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राजनीतिक जमीन बचाने की जंग में तेजस्वी के 'बैड एलिमेंट' से 'एनर्जी' ले रहे रघुवंश प्रसाद

बिहार के वैशाली संसदीय सीट पर एनडीए की वीणा देवी और महागठबंधन के रघुवंश प्रसाद सिंह के बीच सीधी टक्कर

बिहार के वैशाली संसदीय सीट पर एनडीए की वीणा देवी और महागठबंधन के रघुवंश प्रसाद सिंह के बीच सीधी टक्कर

तेजस्वी यादव के सवर्ण आरक्षण विरोध के बावजूद रघुवंश प्रसाद सिंह हर हाल में चाहते हैं कि उन्हें भूमिहारों का साथ मिले. इसके लिए वे तमाम जुगत लगा रहे हैं.

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बिहार के वैशालीय संसदीय सीट पर जातीय समीकरण का उलझाव ऐसा है कि यहां दो अपर कास्ट के बीच ही वर्चस्व का संघर्ष है. इसकी एकजुटता और बिखराव पर यहां की राजनीतिक दिशा तय होती है.  जातीय समीकरण के लिहाज से देखें तो इस सीट पर 12 चुनावों में से दस बार राजपूत उम्मीदवार की जीत हुई है. दो बार भूमिहार उम्मीदवार जीते, जबकि भूमिहार जाति के उम्मीदवार छह बार दूसरे स्थान पर रहे.

हालांकि 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बीच दो राजपूतों के बीच संघर्ष हुआ, लेकिन जीत एलजेपी (रामविलास पासवान की पार्टी) के रामाकिशोर सिंह को मिली. आरजेडी के डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह को हराया था.

हालांकि इस बार जेडीयू के कद्दावर नेता दिनेश सिंह की पत्नी वीणा देवी एलजेपी के टिकट पर मैदान में हैं. ऐसे में रघुवंश प्रसाद सिंह के सामने जटिल जातीय समीकरणों के बीच गढ़ बचाने की चुनौती है.

गौरतलब है कि वैशाली लोकसभा सीट से दिग्विजय नारायण सिंह 1952 से 1996 तक छह बार सांसद रह चुके हैं. जबकि 5 बार आरजेडी को जीत मिली है.

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पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह यहां से लगातार पांच बार सांसद रहे हैं. 1996 , 1998, 1999, 2004 और 2009 में डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह के सिर जीत का सेहरा बंधा.

वहीं पहली महिला किशोरी सिन्हा हैं, वह 1980 इस सीट जनता पार्टी के टिकट से चुनाव जीती थीं. 1994 में आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद ने पूर्व सीएम सत्येंद्र नारायण सिंह की पत्नी किशोरी सिन्हा को पराजित कर दिया था.

वैशाली लोकसभा सीट के तहत विधानसभा की 6 सीटें आती हैं- मीनापुर, कान्ति, बरुराज, पारु, साहेबगंज और वैशाली. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 में से तीन सीटें राजद ने जीती थीं. वहीं भाजपा, जदयू और निर्दलीय उम्मीदवार एक-एक सीट पर जीतने में कामयाब रहे थे. हालांकि पिछला चुनाव चतुष्कोणीय हो गया था.

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यहां से लोजपा के रामा किशोर सिंह चुनाव जीते थे. उन्हें 3, 05, 450 वोट मिले थे. वहीं दूसरे नंबर पर रघुवंश प्रसाद सिंह को 2, 06, 183 वोट मिले थे.

मुन्ना शुक्ला की पत्नी और निर्दलीय उम्मीदवार अनु शुक्ला को एक लाख 44 हजार तो जेडीयू के विजय सहनी को जहां 1 लाख वोट मिले थे.

इस क्षेत्र में भूमिहार, राजपूत और यादवों के वोट लगभग बराबर हैं. जबकि मुस्लिम आबादी करीब 13 प्रतिशत है. ऐसे में राजपूत और भूमिहार वर्चस्व के लिए यहां हमेशा मुकाबला होता रहा है. इस सीट पर भूमिहार वोट को ही निर्णायक माना जाता है. हालांकि इस बार एनडीए और महागठबंधन में सीधा मुकाबला है.

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तेजस्वी यादव के सवर्ण आरक्षण विरोध के बावजूद  रघुवंश प्रसाद सिंह हर हाल में चाहते हैं कि उन्हें भूमिहारों का साथ मिले. इसके लिए वे तमाम जुगत लगा रहे हैं.

तेजस्वी यादव ने मोकामा के विधायक अनंत सिंह को 'बैड एलिमेंट' कहने के बावजूद रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस लोकसभा क्षेत्र के लगभग 50 गांवों में उनका रोड शो तक करवाया है.

बिहार में वैशाली संसदीय सीट के इन गांवों में हुआ अनंत सिंह का रोड शो


वहीं रघुवंश प्रसाद सिंह आरजेडी के पुराने घोषणा पत्र की प्रति भी दिखाते चल रहे हैं कि उनकी पार्टी ने  ही सबसे पहले सवर्ण आरक्षण की मांग की थी.

दूसरी ओर एलजेपी पीएम मोदी के नाम पर सवर्ण वोट को अपना माने बैठी है. लेकिन स्थानीय राजनीति के लिहाज से मुजफ्फरपुर के पूर्व मेयर समीर कुमार की हत्या की गूंज इस चुनाव में सुनाई पड़ रही है.

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भूमिहार मतदाताओं के जेहन में यह बात घुस गई है कि समीर कुमार की हत्या में जेडीयू नेता दिनेश सिंह का हाथ है. भूमिहार वोटरों की इसी नाराजगी को देखते हुए दिनेश सिंह ने समीर कुमार की पत्नी के साथ मीडिया के सामने मुलाकात की और उन्हें अपनी बहन और अपने परिवार का हिस्सा बताया.

हालांकि रघुवंश प्रसाद सिंह भी अपनी हर रणनीति को आजमा रहे हैं. इसी सिलसिले में भूमिहार समाज से आने वाले बाहुबली विधायक अनंत सिंह का रोड शो गुरुवार को करवाया.

इस सीट पर अगड़ी जातियों को शुरू से बोल-बाला रहा है. यहां राजपूत, यादव और भूमिहार जाति के वोटर ज्यादा हैं, लेकिन कई उपजातियों को मिलाने के बाद अतिपछड़ों और दलितों की आबादी की यहां निर्णायक है.

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भूमिहार, राजपूत, यादव और मुस्लिम मतों के अलावा ब्राह्मण, पचपनिया और दलित-महादलित समुदाय के शेष 42 प्रतिशत मतदाताओं में खासकर कुर्मी, कुशवाहा और नोनिया जाति को वोटर चुनाव पर असर डालते हैं.

वहीं जेडीयू के पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला (भूमिहार जाति से आते हैं) और उनकी पत्नी अनु शुक्ला अपने लोगों से नोटा दबाने की अपील कर रहे हैं.  मुकेश सहनी फैक्टर के कारण निषाद मतदाता महागठबंधन की ओर शिफ्ट होते दिख रहे हैं.

हालांकि वीणा देवी को वैशाली का स्थानीय होने का लाभ मिल सकता है जबकि रघुंश प्रसाद सिंह महनार से आते हैं. यही नहीं तेजस्वी के सवर्ण आरक्षण विरोधी बयान का भी असर सवर्ण मतदाताओं के बीच देखा जा रहा है.

दूसरी ओर राजपूत होने के कारण यादवों की लॉयल्टी रघुवंश प्रसाद सिंह में नहीं है वहीं भूमिहार और राजपूत के एक मंच पर आने में कई अड़चनें हैं. जाहिर है भूमिहार मतों के बिखराव और एकजुटता पर काफी कुछ निर्भर करेगा.

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