Lok Sabha Results 2019: बिहार में 'बैसाखी' छोड़ेगी कांग्रेस?

बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं, लेकिन यहां पर कांग्रेस पिछले कई वर्षों से गठबंधन में ही चुनाव लड़ रही है.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: May 25, 2019, 2:48 PM IST
Lok Sabha Results 2019: बिहार में 'बैसाखी' छोड़ेगी कांग्रेस?
फाइल फोटो
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: May 25, 2019, 2:48 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद नई दिल्‍ली में कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक हुई, जिसमें हार के कारणों की समीक्षा की गई. इसमें राहुल गांधी को पार्टी में आवश्‍यक सुधार करने के लिए जरूरी कदम उठाने की सलाह दी गई. जाहिर है अब कांग्रेस में मंथन का दौर चलेगा और कुछ बदलाव भी जरूर किए जाएंगे. लेकिन, यहां सवाल बिहार को लेकर है. क्या बिहार में भी कांग्रेस को अपने दम पर फिर खड़ा करने की कोशिश की जाएगी?

दरअसल, तमाम तरह के समझौते करने के बाद भी बिहार में कांग्रेस आगे नहीं आ पा रही है. इस बार कांग्रेस बमुश्किल किशनगंज की ही सीट जीत पाई है. जाहिर है इसको लेकर पार्टी के भीतर मायूसी है.



इस करारी शिकस्त पर शुक्रवार को पार्टी के वरिष्ठ नेता सदानंद सिंह ने कहा था कि कांग्रेस बैसाखी के बदौलत खड़ी नहीं हो सकती, बल्कि अकेले रहकर ही मजबूत हो सकती है. उन्होंने कहा कि पार्टी को बैसाखी से उबरना होगा. कांग्रेस के अंदर भी सर्जरी की जरूरत है.

जाहिर है उनकी बातों का गहरा अर्थ है. दरअसल, इस चुनाव में भी कांग्रेस के कई नेता बिहार में अपने सुनहरे अतीत को याद करते हुए एक बार फिर से 'फ्रंट फुट' पर खेलने की बात करते रहे, लेकिन अंत में पार्टी बैकफुट पर ही रही और 40 सीटों में से महज 9 सीटों पर ही चुनाव लड़ी. सवाल यह है कि बिहार की राजनीति में कांग्रेस 'बैक फुट' पर कैसे चली गई?

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दरअसल, बिहार में 1990 का दशक पिछड़ी जातियों के उभार की अवधि थी. इसी दौरान लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, नीतीश कुमार जैसे नेताओं की राजनीतिक कद को नया आकार मिला. इस बदलाव के दौर से पहले तक बिहार की सत्ता में कांग्रेस का ही वर्चस्व था, लेकिन बदलते वक्त को शायद पहचानने में कांग्रेस चूक गई.

एक तरफ समाजवादी पृष्ठभूमि वाले नेता मजबूत होते चले गए और कांग्रेस उस चुनौती से सामना नहीं कर पाई. इसी का नतीजा रहा कि कांग्रेस का ग्राफ लगातार गिरता रहा.
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गौरतलब है कि स्वतंत्रता के पश्चात पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने संयुक्त बिहार (बिहार-झारखंड तब एक थे) की 324 विधानसभा सीटों में से 239 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी.

बिहार विभाजन के बाद वर्ष 2010 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने अपना सबसे खराब प्रदर्शन दिया और 243 विधानसभा सीटों में से मात्र 4 सीटें हासिल कीं. साल 2014 के उपचुनावों में कांग्रेस ने एक और सीट जीती.

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अविभाजित बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन

1951: 239

1957: 250

1962: 185

1967: 128

1969: 118

1972: 167

1977: 57

1980: 169

1985: 196

1990: 71

1995: 29

2000: 23

विभाजन के बाद बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन

2005: 09

2010: 5 (4+1 सीट उपचुनाव में जीती)

2015: 27

दरअसल, वर्ष 1989 में भागलपुर दंगे के बाद बिहार में कांग्रेस से मुस्लिम समुदाय छिटक गया. वहीं, हिंदुओं में भी कांग्रेस की नीतियों को लेकर नाराजगी रही. ऐसे में दोतरफा घिरी कांग्रेस की पैठ बिहार की राजनीति में कम होती चली गई. साल 1990 के दशक में जब मंडल राजनीति ने जोर पकड़ा तो कांग्रेस ऊहापोह में रही. न तो वह सवर्णों का खुलकर साथ दे पाई और न ही पिछड़े और दलित समुदाय को साध पाई. जाहिर तौर पर कांग्रेस का वोट बैंक छिटका तो आरजेडी को इसका सीधा फायदा हुआ.

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यहीं से लालू यादव के 'MY' (मुस्लिम-यादव) समीकरण ने जन्म लिया और बिहार की राजनीति में आरजेडी ने अपना खूंटा गाड़ दिया. यह खूंटा ऐसा गड़ा कि 2005 तक कोई उसे हिला तक नहीं पाया. इस बीच 1995 के चुनावों में कांग्रेस मात्र 29 सीटों पर सिमट गई. बीजेपी इन चुनावों में 41 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी पार्टी बनने में सफल हुई. इसके बाद साल 2000 में लालू यादव ने कांग्रेस के 23 विधायकों को राबड़ी देवी कैबिनेट में शामिल किया. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सदानंद सिंह को विधानसभा का अध्‍यक्ष भी बनाया गया.

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लेकिन, आरजेडी से नजदीकियों ने कांग्रेस का इतना बड़ा नुकसान कर दिया, जिसका अनुमान शायद कांग्रेस नेताओं को भी नहीं था. कांग्रेस को बिहार की राजनीति में की हुईं गलतियों से सबक न लेने का परिणाम वर्ष 2005 के चुनावों में मिल गया. इन चुनावों में कांग्रेस के हाथ मात्र 5 सीटें आईं. अगले चुनावों (2010) में कांग्रेस सिर्फ चार सीटें हासिल कर सकी. इसके पांच साल बाद वर्ष 2015 में कांग्रेस ने एक बार फिर विधानसभा चुनावों की नैया पार करने के लिए लालू प्रसाद का हाथ थामा. कहा जाता है कि इन चुनावों में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने कांग्रेस के उम्मीदवारों को चुना.

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यही नहीं चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने 6 और राहुल गांधी ने 10 रैलियां की थीं. इस चुनाव की पूरी जिम्मेदारी लालू और नीतीश ने अपने कंधों पर संभाली और कांग्रेस को 41 में से 27 सीटों पर जीत दिलाई. जाहिर तौर पर बिहार में कांग्रेस के 'बैक फुट' पर जाने का सबसे बड़ा जिम्मेदार कोई है तो वह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ बिहार के नेता भी रहे. ये अल्पकालीन हित साधने के चक्कर में लालू यादव के करीब होते चले गए.

इससे जनमानस में छवि बनी कि आरजेडी और कांग्रेस एक ही हैं. इतना ही नहीं कांग्रेस के पास लालू यादव जैसा कोई कद्दावर नेता भी नहीं था जो बिहार की राजनीति की जटिलताओं को समझ पाए. ऐसे में कांग्रेस बिहार की राजनीति में लगातार 'बैक फुट' पर जाती चली गई.

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