लाइव टीवी

बिहार: अमीर और गरीब में भेद करती है चमकी बुखार, जानिए कैसे...

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: June 19, 2019, 5:08 PM IST
बिहार: अमीर और गरीब में भेद करती है चमकी बुखार, जानिए कैसे...
मुजफ्फरपुर के SKMCH में बीमार बच्चे को गोद में लिए अभिभावक

यह सवाल अब तक एक गुत्थी है कि बिहार में इन्सेफलाइटिस बीमारी कुछ खास जगहों पर ही बच्चों को अपना शिकार क्यों बनाती हैं? क्या वजह है जो 80 प्रतिशत से अधिक मामले मुजफ्फरपुर जिले से आते हैं?

  • Share this:
बिहार में अभी तक एक्यूट इनसेफेलाइटिस सिंड्रोम ( AES ) बीमारी से 144 बच्चों की मौत हो चुकी है. चमकी बुखार नाम से जाना जाने वाला ये रोग बीते कई वर्षों से मुजफ्फरपुर और आसपास के जिलों में लाइलाज बना हुआ है. हर वर्ष बहुत मासूम बच्चे असमय मौत के आगोश में समा जाते हैं.

AES बीमारी के लक्षण

तेज बुखार, शरीर में ऐंठन, गले में दिक्कत के लक्षण के साथ सही इलाज नहीं हुआ तो चंद दिनों में ही बच्चों की जान चली जाती है. बिहार में मौत का दूसरा नाम बन चुके चमकी बुखार ऐसे ही कहर बरपा रही है. कुछ साल पहले तक इस बीमारी का ज़िम्मेदार मच्छरों को माना जाता था, लेकिन बाद में हुए परीक्षणों से पता चला कि कई मामलों में जलजनित एंटेरो वायरस की मौजूदगी थी. वैज्ञानिकों ने इसे AES यानि एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम का नाम दिया.

हालांकि यह सवाल अब तक एक गुत्थी की तरह है कि ये बीमारियां कुछ खास जगहों पर ही बच्चों को अपना शिकार क्यों बनाती है ? क्या वजह है जो 80 प्रतिशत से अधिक मामले मुजफ्फरपुर जिले से आते हैं?

गांव, गरीबी और गंदगी की बीमारी
इंसेफेलाइटिस से जिन बच्चों की मौत हुई है, उनमें से अधिकतर गरीब महादलित समुदाय से आते हैं. इसमें मुसहर और दलित जातियां शामिल हैं. इन सब में एक कॉमन बात जो पाई गई वह ये कि ज्यादातर बच्चे कुपोषण का शिकार थे. प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ निगम प्रकाश भी कुपोषण को इस बीमारी के लिए एक बड़ा कारण मानते हैं.

इन इलाकों में सबसे अधिक प्रकोप
Loading...

मुजफ्फरपुर समेत तिरहुत और चंपारण के जिन इलाकों में ये बीमारी कहर बनकर टूटी है इनमें अधिकतर गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले लोग रहते हैं. मुजफ्फरपुर के मुसहरी, कांटी, मीनापुर और मोतीपुर जैसे इलाके में AES का अधिक प्रकोप है.

वहीं सीतामढ़ी के रुन्नी सैदपुर, वैशाली का का कुछ इलाका, समस्तीपुर और पूर्वी चंपारण के लीची बेल्ट में इस बीमारी ने अब तक सैकड़ों बच्चों की जान ले ली है. इसका दायरा बढ़कर अब शिवहर और वैशाली के दो ब्लॉक में भी पहुंच गया है.

इन इलाकों में कुपोषण कॉमन समस्या
इन इलाकों अगर कुछ कॉमन है तो वह गरीबी और कुपोषण की समस्या है. मुजफ्फरपुर के लोग ओवरऑल 24 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे आते हैं, लेकिन मुसहरी, कांटी, मीनापुर और मोतीपुर जैसे इलाके में ये आंकड़ा 40 प्रतिशत के पार हो जाता है.

जाहिर है इन इलाकों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है. बढ़ती गर्मी के बीच बच्चों के पोषण से जुड़ी योजनाओं की नाकामी और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में बीमारी से निपटने के इंतजाम नहीं होने के कारण भी मौतों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है.

गरीबों के लिए ग्लूकोमीटर तक नहीं
गौरतलब है कि इस बीमारी में ग्लूकोज का स्तर अचानक गिरने की स्थिति हो जाती है जिसे हाइपोग्लाइसीमिया कहा जाता है. इस दौरान शरीर रिजर्व ग्लूकोज का इस्तेमाल करता है, लेकिन कुपोषित बच्चों के शरीर में रिजर्व ग्लूकोज नहीं रहता है ऐसे में आधे घंटे की भी देरी से बच्चे की मौत हो जाती है.

गरीब समुदाय से आने वाले बच्चों में ये बीमारी इसलिए भी कहर बनकर टूटती है क्योंकि इनके पास इलाज के पर्याप्त साधन नहीं होते. वो महंगे अस्पतालों में जा नहीं सकते और सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था भगवान भरोसे ही रहती है.

अधिकतर मामलों में सबसे पहले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) पर बच्चों को इलाज के लिए लाया जाता है, लेकिन यहां ग्लूकोमीटर तक नहीं होते. इससे पीड़ित बच्चे के शरीर में ग्लूकोज का स्तर मापा जाता है. जब तक मामला SKMCH रेफर किया जाता है हालत बिगड़ जाती है और अंतत: बच्चे की मौत हो जाती है.

जागरूकता अभियान का अभाव
2017 और 2018 में जब कम गर्मी पड़ी थी तो AES से 11 और 7 मौतें हुई थीं, लेकिन इस साल जून की शुरुआत से ही पारा 40 डिग्री के पार जा पहुंचा. ऐसे में बीमारी का प्रकोप भी बढ़ता गया. लोकसभा चुनाव को लेकर जागरूकता अभियान भी नहीं चलाया गया.

दरअसल इस अभियान के दौरान बच्चों को गर्मी से बचने के लिए पूरी बांह के कपड़े पहनने, सूर्य की रोशनी में ज्यादा देर नहीं रहने और रात में कुछ खाने के बाद ही सोने की सलाह दी जाती है. ORS के पैकेट भी बांटे जाते हैं. लेकिन इस बार प्रशासन नाकाम रहा.

AES से मौत का ब्योरा

वर्ष                                इन्सेफलाइटिस से मौतें
2010                                          24
2011                                        197
2012                                        275
2013                                        143
2014                                        355
2015                                          35
2016                                          04
2017                                          11
2018                                          07
2019                                        128 (17 जून तक)

गरीब-अमीर में भेद करती सरकार !
1995 से ही यह रहस्यमय बीमारी यहां बच्चों को अपना शिकार बनाती आई है. हर साल मई और जून के महीने में बिहार के विभिन्न कस्बे इस बीमारी की चपेट में आते हैं और बच्चों के मरने का सिलसिला शुरू हो जाता है. जब यह बीमारी आती है तब सरकार सक्रिय होती है, ऐसा क्यों?

सरकारी आंकड़ों में जिला गरीबी और रहन-सहन के निम्नतम मानकों को भी पूरा नहीं कर पाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से चलाए जा रहे कुपोषण के खिलाफ अभियान का क्या फायदा? शासन जब अपने नौनिहालों की इस कमी को भी पूरा नहीं कर पाता तो ऐसे शासन का क्या फायदा ?

ये भी पढ़ें-


नीतीश के मुजफ्फरपुर पहुंचने से पहले तीन और बच्चों ने तोड़ा दम, 132 पहुंचा मौत का आंकड़ा




चमकी बुखार का क़हर: BJP नेता ने CM नीतीश पर उठाए सवाल, दी ये सलाह

खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए पटना से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: June 18, 2019, 10:44 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...