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सियासी सवाल- कांग्रेस ने राजद को दिखाया जो 'दम' वह कब तक रहेगा कायम?

सियासी सवाल- कांग्रेस ने राजद को दिखाया जो 'दम' वह कब तक रहेगा कायम?

 बिहार में राजद-कांग्रेस का महागठबंधन टूटने का ऐलान कर दिया गया है  (फाइल फोटो)

बिहार में राजद-कांग्रेस का महागठबंधन टूटने का ऐलान कर दिया गया है (फाइल फोटो)

RJD-Congress Mahagathbandhan Clash: कन्हैया कुमार के कांग्रेस में आने के बाद सियासी जानकार इस बात की चर्चा करने लगे थे कि कांग्रेस ने शायद बिहार को लेकर लंबी प्लानिंग के तहत कन्हैया कुमार को पार्टी में शामिल किया है. इसकी वजह यह मानी जा रही है कि वर्ष 1989 के बाद से बिहार में कांग्रेस की जनता में पकड़ इतनी ढीली पड़ गई है कि वह राजद की बैशाखी के बगैर चल पाने में खुद को सक्षम नहीं मानती.

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पटना. बिहार कांग्रेस के प्रभारी भक्त चरण दास (Bhakt Charan Das) ने ऐलान कर दिया है कि महागठबंधन (Mahagathbandhan) अब टूट चुका है और राजद-कांग्रेस अब एक साथ नहीं हैं. उन्होंने यह भी ऐलान किया है कि आगामी 2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस अकेले लड़ेगी और सभी 40 संसदीय सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी. जाहिर है यह बिहार की सियासत ( Bihar Politic) के लिए बहुत बड़ी खबर है. ऐसा क्यों हुआ इसके पीछे की तात्कालिक वजह को देखें तो बिहार विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस-राजद (Congress-RJD) के बीच आपसी विश्वास या तालमेल की कमी प्राथमिक तौर पर नजर आती है. सियासत के कई जानकार इसका कारण कन्हैया कुमार की कांग्रेस में एंट्री होने को भी बता रहे हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि कांग्रेस बड़ी प्लानिंग के साथ आगे बढ़ रही है और वह बिहार में एकला चलो की राह पर अपना सियासी सफर आगे बढ़ाएगी. हालांकि सियासी जानकार यह भी कहते हैं कि कांग्रेस-राजद के बीच यह एक तरह की नूरा-कुश्ती भी हो सकती है क्योंकि दोनों ही पार्टियों के साथ आने और अलग होने का इतिहास कुछ ऐसा ही रहा है.

कन्हैया कुमार के कांग्रेस में आने के बाद सियासी जानकार इस बात की चर्चा करने लगे थे कि कांग्रेस ने शायद बिहार को लेकर लंबी प्लानिंग के तहत कन्हैया कुमार को पार्टी में शामिल किया है. इसकी वजह यह मानी जा रही है कि वर्ष 1989 के बाद से बिहार में कांग्रेस की जनता में पकड़ इतनी ढीली पड़ गई है कि वह राजद की बैशाखी के बगैर चल पाने में खुद को सक्षम नहीं मानती. बीते तीन दशक के संबंधों पर दृष्टि डालें तो यह साफ है कि कांग्रेस और राजद के स्वार्थ आपस में कई बार टकराए हैं और कई बार अलग होने की कगार पर भी पहुंच गए. एक दो बार अलग होकर भी प्रयोग किया गया. वर्ष 2000 से अबतक दोनों दल तीन चुनाव अलग-अलग भी लड़ चुके हैं पर अंतिम परिणाम यही रहा कि ये दोनों ही दल फिर एक साथ आ गए.

क्या फिर एक हो सकता है महागठबंधन?
बिहार के राजनीति के जानकार कहते हैं कि कई बार दोनों ही बड़ी पार्टियों के बीच टकराव की वजह सामान्य बातें भी बनती रही हैं. इस बार भी महज दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव को लेकर दोनों ही पार्टियों ने अपने रास्ते अलग कर लिए. यह इसलिए क्योंकि बिहार में निकट भविष्य में 2024 में लोकसभा चुनाव हैं और 2025 में विधानसभा चुनाव होंगे. ऐसे में कांग्रेस के पास अभी लंबा वक्त है कि वह एकला चलो की नीति पर आगे बढ़ सकती है. लेकिन, सवाल यह कि क्या भविष्य में ये दोनों ही पार्टियां फिर एक हो जाएंगी?

राजद-कांग्रेस का ऐसे आना हुआ साथ
बिहार में जब 1990 में लालू यादव सत्ता में आए थे तो उन्होंने कांग्रेस को ही परास्त किया था. जाहिर है यह तो कांग्रेस के लिए और भी पीड़ादायक होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वर्ष 2000 की बात है, तब झारखंड भी बिहार का हिस्सा था. लालू यादव तब सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं जुटा पाए थे. इसी समय लालू यादव ने सोनिया गांधी से कांग्रेस का सहयोग मांगा था. उस वक्त 324 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए लालू यादव को कम से कम 163 विधायकों की आवश्यकता थी, लेकिन उनके 123 ही विधायक थे. कांग्रेस विधायकों की संख्या 24 थी. वामदलों और कांग्रेस को साथ लेकर लालू प्रसाद ने राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद की सरकार बनाई थी. कांग्रेस के 23 विधायक मंत्री बनाए गए और सदानंद सिंह को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया.

रामविलास आए साथ तो लालू ने कांग्रेस से किया किनारा!
चार साल बड़ी ही अच्छे से दोस्ती चली और यह 2005 तक चला. उस वर्ष विधानसभा चुनाव में दोनों ही दलों की कई जगहों पर फ्रेंडली फाइट भी हुई. दोस्ती तो बरकरार रही, लेकिन नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गई. इसके बाद वर्ष 2009 में परिस्थितियां बदल गईं और राम विलास पासवान और लालू साथ आ गए. कांग्रेस के लिए सिर्फ तीन सीटें छोड़ी गईं और शेष 37 सीटों पर रामविलास-लालू के कैंडिडेट मैदान में उतरे. राजद ने यहां भी एकतरफा घोषणा की थी ऐसे में कांग्रेस बौखला गई. राजद को सबक सिखाने को राजद के कई बागियों को टिकट दिए और सभी 40 संसदीय सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए. परिणाम यह रहा कि राजद चार कांग्रेस सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई.

अकेले हुई आरजेडी-कांग्रेस तो बुरी तरह पिछड़ी
इस बीच एनडीए (भाजपा-जदयू गठबंधन) मजबूत होती जा रही थी, लेकिन कांग्रेस-राजद आपस में उलझे रहे. तल्खी बरकरार रही और 2010 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस चार और राजद सिर्फ 22 सीटें ही जीत पाई. विधानसभा चुनाव में राजद की सबसे बड़ी हार साबित हुई. लोकसभा 2014 तक दोनों दल मिले तो सही, लेकिन सीटों पर किचकिच जारी रही. इस वर्ष कांग्रेस 12 सीटों पर चुनाव लड़ी और वह केवल दो सीटों पर जीती, जबकि 27 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन, चार पर ही जीत हासिल हुई थी. इसके बाद 2019 लोकसभा चुनाव में दोनों दल साथ लड़े, लेकिन नतीजा हुआ कांग्रेस ने एक सीट जीती तो राजद का सूपड़ा ही साफ हो गया.

क्या राजद ने कांग्रेस को ज्यादा सीटें दी थीं?
इसके बाद 2020 के विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस-राजद के बीच खींचतान जारी रही. कांग्रेस ने 243 सदस्यीय विधानसभा सीटों में 70 पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन जीत महज 19 को ही मिली. जबकि राजद ने 142 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और उनके 75 विधायक चुने गए. अभी महागठबंधन में शामिल राजद, कांग्रेस और वामदलों को मिलाकर 110 विधायक हैं. यानी बहुमत से महज 12 कम. ऐसे में कांग्रेस यह मानती है कि अगर तब कांग्रेस 35 से 40 सीटों पर लड़ती तो शायद आज बिहार में महागठबंधन की सरकार होती. जाहिर है राजद को यह टीस सालती रहती है कि हाथ में आई सत्ता कांग्रेस की जिद की वजह से छिटक गई.

कांग्रेस-राजद का टकराव कहीं नूरा-कुश्ती तो नहीं!
बहरहाल, अब जब राजद और कांग्रेस ने तारापुर और कुशेश्वरस्थान में अपने-अपने उम्मीदवार उतारे हैं और कांग्रेस ने महागठबंधन खत्म होने का ऐलान भी कर दिया, अब यही कहा जा रहा है कि कांग्रेस-राजद की दोस्ती फिलहाल टूट गई है. लेकिन सियासी जानकार यह भी संशय जाहिर करते हैं कि बीते 8 अक्टूबर को जिस अंदाज में लालू यादव और राहुल गांधी की दिल्ली में मुलाकात हुई यह बताता है कि कांग्रेस खुले तौर पर 2024 के लोकसभा चुनाव और 2025 के विधानसभा तक अब भी राजद से अलग स्टैंड कर पाएगी, यह देखना बेहद ही दिलचस्प होगा.

Tags: Bihar politics, Congress, Kanhaiya kumar, Mahagathbandhan, RJD, RJD news

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