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ANALYSIS: बिहार में नहीं टूट पा रहा है बाहुबलियों का वर्चस्व, सत्ता के लिए तलाशा नया रास्ता

शहाबुद्दीन (File Photo)
शहाबुद्दीन (File Photo)

चुनाव आयोग के नियमों और जनता के दबाव के बाद बाहुबलियों ने सत्ता में एंट्री के लिए नया तरीका निकाल लिया है. बिहार हो या उत्तर प्रदेश, 2019 के चुनाव में बाहुबलियों ने अपने परिवार के बहाने सत्ता में बने रहने का रास्ता ढूंढ निकाला है.

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कहा जाता है कि सत्ता का स्वाद ऐसा है कि जिसे लग जाए, वह इससे दूर नहीं रह सकता. चुनाव आयोग के नियमों और लगातार जनता के दबाव के बाद बाहुबलियों ने सत्ता में एंट्री के लिए बैकडोर तलाश लिया है. बिहार हो या उत्तर प्रदेश, 2019 के लोकसभा चुनाव में बाहुबलियों ने अपने परिवार के बहाने सत्ता में बने रहने का रास्ता ढूंढ निकाला है. हालांकि 2014 के बाद उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर विराम लगा है.

बिहार में बहुबलियों ने पत्नी और भाई पर जताया भरोसा
बात करें बिहार की तो दोनों गठबंधनों ने बाहुबलियों पर भरोसा जताया है. इनमें सबसे चर्चित नाम है हिना शहाब का. आरजेडी ने अपने भरोसेमंद बाहुबली नेता शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब को सीवान लोकसभा सीट से मैदान में उतारा है. शहाबुद्दीन को चर्चित तेजाब हत्याकांड में उम्रकैद की सजा हो चुकी है, ऐसे में वो चुनाव नहीं लड़ सकता. सीवान में लड़ाई बाहुबली की पत्नी बनाम बाहुबली की पत्नी है. इस सीट से जेडीयू ने भी बाहुबली अजय सिंह की पत्नी कविता को मैदान में उतारा है.

लोक जनशक्ति पार्टी ने बाहुबली सूरजभान के भाई चंदन को नवादा से टिकट दिया है. बाहुबलियों पर एनडीए के भरोसे का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूरजभान के भाई चंदन को टिकट देने के कड़े विरोध के बाद भी बीजेपी के कद्दावर नेता गिरिराज सिंह को नवादा से बेगूसराय शिफ्ट कर दिया गया.
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कांग्रेस ने मुंगेर लोकसभा सीट से बाहुबली नेता अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी को मैदान में उतारा है. सुपौल सीट से कांग्रेस ने बाहुबली नेता पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन को मैदान में उतारा है. रंजीत फिलहाल इस सीट से कांग्रेस की सांसद हैं, जबकि पप्पू यादव मधेपुरा सीट से अपनी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं लाख कोशिशों के बाद आनंद मोहन की पत्नी लवली आंनद को इस चुनाव में टिकट नहीं मिल पाया.

2014 के बाद उत्तर प्रदेश में बदले हालात
उधर 2014 में बाहुबलियों की करारी हार के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बाहुबली और उनके परिवार वालों के चुनाव लड़ने की संख्या में काफी कमी आई है. इस चुनाव में गाजीपुर लोकसभा सीट से बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई अफजाल बीएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. दूसरी ओर पूर्वांचल के बाहुबलियों में शुमार हरिशंकर तिवारी के बेटे कुशल तिवारी भी बीएसपी से संत कबीरनगर (खलीलाबाद) के उम्मीदवार हैं.

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इन दोनों नेताओं की बाहुबली परिवार से होने के अलावा अपनी पहचान भी है. वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय का मानना है कि भारतीय राजनीति में धनबल, बाहुबल और जातीय समीकरण तीनों का जमकर इस्तेमाल होता है. ऐसे में राजनीतिक दल इन बाहुबलियों की अनदेखी नहीं कर पाते हैं. इसी कारण जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए राजनीतिक दलों ने नया रास्ता तलाश किया है, जिसके तहत बाहुबलियों को सीधे टिकट देने की बजाय उनके परिवार वालों को टिकट दिया जा रहा है. सहाय मानते हैं कि बाहुबलियों को राजनीति में आने से सिर्फ जनता ही रोक सकती है. जिस तरह उत्तर प्रदेश में 2014 में बाहुबलियों की हार के बाद उनके परिवार वालों के चुनाव लड़ने में कमी आई है, उससे साफ है कि लगाम जनता के हाथ में ही है.

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