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BJP-JDU की दोस्ती में क्यों पड़ रही दरार? जानें इनसाइड स्टोरी

Anand Amrit Raj | News18 Bihar
Updated: September 14, 2019, 2:50 PM IST
BJP-JDU की दोस्ती में क्यों पड़ रही दरार? जानें इनसाइड स्टोरी
बीजेपी-जेडीयू के बीच रिश्तों में बढ़ती खटास के पीछे कई वजहें हैं.

1995 में बिहार विधान सभा चुनाव में जब लालू यादव ने फिर से विरोधियों को पटखनी दी तो इनके पास एक होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था.

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  • Last Updated: September 14, 2019, 2:50 PM IST
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पटना. खट्टे-मीठे रिश्तों के बीच बीजेपी और जेडीयू (BJP And JDU) की दोस्ती पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं. सवाल, इस बात का है कि बड़ा कौन? दोनों पार्टियों के अपने दावे हैं, लेकिन इनके बीच ये जानना ज़रूरी है कि बीजेपी और जेडीयू की दोस्ती की शुरुआत कहां से हुई और किन परिस्थितियों में हुई. इनके बीच समस्या कहां से शुरू हुई? दरअसल 90 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा था तब किसी ने सोचा नहीं था कि लालू के इस तिलिस्म को तोड़ा भी जा सकता है. यही वजह रही कि बीजेपी और जेडीयू की दोस्ती की बुनियाद पड़नी शुरू हुई. तब जेडीयू समता पार्टी के नाम से जानी जाती थी. जॉर्ज फर्नाडिस और अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर जेडीयू (तब समता पार्टी) और बीजेपी के बीच दोस्ती हुई और आगे बढ़ी.

वर्ष 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव में जब लालू यादव ने फिर से विरोधियों को पटखनी दी तो इनके पास एक होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था. तब बीजेपी और जेडीयू ने अलग-अलग होकर चुनाव लड़ा था. बीजेपी को 53 और जेडीयू को महज 7 सीट पर संतोष होना पड़ा था. हालांकि इसी हार ने बीजेपी और जेडीयू (तब समता पार्टी) की दोस्ती की नींव रख दी थी.

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कांग्रेस के पराभव काल और क्षेत्रीय दलों के उभार के बीच 90 के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी और जॉर्ज फर्नांडिस ने बीजेपी और समता पार्टी का गठबंधन कर आने वाली राजनीति को एक नई दिशा देने की कोशिश की थी (फाइल फोटो)




1996 में लोकसभा चुनाव हुआ और पहली बार समता पार्टी और बीजेपी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा. बीजेपी ने बिहार में 18 सीटें जीतीं और समता पार्टी के हिस्से 6 सीटें आईं. वर्ष 2000 में दोनों पार्टियों ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा तो बीजेपी को 67 सीटें मिलीं हालांकि समता पार्टी के हिस्से में कम सीटें आईं. 30 अक्टूबर, 2003 को जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) के अस्तित्व में आने के बाद वर्ष 2005 में विधानसभा चुनाव दोनों पार्टियों ने साथ होकर लड़ा. फरवरी 2005 में नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो सही, लेकिन 7 दिन के अंदर ही बहुमत खो बैठे. राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा. तब रामविलास पासवान सत्ता की चाबी लिए घूम रहे थे.

बीजेपी-जेडीयू ने लालू यादव को सत्ता से उखाड़ फेंका
2005 के नवंबर में जब विधानसभा चुनाव हुआ तो बीजेपी और जेडीयू ने मिलकर चुनाव लड़ा और लालू यादव को सत्ता से उखाड़ फेंका. तब बीजेपी ने बड़े दल होने के बावजूद नीतीश कुमार को बिहार की सत्ता सौंप दी. तब नारा बना था नया बिहार, नीतीश कुमार. 2010 में विधानसभा चुनाव हुआ तब बीजेपी और जेडीयू ने एक बार फिर मिलकर चुनाव लड़ा और शानदार जीत हासिल की. हालांकि जीत के बावजूद यहां से जेडीयू और बीजेपी के दोस्ती में दरार डलनी शुरू हो गई. दरअसल बीजेपी, जेडीयू से कम सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसकी जीत का अनुपात ज्यादा था. तब चुनाव का नारा बना था, नया बिहार, नीतीश सुशील फिर एक बार.

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वहीं, 2010 के बाद बीजेपी में नरेंद्र मोदी का दौर शुरू हो गया था. मोदी राष्ट्रीय मानचित्र पर तेज़ी से उभर रहे थे और नीतीश मोदी के ख़िलाफ़ माने जाते थे. इसी को लेकर बीच बीजेपी और जेडीयू के बीच दूरियां लगातार बढ़ती गईं. और आख़िरकार 2013 में बीजेपी और जेडीयू की बरसों पुरानी दोस्ती टूट गई.


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2010 में पंजाब के लुधियाना में एनडीए के लिए प्रचार करने के दौरान एक साथ चुनावी मंच पर नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार साथ दिखे थे. तब उनकी ये तस्वीर काफी सुर्खियों में रही थी. यही तस्वीर जब बिहार के अखबारों में बीजेपी ने विज्ञापन के तौर पर छपवाई तो नीतीश कुमार ने ऐतराज किया. इसके बाद बीजेपी-जेडीयू में तल्खी बढ़ी और दोनों पार्टियों की राह अलग हो गई. (फाइल फोटो)


परिणाम ये रहा कि 2014 में जेडीयू ने अकेले लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन उसे इसका खमियाजा भुगतना पड़ा. नीतीश की पार्टी महज दो सीट पर सिमट गई. दूसरी तरफ बीजेपी का ग्राफ बढ़ता गया. इस वजह से 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश ने धुर विरोधी लालू यादव ने गठबंधन कर लिया. परिणाम ये रहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद बीजेपी को करारी हार मिली.




डेढ़ साल में ही बीजेपी के पास लौट आए नीतीश
हालांकि जेडीयू-आरजेडी की ये दोस्ती डेढ़ साल भी नहीं चली और नीतीश फिर बीजेपी के साथ आ गए. 2019 के लोकसभा चुनाव में इस दोस्ती का परिणाम ये रहा कि बिहार की 40 में से 39 सीटों पर इनका कब्जा हो गया. लेकिन, अब जबकि अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं तो जेडीयू और बीजेपी दोनों एक दूसरे को अपनी शक्ति का अहसास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं.


जेडीयू और बीजेपी के बीच तल्ख़ी बढ़ने की बड़ी वजह यह भी है कि बीजेपी चाहती है कि 2019 के फ़ॉर्मूले पर सीट बंटवारा हो. जबकि जेडीयू चाहती है 2010 का फॉर्मूला लागू हो. बहरहाल सवाल ये है कि इस मसले पर दोनों की दोस्ती टूट जाएगी या फिर अटूट रहेगी?


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First published: September 14, 2019, 1:18 PM IST
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