बिहार: मोदी-नीतीश के आगे ऐसे फेल हो गई महागठबंधन की सोशल इंजीनियरिंग

महागठबंधन ने जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी के साथ राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के गठजोड़ से एक खास सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश की थी.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: May 24, 2019, 7:08 PM IST
बिहार: मोदी-नीतीश के आगे ऐसे फेल हो गई महागठबंधन की सोशल इंजीनियरिंग
फाइल फोटो
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: May 24, 2019, 7:08 PM IST
बिहार में महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे तेजस्वी यादव अपनी चुनावी सभाओं में अक्सर ये बात कहते रहे कि 23 मई को चुनाव परिणाम आने के बाद बिहार में भूचाल आएगा और दोनों पार्टियां (जेडीयू-बीजेपी) 'डायनासोर' की तरह गायब हो जाएंगी. तेजस्वी के इस दावे में तब इसलिए भी दम दिखता था क्योंकि उन्होंने महागठबंधन में सामाजिक समीकरण का ऐसा हिसाब-किताब बिठाया था, जो सफल होता तो आज कहानी दूसरी होती. हालांकि 23 मई को आए चुनाव नतीजों ने यह बात स्पष्ट कर दी कि पीएम मोदी और सीएम नीतीश के एक साथ आने से महागठबंधन का वह सोशल इंजीनियरिंग भी ध्वस्त हो गया जिसके बूते तेजस्वी अपनी जीत का दम भर रहे थे.

दरअसल महागठबंधन ने जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी के साथ राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के गठजोड़ से एक खास सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश की थी. इसके तहत उपेंद्र कुशवाहा के नाम पर कोयरी, जीतनराम मांझी के नाम पर महादलित, मुकेश सहनी के नाम पर मल्लाह, लालू परिवार के नाम पर मुस्लिम-यादव और राहुल गांधी के नाम पर मुस्लिम और सवर्णों को साधने की कवायद की गई थी.



ये भी पढ़ें- कन्हैया कुमार की बढ़ी मुश्किल, बिहार के इस थाने में दर्ज हुआ केस

हालांकि महागठबंधन की इस सोशल इंजीनियरिंग को नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार ने साथ आकर ऐसे रौंद डाल कि एनडीए ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत दर्ज कर लगभग क्लीन स्वीप कर दिया. कांग्रेस ने मुस्लिम बहुल किशनगंज सीट को जैसे-तैसे जीतकर महागठबंधन का खाता तो खोल दिया, लेकिन इस सीट पर भी महागठबंधन की साख नहीं बच सकी. दरअसल पहली बार यहां कांग्रेस यहां से महज 35 हजार मतों से जीत दर्ज कर सकी.

ये भी पढ़ें- ...तो लालू परिवार में 'अंदरखाने लगी आग' सतह पर भी दिखेगी ?

महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे तेजस्वी यादव ने जिस अंदाज में अपना चुनाव प्रचार किया वह भी इस महागठबंधन के गणित को ही ध्यान में रखकर था. इस दौरान आरक्षण का मुद्दा, अगड़ा-पिछड़ा का मुद्दा, जिसकी जितनी भागीदारी-उसकी उतनी भागीदारी का नारा जैसे तमाम रणनीतियों को महागठबंधन ने आजमाईं.

तेजस्वी यादव ने इसकी प्लानिंग लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले ही कर दी थी. वे लगातार बिहार में 69 प्रतिशत आरक्षण की मांग उठा दी थी. इसी बहाने वह बिहार के 69 प्रतिशत मतदाताओं को अपने पक्ष में मोड़ने की कवायद में भी लगे थे. महागठबंधन ने इसी '69' अंक को ध्यान में रखकर समीकरण बनाया था.
Loading...

ये भी पढ़ें- महागठबंधन की हार पर बोले पप्पू यादव- बिहार की जनता को लालू परिवार से नफरत हो गई है

दरअसल तेजस्वी के सियासी गणित को देखें तो यादव 14 प्रतिशत, मुस्लिम 17 प्रतिशत, निषाद 14 प्रतिशत, महादलित 18 प्रतिशत और कोयरी 6 प्रतिशत का जोड़ करें तो यह '69' का ही हिसाब बनाता है. जाहिर है जिस सियासी समीकरण पर तेजस्वी चल रहे थे अगर इसमें 60 प्रतिशत भी सफल हो गए होते आज परिणाम कुछ और होता.

दरअसल इसके पीछे बड़ी वजह ये रही है कि सर्वसमाज को मोदी-नीतीश की जोड़ी पसंद आई. पीएम मोदी के सबका साथ-सबका विकास और सीएम नीतीश के सर्वसमाज का विकास के नारे आगे न तो महादलित मांझी के पीछे चले और न ही उपेंद्र कुशवाहा के साथ कोयरी जाति के लोग. यही वजह रही कि दो जगह से लड़े कुशवाहा को हार झेलनी पड़ी.

इसी तरह न तो मुकेश सहनी ही निषाद वोटों को साध सके और न ही तेजस्वी यादव मतों को इंटैक्ट रख पाए.  जाहिर है उनका यह गणित काम नहीं आया सारे समीकरण ध्वस्त हो गए.

ये भी पढ़ें- मोदी-नीतीश को लेकर बिहार के मतदाताओं ने किया बड़ा इशारा
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...