ANALYSIS: बिहार में कितना असर डालेगा राहुल-तेजस्वी का एक मंच पर आना?
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ANALYSIS: बिहार में कितना असर डालेगा राहुल-तेजस्वी का एक मंच पर आना?
फाइल फोटो

राहुल गांधी ने पूर्णिया, गया, कटिहार और सुपौल में सभाएं की, लेकिन एक भी सभा उन क्षेत्रों में नहीं हुई, जिसमें आरजेडी के उम्मीदवार थे.

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बिहार में तीन चरणों के चुनाव हो जाने और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की चार चुनावी सभा हो जाने के बाद तेजस्वी यादव राहुल गांधी के साथ एक मंच पर नजर आए. पूर्णिया, गया, कटिहार और सुपौल में राहुल गांधी की एक भी सभा में तेजस्वी के मंच शेयर करने न करने पर कई सवाल उठे कि क्या महागठबंधन में क्या सब कुछ ठीक नहीं है? क्या सीटों के तालमेल में हुए खींचतान का असर चुनाव प्रचार पर पड़ रहा है. ये सवाल उठा कि क्यों नहीं आरजेडी और कांग्रेस के नेता एक-दूसरे के प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार में नहीं जा रहे? इन तमाल सवालों और अटकलों के बाद राहुल-तेजस्वी समस्तीपुर की सभा में एक साथ आए लेकिन तब भी एक सवाल यह है कि क्या एनडीए की एकजुटता के आगे महागठबंधन के बिखरते कुनबे को समेटने का यह प्रयास रहा?

बिहार में चुनावी सरगर्मियां जिस दिन शुरू हुई, एनडीए ने खुलकर अपनी एकजुटता दिखाई. पहले एक साथ आकर अमित शाह, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान सीटों की संख्या तय की फिर एक साथ बिना किसी हो-हंगामे के सभी सीटों पर एक साथ उम्मीदवारों के नाम भी तय कर दिए. लेकिन वहीं महागठबंधन में शुरू से ही एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप हुआ. किसको कितनी सीटें मिलेगी, कौन किस सीट पर चुनाव लड़ेगा. इस पर महागठबंधन में बिहार से लेकर दिल्ली तक जमकर खींचतान हुई. सीट शेयरिंग पर तेजस्वी को कई बार दिल्ली जाकर राहुल गांधी से बात करनी पडी. अंत-अंत तक दरभंगा, मधुबनी जैसी सीटों पर तो विवाद रहा. इन तमाम खींचतान और विवादों का असर चुनाव प्रचार में भी पड़ा कि कांग्रेस ने नेता अपने उम्मीदवार के प्रचार में जा रहे थे जबकि तेजस्वी सिर्फ अपने उम्मीदवार के प्रचार में. लेकिन एनडीए के प्रचार का आलम यह था कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह अपने उम्मीदवारों से पहले सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के लिए चुनावी मैदान में कूद पड़े.

राहुल गांधी ने पूर्णिया, गया, कटिहार और सुपौल में सभाएं की, लेकिन एक भी सभा उन क्षेत्रों में नहीं हुई, जिसमें आरजेडी के उम्मीदवार थे. राहुल गांधी की सारी सभाएं उन लोकसभा क्षेत्रों में हुई, जहां कांग्रेस के उम्मीदवार थे. गया में ‘हम’ के उम्मीदवार जीतनराम मांझी थे. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए ने यह कहते हुए मामले को भुनाने की कोशिश की कि महागठबंधन में पार्टियां खुद ही आपस में उलझी हुई हैं. वहीं मीडिया रिपोर्ट में भी बार-बार यह सवाल उठने लगे कि महागठबंधन में खटास के कारण इसके नेता एक-दूसरे से ही कतराते हैं.



यह सारे सवाल आने वाले चुनाव में महागठबंधन के लिए नासूर न बन जाए, इससे पहले समस्तीपुर की सभा में राहुल तेजस्वी ने एक मंच पर आकर यह मैसेज देने की कोशिश की कि महागठबंधन में सब कुछ ऑल इज वेल है. साथ ही एक साथ उठे कई सवालों के जवाब देने की कोशिश की गई. पहला तो यह कि महागठबंधन में कोई अलगाव नहीं है. अलग-अलग कुनबे में चुनाव प्रचार करना रणनीति का हिस्सा है न कि बिखराव. नीतीश कुमार जब नरेंद्र मोदी को पीएम फेस के रुप में सामने रखकर वोट मांगते हैं तो तेजस्वी ने भी राहुल गांधी को महागठबंधन की ओर से पीएम फेस के रूप में स्वीकार कर लिया है.
तेजस्वी भी शायद समझ चुके हैं कि अगर बिहार में उन्हें एनडीए को टक्कर देनी है तो उन्हें भी एनडीए की तरह महागठबंधन को भी राहुलमय कर जनता के बीच जाना होगा. वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय का मानना है कि महागठबंधन में राहुल तेजस्वी की एकजुटता इस समय इसलिए जरुरी थी कि जनता के बीच गलत मैसेज जा रहा था कि सभी पार्टियां अपने अपने कुनबे में ही चुनाव प्रचार कर रही हैं.

यही कारण है कि समस्तीपुर में सभा करने के बाद भी राहुल गांधी ने अपने पुराने नेता और निर्दलीय चुनाव लड़ रहे शकील अहमद को घास तक नहीं डाली. बिहार में 14 सीटों पर अब तक चुनाव हुए हैं. जबकि 26 सीटों पर चुनाव बाकी है. ऐसे में महागठबंधन का देर से खेला गया यह दांव जनता पर कितना असर छोडेगी, देखना होगा.

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