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Opinion: नदियों पर पुल बना कर बिहार को सांस्कृतिक तौर पर जोड़ा है मोदी सरकार ने

बिहार में गंगा नदी पर बन रहा एक पुल.

बिहार में गंगा नदी पर बन रहा एक पुल.

Bridges in Bihar: नदियों के चलते बिहार के कई बड़े भूभाग सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर एक रहते हुए भी आपस में कटे-बंटे रहे. बेटी-रोटी के संबंध से लेकर रोजी-रोजगार, व्यापार, आवागमन सबकुछ प्रभावित होता रहा. लेकिन, बीते दो वर्षों में नदियों पर लगातार कई पुलों के निर्माण से अब ये पुनर्जीवित हो रहे हैं.

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पटना. केन्द्रीय सत्ता की बागडोर नरेन्द्र मोदी और राजमार्ग मंत्रालय की कमान नितिन गडकरी के हाथों में आने के बाद तो नदियों पर सेतु नहीं, महासेतु बनने लगे हैं. अकेले बिहार ऐसा राज्य बन गया है जहां एनडीए सरकार नदियों पर पुल बनाने का नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रही है. बिहारवासियों के लिए सदानीरा नदियां कई अर्थों में वरदान साबित हुई तो कुछ मायनों में अभिशाप भी बनीं. सबसे पतित पावनी कही जाने वाली गंगा बिहार के प्राकृतिक भूभाग को सीधे तौर पर उत्तर और दक्षिण में विभाजित करती है, वहीं, कोसी राज्य के एक बड़े हिस्से को उत्तर-पश्चिम और पूर्व दिशा में बांटती है. गंगा-सोन और कर्मनाशा शाहाबाद प्रक्षेत्र को मगध और यूपी-बिहार के भोजपुरी इलाके से पृथक करती है.

सरयू नदी पश्चिम बिहार के बड़े इलाके को बांटती है तो गंडक का बहाव तिरहुत और सारण क्षेत्र को पोषित और विभाजित करता है. नेपाल से निकलने वाली बागमती भी आगे चलकर कोसी में मिल जाती है. इन नदियों ने मिथिलांचल-सीमांचल को विभाजित किया. समझ सकते हैं कि नदियों के चलते बिहार के कई बड़े भूभाग सामाजिक-सांस्कृतिक तौर पर एक रहते हुए भी आपस में कटे-बंटे रहे. बेटी-रोटी के संबंध से लेकर रोजी-रोजगार, व्यापार, आवागमन सबकुछ प्रभावित होता रहा. हाल के दो सौ सालों के बीच नदियों पर पुल बनाने के जितने काम हुए उससे कई गुणा ज्यादा पुल 21वीं सदी के आरंभिक दो दशकों में बने. अब तीसरा दशक तो सेतु निर्माण के इतिहास में हर दिन नया अध्याय जोड़ रहा है.

नाव और स्टीमर सेवा पर निर्भरता समाप्त
सदियों तक गंगा सहित अन्य नदियों में आवागमन का एकमात्र जरिया छोटी नौकाएं रहीं. जिसे निषाद जाति के लोग चलाते थे. उनको बोलचाल की भाषा में नाविक, केवट, गुह, मल्लाह और माझी जैसे नामों से जाना जाता है. बीसवीं सदी के उतरार्ध में गंगा में स्टीमर सेवा शुरू हुई. जो पटना, बक्सर, मोकामा, भागलपुर, कटिहार तक सीमित रही. अभी भी मनिहारी घाट से साहेबगंज के बीच यह सेवा चलती है. यही कारण था कि सोनपुर वाले बच्चा बाबू को तब बिहार का बच्चा-बच्चा जानता था. पहलेजा घाट से पटना के महेन्द्रू और बांस घाट के बीच उनकी स्टीमर सेवा चलती थी. वहीं बक्सर से भरौली के बीच उजियारघाट वाले बड़े जमींदार गोरखनाथ उपाध्याय की स्टीमर सेवा बहाल थी. गंगा पर पुल बनने के बाद स्टीमर सेवाएं बंद हुई और इसके मालिकों ने दूसरे कारोबार का रुख कर लिया. नाविक भी परंपरागत धंधे छोड़ दूसरे काम में लग गये.

नदियों पर बनाना पुल भगीरथ कार्य
बिहार में गंगा नदी पर सबसे पहला पुल हथिदह और सिमरिया घाट के बीच आजादी के तुरंत बाद बना, जो सड़क-सह-रेल पुल था. मोकामा पुल के नाम से प्रसिद्ध इस सेतु का उद्घाटन 1959 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने किया था. राजेन्द्र सेतु नामक यह पुल उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ता है. पटना में गांधी सेतु नाम से देश का सबसे बड़ा पुल अस्सी के दशक में बना, जिसका उदघाटन स्व. इंदिरा गांधी ने मई, 1982 में किया था. इसके पहले बक्सर से बलिया के भरौली को जोड़ने वाले पुल का शुभारंभ 15 जुलाई 1977 को हुआ था. समय के साथ इन पुलों की स्थिति खराब होती गयी और बड़े वाहनों का परिचालन रोक दिया गया.

गंगा नदी पर पुल ही पुल 
बिहार में गंगा लगभग 447 किलोमीटर का सफर तय करती है. एक समय था जब वाराणसी के बाद सीधे मोकामा के पास रेल सह सड़क पुल था. अब सरकार हर चालीस किलोमीटर पर एक पुल बनाने की ओर अग्रसर है. पहले बिहार में 10 लेन के सिर्फ 4 पुल थे. अब सरकार गंगा नदी पर 62 लेन के 18 पुलों का निर्माण कार्य करा रही है. अगले 100 सालों तक ट्रैफिक प्लान के मद्देनजर गांधी सेतु के ठीक बगल में चार लेन के नए पुल का निर्माण प्रगति पर है. आज की तारीख में बक्सर के अलावे भोजपुर जिले के बबुरा और छपरा जिले के डोरीगंज के बीच जेपी सेतु चालू हो गया है. एक नया पुल यूपी सेतु निगम ने बलिया जिले में चार अरब की लागत से बनाया है, जो बक्सर और भोजपुर के दियारांचल को जोड़ रहा है. भारत में गुजरात के बाद यह देश में दूसरा पुल है जो एक्स्ट्रा डोज केबल तकनीक से बना है. ढाई किलोमीटर लंबे पुल का निर्माण हो गया है केवल एप्रोच रोड का काम बाकी बचा है.

2022 तक बन जाएगा गांधी सेतु का सुपरस्ट्रक्चर
इसी तरह पटना में दीघा- सोनपुर के बीच रेल सह सड़क रेल पुल चालू है. राजधानी में ही महात्मा गांधी सेतु पर सुपरस्ट्रक्चर बदलने का काम मार्च 2022 तक पूरा होने की उम्मीद है. उसके समानांतर कच्ची दरगाह से बिदुपुर के बीच नया सिक्स लेन पुल का काम तेजी से चल रहा है. इसके पूरा होने का समय मार्च 2024 निर्धारित किया गया है. मुंगेर से खगड़िया के बीच रेल सह सड़क पुल तैयार हो गया है और बख्तियारपुर से ताजपुर फोरलेन पुल का निर्माण कार्य जारी है.

बिहार को झारखंड से सीधे जोड़ेगा यह पुल
बेगूसराय में राजेंद्र सेतु के समानांतर सिक्स लेन ब्रिज बनाया जा रहा है. मुंगेर घाट पुल का दिसंबर महीने में अप्रोच रोड पूरा हो जाएगा. अगवानी घाट से सुल्तानगंज फोरलेन ब्रिज का निर्माण अंतिम चरण में है. विक्रमशिला सेतु के समानांतर 1110 करोड़ की लागत से फोरलेन पुल बनाया जा रहा है. कटिहार जिले के मनिहारी से साहेबगंज भी नया फोरलेन पुल का निर्माण कार्य शुरू हो चुका है. यह पुल बिहार में गंगा पर अंतिम पुल होगा जो सीधे झारखंड को जोड़ेगा. साहेबगंज का यह पुल चार लेन का होगा जो 1900 करोड़ में बनेगा. यह अगले तीन साल में तैयार होगा.

कोसी नदी पर बन रहा है महासेतु
कोसी नदी को बिहार का शोक कहा जाता रहा है. हर साल नेपाल से आने वाली बाढ़ के चलते कोसी अपनी धारा बदलते रहती थी. इसीलिए इसपर पुल बनाना भी मुश्किल भरा काम था. कोसी पर 10 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबा पुल बनना शुरू हो गया है, जो देश का सबसे बड़ा पुल होगा. अभी असम और अरुणाचल प्रदेश को जोड़ने के लिए ब्रह्मपुत्र नदी पर बने सबसे बड़े महासेतु की लंबाई 9.8 किलोमीटर है. केन्द्रीय परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने भारत माला परियोजना के तहत 1286 करोड़ की लागत से इस महासेतु के निर्माण की स्वीकृति दे दी है. सुपौल के बकौर और मधुबनी जिले के भेजा के बीच बनने वाला यह पुल साढे तीन साल में तैयार होगा. इस पुल के बनने से नेपाल और बंगाल की दूरी भी कम हो जाएगी.

सोन पर 160 साल पहले बना कोईलवर पुल
बिहार की राजधानी पटना के पश्चिमी छोर पर पुराने शाहाबाद और मगध इलाके को विभाजित करता है सोन. सन 1862 में तब के शाहाबाद जिले (अब भोजपुर जिला) के कोईलवर के समीप सोन नदी पर अंग्रेजों ने पहला पुल बनाया था. तब यह देश का सबसे बड़ा लोहे के गाटर से बना रेल सह सड़क पुल था, जिसके लिए लोहे विदेश से जलमार्ग द्वारा लाए गये थे. यह पुल बिहार और यूपी को जोड़ता था और अपनी इंजीनियरिंग को लेकर प्रसिद्ध था. यह पुल तब बना जब देश में लोहे का एक भी कारखाना नहीं था. आज भी हाबड़ा –दिल्ली मुख्य रेलमार्ग का यह प्रमुख पुल है. ऐसे में इसका सामरिक और सांस्कृतिक महत्व भी बहुत है.

अब सोन पर छह पुल
रोहतास जिले के डेहरी ऑन सोन के समीप जीटी रोड इसी सोन से गुजरती थी. वो पुल जर्जर हो गया था. कोईलवर और डेहरी के बीच दूरी सौ किलोमीटर के करीब है. बीच में कोई पुल नहीं था. शाहाबाद और यूपी सहित उत्तर भारत को पूर्वी भारत से जोड़ने के लिए दो ही पुल थे. 2020 में केन्द्रीय राजमार्ग प्राधिकार ने कोईलवर के समीप सिक्स लेन के नये पुल को तैयार किया, जिसका तीन लेन पिछले साल आवागमन के लिए खोल दिया गया. भोजपुर के सामाजिक कार्यकर्ता यज्ञनारायण तिवारी कहते है कि इस पुल के बनने के बाद कोईलवर में लगने वाले महाजाम से मुक्ति मिल गयी है. साथ ही बक्सर और भोजपुर के लिए तो यह वरदान साबित हो रहा है.

बिहार-झारखंड के बीच रोटी-बेटी के रिश्ते और होंगे प्रगाढ़
बिहार में नीतीश कुमार के सत्ता में दूबारा आने के बाद सहार और अरवल के बीच और नासरीगंज और दाउदनगर के बीच दो नये पुल दो साल के अंतर पर बने. साथ ही डेहरी ऑन सोन के समीप एनएच-02 पर चार लेन का बड़ा पुल बना है. अब रोहतास जिले के अंतिम छोर पर डेहरी से 70 किलोमीटर दक्षिण पंडुका में सोन नदी पर पुल निर्माण का काम आरंभ हो गया है. पुल बनने से बिहार-झारखंड के बीच सदियों से चला आ रहा बेटी-रोटी का संबंध और प्रगाढ़ होने की उम्‍मीद बढ़ गई है. पुल का निर्माण हो जाने से 120 किलोमीटर की दूरी 20 किलोमीटर में बदल जाएगी. झारखंड राज्य के गढ़वा ,पलामू, लातेहार समेत अन्य जिलों का रोहतास के नौहट्टा और रोहतास प्रखंड के लोगों से सीधा संपर्क हो जाएगा. समय के साथ पैसे की भी बचत भी होगी.

गंडक नदी पर भी नया पुल
बिहार में करीब 300 किलोमीटर का सफर तय करने वाली वाली गंडक नदी पर आठवां बड़ा पुल बन रहा है. पटना रिंग रोड के तहत इस नए पुल का एलाइनमेंट वैशाली के आस्तीपुर और सारण के नया गांव के बीच तय हुआ है। पुल वर्तमान सोनपुर सड़क पुल से उत्तर की तरफ करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर बनेगा. गंडक नदी पर बने अबतक के पुल हैं- धनहा-रतवल घाट पुल, जादोपुर-मंगलपुर पुल, डुमरिया पुल, सत्तर घाट पुल, बंगरा घाट पुल, रेवा घाट पुल, सोनपुर में दो पुल (एक नया और एक पुराना अंग्रेज के जमाने का लोहे का सिंगल लेन पुल)

सरयू नदी पर बन रहे हैं दो पुल
पश्चिम बिहार के भोजपुरी भाषी इलाके को उत्तरप्रदेश के दोआबा इलाके से अलग करती है सरयू नदी. अब सीवान से बलिया के बीच दरौली घाट- सिकंदरपुर के बीच नया पुल निर्माणाधीन है. इस सड़क पुल के 31 पिलर बन गये है. सुपर स्ट्रक्चर का काम बाकी है. सीवान के कारोबारी ओमप्रकाश सिंह उर्फ पप्पू सिंह कहते हैं कि इसके अलावे सिसवन कचनार और बलिया के चांदपुर के बीच बनने वाले नये पुल के खम्भों का निर्माण हो चुका है. यदि दोनों पुल बन जाते हैं कि यूपी-बिहार के लोगों का आवागमन सरल और सुविधाजनक होगा. सीवान के सामाजिक कार्यकर्ता प्रताप शेखर सिंह कहते हैं कि दोनों पुलों के बनने से सीवान और बलिया के बीच की दूरी 60 किलोमीटर से घटकर 30 किलोमीटर हो जाएगी. इससे कारोबार बढ़ेगा. रिश्तेदारियां होगीं और सबसे बढ़कर है कि सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध प्रगाढ़ होंगे. वे बिहार में फैलते पुलों के जाल के लिए सारा श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को देते हैं. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये निजी विचार है.)

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