में खाता नहीं खोल पाई. यहां तक कि लालू की बेटी मीसा भारती भी चुनाव हार गईं. जाहिर है कभी बिहार की सियासत के सिरमौर रहे लालू परिवार के लिए यह अवसान काल है.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 12, 2019, 5:47 PM IST
बिहार: क्यों आया सूबे में सियासत के सिरमौर रहे लालू परिवार का अवसान काल? पढ़ें 5 वजह
राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 12, 2019, 5:47 PM IST
लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) में नेतृत्व संकट गहराया तो उन्होंने राबड़ी देवी को आगे कर दिया. इसके बाद राबड़ी देवी बिहार की तीन बार मुख्यमंत्री रहीं. हालांकि, वर्ष 2005 में सत्ता का साथ छूटा तो सियासी समीकरण बदलते चले गए. 2016 में एक बार फिर लालू यादव जेल गए तो बेटे तेजस्वी यादव को कमान सौंप दी. लेकिन पत्नी राबड़ी देवी और दोनों बेटे उनकी विरासत संभालने में नाकाम साबित हुए.

दरअसल, अपनी स्थापना के बाद पहली बार आरजेडी लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल पाई है. यहां तक कि लालू की बेटी मीसा भारती भी चुनाव हार गईं. जाहिर है कभी बिहार की सियासत के सिरमौर रहे लालू परिवार के लिए यह अवसान काल है. ऐसे में सवाल उठता है कि इसके लिए आखिर कौन से कारण जिम्मेदार हैं?



नीतीश को टारगेट करना पड़ा भारी
वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में जब आरजेडी को महज 22 सीटें मिलीं तो माना जाने लगा कि अब लालू परिवार का राजनीतिक अवसान हो गया है. इसके बाद लालू यादव ने नीतीश कुमार को अपने पाले में किया और 2015 के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त जीत हासिल की. अधिक सीटें जीतने के बावजूद भी कम सीट वाले नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बने रहना लालू परिवार पचा नहीं पाया.

माना जाता है कि तत्कालीन उपमुख्यमंत्री तेजस्वी और तेजप्रताप सरकार पर अपना प्रभुत्व दिखाने के लिए अनावश्यक दबाव भी बनाने लगे. दोनों के व्यवहार और बड़बोलेपन से नीतीश असहज महसूस करने लगे और आजिज आकर उन्होंने अलग राह चुन ली. इस तरह लालू परिवार एक बार फिर सत्ता से बाहर हो गया.

तेजस्वी-तेजप्रताप विवाद के साइड इफेक्ट
तेज प्रताप ने कई अवसरों पर छोटे भाई तेजस्वी को अर्जुन बताते हुए अपनी भूमिका कृष्ण की बताई. लेकिन, दोनों भाइयों में मनमुटाव की खबरें भी आम रहीं. तेजप्रताप का घर छोड़ काशी का भ्रमण करना हो या लोकसभा चुनाव में अपने पसंदीदा उम्मीदवार उतारना, दोनों भाइयों के बीच खींचतान का नकारात्मक संदेश गया. ऐसे में यादव और मुस्लिम जातियों में भी आरजेडी के प्रति उतना पुख्ता विश्वास नहीं रह गया जैसा कि लालू प्रसाद के जमाने में हुआ करता था.
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वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा
लालू यादव की अनुपस्थिति में पार्टी में नंबर दो की हैसियत वाले रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे वरिष्ठ नेता भी बैकफुट पर आ गए. उपेक्षा से आजिज कुछ नेताओं ने या तो पाला बदल जेडीयू का दामन थाम लिया या निष्क्रिय हो गए. इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी में जनाधार वाले नेताओं का टोटा हो गया. नीतीश कुमार के पिछड़ा-अति पिछड़ा, दलित और महादलित के दांव से पहले ही अपने वोट बैंक में सेंधमारी का शिकार हो चुकी आरजेडी मुस्लिम-यादव वोट पर सिमट कर रह गई.

बदलते दौर की राजनीति पहचानने में चूक
लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने जिस अंदाज में बिहार में आरजेडी का नेतृत्व किया और अपने भाषणों में जिस तरह के 90 के दशक वाली राजनीति करनी चाही, उसे जनता ने नकार दिया. सवर्ण आरक्षण के विरोध के मसले पर आरजेडी के भीतर ही दो राय उभरीं. रघुवंश प्रसाद सिंह ने आरजेडी के पिछले घोषणा पत्र का हवाला देते हुए बताया कि पार्टी इसके पक्ष में है. इससे जनता में संदेश गया कि आरजेडी में भी लालू परिवार ही सिर्फ सवर्णों का विरोधी है न कि पार्टी के सभी नेता.

गैर यादव अन्य हिंदू जातियों की एकता
तेजस्वी यादव ने जिस तरह से जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश सहनी को अपने साथ लिया और इनको अपनी हैसियत से अधिक सीटें दीं, तो लगा कि यह समीकरण काम कर जाएगा. हालांकि, इन तीनों नेताओं का जनाधार पीएम मोदी और सीएम नीतीश के चेहरे के सामने फीका पड़ गया. अति पिछड़ी जातियां और सवर्ण जहां पीएम मोदी के पक्ष में खड़े रहे, वहीं गैर यादव पिछड़ी और महादलित जातियों ने नीतीश को ही अपना नेता माना. ऐसे में आरजेडी के खिलाफ एक बड़ा वर्ग एक साथ आ गया.

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