पॉलिटिकल किस्से: एक IPS अफसर के कारण बिहार चुनाव में नजर नहीं आ रहे लालू, पढ़ें पैजामे में चूहा छोड़ने का किस्सा

लालू प्रसाद यादव और गुजरात कैडर के 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना के तकरार की कहानी.
लालू प्रसाद यादव और गुजरात कैडर के 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना के तकरार की कहानी.

Bihar Chunav 2020: राकेश अस्थाना (Rakesh Asthana) 1984 के बैच के गुजरात कैडर के IPS अफसर हैं. वाजपेयी सरकार आने के बाद अस्थाना गुजरात कैडर वापस चले गए और मनमोहन सिंह सरकार आने के बाद लालू यादव (Lalu Yadav) को लगा कि अस्थाना रूपी बेताल का पीछा उनसे छूटा, लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 14, 2020, 6:57 AM IST
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पटना. बिहार में विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) का आगाज हो चुका है. इसी के साथ बिहार में पुराने राजनीतिक किस्से और कहानियां सुनने और सुनाने का सिलसिला शुरू हो गया है. आज हम ऐसे ही एक कहानी आपको सुना रहे हैं, जो 90 के दशक में बिहार के राजनीतिक गलियारे में काफी चर्चित रही थी. आज बात करेंगे हम बिहार के दिग्गज नेता और आरजेडी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) और गुजरात कैडर के 1984 बैच के आईपीएस (IPS) अधिकारी राकेश अस्थाना (Rakesh asthna) के बीच तकरार की. बिहार में यह पहला चुनाव हो रहा है, जिसमें लालू प्रसाद की उपस्थिति नहीं है. इसके पीछे की वजह कहीं न कहीं चारा घोटाला के शुरुआती जांच अधिकारी राकेश अस्थाना ही हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाला में सलाखों के पीछे पहुंचाने में गुजरात कैडर के इस अधिकारी का बड़ा हाथ रहा है. राकेश अस्थाना और लालू प्रसाद के बीच किस्से और कहानियां राजनीतिक गलियारे में काफी सुर्खियां बटोर चुकी हैं. अस्थाना को लेकर भले ही आपके दिमाग में घंटी न बजती हो, लेकिन लालू प्रसाद के समर्थकों के बीच अस्थाना काफी मशहूर हैं.

क्यों लालू प्रसाद यादव के समर्थकों के बीच अस्थाना मशहूर हैं
राकेश अस्थाना देश में चर्चित चारा घोटाले की प्रारंभिक जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं. राकेश अस्थाना के सीबीआई में रहते ही लालू प्रसाद यादव पर चारा घोटाले में शिकंजा कसा गया था. साल 2017 में सीबीआई के एडिशनल डायरेक्टर रहते भी राकेश अस्थाना लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के लिए मुसीबत बन कर आए थे. राकेश अस्थाना के हाथ लालू और उनके परिवार की बेनामी संपत्ति और साल 2006 में लालू यादव के रेल मंत्री रहते रेलवे के दो होटलों की नीलामी में गड़बड़ी की जांच की जिम्मेदारी थी.

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मौजूदा एनसीबी चीफ राकेश अस्थाना देश में चर्चित चारा घोटाले की प्रारंभिक जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं. (पीटीआई फोटो)

साल 2107 में सीबीआई के मुताबिक प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि होटल आवंटन में गड़बड़ियां की गई. होटल लीज पर लेने के बदले जमीन ली गई. 65 लाख में 32 करोड़ की जमीन ली गई. धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के केस में आईपीसी की धारा 420 और 120बी के तहत मामला दर्ज किया गया. सीबीआई ने तब बताया था कि लालू प्रसाद यादव जमीन के लिए होटल देने की शर्तों में ढील दी. जब लालू यादव रेलमंत्री थे तब रेलवे के दो होटलों को आईआरसीटीसी को ट्रांसफर किया गया था और इनकी देखभाल करने के लिए टेंडर इशू किए गए थे. बाद में यह पाया गया कि टेंडर बांटने में गड़बड़ियां हुई हैं.



लालू यादव के 1995 में मुख्यमंत्री बनने के बाद की कहानी
बहरहाल लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार के लिए राकेश अस्थाना कोई अनजान नाम नहीं हैं. बात है लालू यादव के 1995 में मुख्यमंत्री बनने के बाद की. सीबीआई चारा घोटाले की जांच शुरू कर चुकी थी. राकेश अस्थाना धनबाद में थे और जांच उनके हवाले थी. तब झारखंड अलग राज्य नहीं था. जांच के सिलसिले में अस्थाना और उनके साथी अफसर पटना में लालू से पूछताछ करने पहुंचे. पर लालू यादव से पूछताछ तो दूर मुलाकात संभव नहीं हो पा रही थी.

चारा घोटाला में सीबीआई का कसा था शिकंजा
जाहिर है कि अस्थाना पर तरह-तरह के दबाव पड़े. हथकंडे अपनाए गए. अस्थाना कोलकाता में बैठे संयुक्त निदेशक यूएन विश्वास के चहेते थे. विश्वास ने जांच की लगभग पूरी धारा लालू की संलिप्तता की ओर मोड़ दी. किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि बात क्या है. लालू इस कदर क्यों सामने न आने पर अड़े हुए हैं. पूरा मामला तब साफ हुआ जब किसी नेता के कहने पर बिहार सरकार के एक अफसर ने अस्थाना के एक साथी अफसर से किसी बहाने मुलाकात की.

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लालू प्रसाद यादव से मिलने को आ सकते हैं राजद नेता. फोटोः News 18


मुलाकात से साफ हुआ कि यादव को दरअसल उनके कुछ समर्थक सीबीआई से मिलने से रोक रहे हैं. लालू के नजदीकी राष्ट्रीय जनता दल के कुछ नेता बेहद डरे हुए थे. उन्होंने सुन रखा था कि सीबीआई पूछताछ के दौरान अस्थाना पीटते हैं. अगर बस इतना ही होता तो गनीमत थी. इन नेताओं ने जाने कहां से यह सुन रखा था कि सीबीआई के अफसर पैजामे के अंदर चूहा छोड़ देते हैं. और तो और खूब मिर्च वाला खाना खिला कर पानी नहीं देते.

क्यों लालू सीबीआई से नहीं मिलना चाहते थे?
जाहिर सी बात थी कि जिस अफसर ने सुना, उसने इन बातों को खारिज किया. राजद नेता को भरोसा दिलाया कि अस्थाना चाहे जितने भी सख्त अफसर हों वे किसी मुख्यमंत्री के साथ तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकते. अस्थाना चाहे लालू प्रसाद यादव से कितनी भी इज्जत से पेश आए हों लेकिन ये भी सच है लालू प्रसाद को चारा घोटाले में जेल का मुंह तो देखना ही पड़ा. चारा घोटाले से बिहार की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई. वाजपेयी सरकार आने के बाद अस्थाना गुजरात कैडर वापस चले गए और मनमोहन सिंह सरकार आने के बाद लालू यादव को लगा कि अस्थाना रूपी बेताल का पीछा उनसे छूटा. लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था.

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लालू के साथ तेजस्वी यादव
(Photo: IANS)


रेलमंत्री रहने के दौरान सूरत के पास एक रेल दुर्घटना हुई, लालू यादव बतौर मंत्री स्पॉट पर मुआयना करने पहुंचे. लालू को इस बात का अंदाजा नहीं था कि अस्थाना वहां पुलिस कमिश्नर थे. अचानक अस्थाना को देखकर लालू यादव का पारा चढ़ गया. वे चिल्लाने लगे. इसी बीच कुछ नवयुवकों ने बर्फ के पत्थर जैसे टुकड़े लालू पर फेंके. जाहिर है बर्फ को तो पिघलना ही था. सबूत बचने की तो कोई संभावना थी ही नहीं. लालू घबरा गए और घटनास्थल से भागे. दिल्ली लौट कर उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी हत्या कराना चाहते हैं.

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यूपीए सरकार में लालू ने हरसंभव कोशिश की कि वे चारा केस से बरी हो जाएं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कई वर्षों का वनवास काटने के बाद पिछले विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव का समय बहुरा ही था कि अस्थाना फिर हाजिर हो गए. चारा घोटाले की जांच अभी चल रही है और ऊपर से इस बीच मोदी की सरकार आ गई. अस्थाना दिल्ली में अतिरिक्त निदेशक के पद पर काबिज हो गए. मोदी से नजदीकियों की वजह से सीबीआई में उनकी खासी धाक है ही.
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