आत्मनिर्भर भारत की मिसाल बना बिहारः सरकारी योजना से पटरी पर लौटने लगी प्रवासी मजदूरों की जिंदगी

बिहार सरकार की योजनाओं से आत्मनिर्भर बन रहे प्रवासी मजदूर.

बिहार सरकार की योजनाओं से आत्मनिर्भर बन रहे प्रवासी मजदूर.

कोरोना संक्रमण की वजह से लागू लॉकडाउन के दौरान बाहरी राज्यों से लौटे बिहार के प्रवासी मजदूर अब अपने गांवों-शहरों में स्वरोजगार से जुड़कर हो रहे आत्मनिर्भर. सरकार की योजनाओं के लाभ से खुश मगर प्रशासन का सहयोग न मिलने से हैं नाराज.

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पटना. कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों, इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है कि मोहम्मद मंजूर और उनके दोस्तों ने. मो. मंजूर और उनके दोस्त कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़कर आज अपने दम पर उस मुकाम तक जा पहुंचे, जिसे हम आत्मनिर्भरता की संज्ञा देते हैं. जी हां, हम उसी आत्मनिर्भरता की चर्चा कर रहे हैं जिसका संकल्प देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिलाते हैं.

वैशाली का पातेपुर आज आत्मनिर्भर भारत की मिसाल बन रहा है और मोहम्मद मंजूर और उनके दोस्त बिहार के प्रवासी मजदूरों के लिए नजीर साबित हो रहे हैं. बिहार सरकार की नव प्रवर्तन योजना मोहम्मद मंजूर और उनके साथियों के लिए संजीवनी का काम कर रही है. सालों साल से दूसरे प्रदेशों में काम कर रहे ये लोग आज एक छत के नीचे अपना कारखाना चला रहे हैं. इसमें किसी ने 25 साल तक सूरत (गुजरात) में काम किया है, तो कोई पश्चिम बंगाल और पंजाब या राजस्थान में 16-17 सालों तक गांव-परिवार से दूर रोजी-रोटी की खातिर ठोकरें खा रहा था. लेकिन आज अपने गांव के अपने घर में खुद का रोजगार पाकर ये कितने उत्साहित हैं ये इनके चेहरे की खुशी बयां करती हैं.

मोहम्मद मंजूर बताते हैं कि उन्होंने पिछले 25 सालों तक सूरत में टेलर का काम किया है. पैसे तो कमाए लेकिन गांव और परिवारवालों से दूर रहा. कोरोना संकटकाल में जब हम किसी तरह से अपने गांव लौटे तो निश्चय कर लिया कि अब अपने प्रदेश से दूर कहीं नहीं जाएंगे. 15 दिनों तक क्वारन्टीन सेंटर में रहने के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नव प्रवर्तन योजना और स्वरोजगार की बात का पता चला तो मानो जिंदगी बदल गई. मंजूर बताते हैं कि उन्होंने यह सोचा तक नहीं था कि वो अपने गांव के दोस्तों के साथ अपने ही गांव में कोई कारखाना चलाएंगे. लेकिन सरकार की इस योजना से उन्हें बहुत लाभ मिला. सरकार की तरफ उन्हें  13 सिलाई मशीन मुहैया कराई गई, जिसकी बदौलत आज वे अपना छोटा सा कारखाना चला रहे हैं.

मंजूर ने बताया कि उनके कारखाने में मेन्स-लेडीज गारमेंट्स तैयार होता है. उनके साथ मुस्तकीम और तौहीद भी सरकार की इस योजना से लाभान्वित हो रहे हैं. हालांकि उन्हें सरकार के सिस्टम से शिकायतें भी हैं. मसलन उन्हें ना तो कच्चा माल उपलब्ध हो पाता है और ना ही मार्केट, जहां कारखाने में तैयार रेडीमेड गारमेंट्स की खपत हो सके. मजबूरन इन्हें खुद से उत्पादन करके स्थानीय बाजार में घूम-घूमकर बेचना भी पड़ता है. बावजूद इसके न तो इनका हौसला कम हो रहा है और ना ही ये सरकार के खिलाफ खुलकर शिकायत करते हैं.
सिस्टम की लापरवाही के प्रति गुस्सा भी

वैशाली के पातेपुर में सरकार की योजना से प्रवासी मजदूरों की जिंदगी बेशक बदल रही है, लेकिन हाजीपुर से सटे बेलकुंडा में हालात थोड़े अलग हैं. सरकार की नव प्रवर्तन योजना बेशक यहां तक भी पहुंची है, लेकिन सिस्टम की लापरवाही के चलते यहां के प्रवासी मजदूरों में बहुत नाराजगी है. इन लोगों को सरकार ने 4 लाख तक की मशीन उपलब्ध करा दी हैं, लेकिन महीनों बीतने के बाद भी अब तक उनके कारखाने में बिजली सप्लाई चालू नहीं हुआ है. इसके चलते 4 महीने से महंगे मशीन बेकार पड़े हुए हैं.

दिल्ली में फर्नीचर के कारखाने में 7 साल तक काम करने के बाद कोरोनाकाल में बिहार लौटे राहुल सरकार के सिस्टम से बहुत दुखी हैं. राहुल बताते हैं कि सरकार की नवप्रवर्तन योजना का लाभ तो मिला लेकिन स्थानीय प्रशासन का सहयोग नहीं मिल पा रहा है. महीनों से जिलाधिकारी और बिजली विभाग का चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन अब तक उनके फर्नीचर के कारखाने तक बिजली नहीं पहुंची है. यहां तक कि इन प्रवासी मजदूरों ने अपने जेब खर्च से बिजली का मीटर तक लगा लिया, फिर भी 2 हफ्ते बीत जाने के बिजली का कनेक्शन नहीं जुड़ा.



राहुल के साथ इस कारखाने से दिल्ली और कुछ दूसरे राज्यों में काम करनेवाले करीब 10 प्रवासी भी जुड़े हैं, जिनका भविष्य इस कारखाने से ही जुड़ा है. मोहम्मद मंजूर और राहुल की ही तरह चंपारण और पूर्णिया में भी प्रवासी मजदूरों की जिंदगी फिर से पटरी पर लौटने लगी है. सरकार की इस योजना ने सबको आत्मनिर्भर बना दिया है. बेतिया में सरकार की इस योजना ने प्रवासी मजदूरों में क्रांति ला दी है तो कुछ यही नजारा पूर्णिया का भी है, लेकिन पूर्णिया में प्रवासी मजदूरों को बैंकों से कोई मदद नहीं मिल पा रही है. लोगों को लोन के चलते बैंकों के चक्कर भी लगाने पड़ रहे हैं, बावजूद इसके प्रवासी मजदूरों में इस बात से खुशी है कि कम से कम बिहार में शुरुआत तो हुई.
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