बिहार से शुरू हुआ रिवर्स माइग्रेशन, मजदूर पकड़ने लगे दिल्ली-पंजाब और बेंगलुरु की बसें
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बिहार से शुरू हुआ रिवर्स माइग्रेशन, मजदूर पकड़ने लगे दिल्ली-पंजाब और बेंगलुरु की बसें
बिहार के आरा स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करता प्रवासी मजदूर का परिवार

Lockdown के बीच आरा से लौट रहे अल्लाउद्दीन बताते हैं कि दिल्ली में उनकी छोटी सी दुकान है, जिसे वापस खोलने के लिए जा रहे हैं. कोरोना वायरस की वजह से घर आने पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है.

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  • Last Updated: June 10, 2020, 12:53 PM IST
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रिपोर्ट- राजेंद्र पाठक/अभिनय प्रकाश

पटना. कोरोना लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान अपने घर यानी बिहार आने वाले मजदूर अब फिर से वापस होने लगे हैं. बात चाहे राज्य के कोसी इलाके और सीमांचल की हो या फिर पटना से सटे भोजपुर समेत शाहाबाद की, हर जगह से मजदूरों का पलायन यानी रिवर्स माइग्रेशन शुरू हो गया है. बिहार के कोसी इलाके से प्रवासी श्रमिक (Migrant Labors) हरियाणा-पंजाब वापस होने लगे हैं तो आरा, बक्सर, भोजपुर और रोहतास के मजदूर दिल्ली से लेकर सिकंदराबाद और बंगलुरु तक.

धान की खेती का है वक्त



अपनी वापसी की वजह मजदूर और कामगार साफ तौर पर स्थानीय स्तर पर रोजगार की व्यवस्था नहीं होना करार दे रहे हैं. इलाके में ऐसे दृश्य दिखने शुरू हो गए हैं, वो भी तब जब एक ओर रोजगार देने के सरकारी दावे किए जा रहे हैं तो दूसरी ओर धान की खेती शुरू होने का वक्त है. पूर्णिया और सहरसा प्रमंडल के जिलों में आए प्रवासी श्रमिकों का जत्था फिर से उन्हीं ट्रेनों से वापस होने लगा है, जो उनको परदेश लेकर जाती हैं.
कोई दिल्ली तो कोई सिकंदराबाद का कर रहा रुख

आरा स्टेशन पर राजगीर-नई दिल्ली जाने वाली श्रमजीवी एक्सप्रेस से दिल्ली जाने के लिए स्टेशन पर मजदूरों का रोजाना आना जारी है. मजदूर मुमताज बताते हैं कि उनका परिवार दिल्ली में फंसा हुआ है. लॉकडाउन के पहले हम अपने गांव आए थे और वापस दिल्ली नहीं जा सके. हमारे परिवार के कुछ सदस्य वहां फंसे हुए हैं. हम वहां जूते की फैक्ट्री में काम करते हैं. हम अपने परिवार के सभी सदस्यों के साथ वापस दिल्ली के मंगोलपुरी जा रहे हैं. वहीं आरा से सिकंदराबाद जाने के लिए आरा स्टेशन पर राम कुमार और संजय कुमार पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस का इंतजार कर रहे थे. उन्होंने बताया कि होली में हम आरा आ गए थे. लॉकडाउन के कारण नहीं लौट सके. जो पैसा हमारे पास था वह खत्म हो गया. पापी पेट का सवाल है अब हमें काम पर वापस जाना है. हमारे पास जितने पैसे थे वे तो कब के खत्म हो गए.

बोले- खाएंगे नहीं तो जियेंगे कैसे

मजदूरों का कहना है कि कोरोना बीमारी से बचना अमीर लोगों के लिए आसान है. गरीब आदमी जब तक कमायेगा नहीं तो क्या खाएगा. आरा स्टेशन पर ही बंटी नाम के एक शख्स ने बताया कि वह दिल्ली से 20 दिन पहले ही आया था. 14 दिन क्वारंटाइन में रहने के बाद अपने घर गया और वापस अपनी पत्नी को लेकर आज दिल्ली जा रहा है. रोजी-रोटी की समस्या को लेकर दिल्ली जा रहे अल्लाउद्दीन बताते हैं कि दिल्ली में उनकी छोटी सी दुकान है, जिसे वापस खोलने के लिए दिल्ली जा रहे हैं. लॉकडाउन के बाद घर आने पर भी रोजी-रोटी की परेशानी का सामना करना  पड़ा है.

मालिक ने वापस लाने के लिए भेज दी बस

मजदूरों की मजबूरी या फिर काम कराने की जरूरत कहें, मजदूरों को लेने उनके मालिक भी खुद घरों तक आ रहे हैं. पूर्णिया के कन्हरिया गांव में हरियाणा से उनके नियोजक की एक बस से आए और उनको वापस ले गए. दूसरी और सीमांचल के जिलों जिनमें किशनगंज और सहरसा शामिल हैं, के रेलवे स्टेशनों पर ऐसे प्रवासी श्रमिकों की जमात वापस जाती दिखने लगी है. श्रमिक मामलों के समाजिक जानकारों ने इस घटनाक्रम पर साफ कहा है कि इस दौर में बिचारे प्रवासी श्रमिक, न घर के हैं न घाट के.

सरकार ने करा रखा है स्किल मैपिंग का इंतजाम

पूर्णिया जिले के बायसी अनुमंडल के कई गांवों में ऐसे हालात दिख रहे हैं जहां पंजाब, हरियाणा के नियोजकों ने बाजाप्ता बस भेजकर श्रमिकों को वापस बुलाना किया है. पूर्णिया के डीएम ने प्रवासी श्रमिकों के बड़े पैमाने पर स्किल मैपिंग कराकर रोजगार देने का दावा कर रखा है, पर कन्हरिया गांव का यह नमूना उनके दावों की पोल खोलता है. बाकी बात और दावों की हकीकत स्थानीय जानकारों के मुंह से निकल आ रही है.

श्रम अधीक्षक को नहीं है पता

इस बाबत जब पूर्णिया के श्रम अधीक्षक से प्रवासी श्रमिकों की वापसी के बारे में जानकारी लेने का प्रयास किया तो उन्होंने कहा कि न तो उन्हे इस बात की जानकारी है न उन्हे कुछ कहना है. क्योंकि उनके पास बताने के लिए कोई न बात है न कुछ आंकड़ें. मालूम हो कि गृह मंत्रालय से आदेश के बाद 1 मई को बिहार समेत पूरे देश में श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का परिचालन शुरू किया गया था. महज एक महीने के भीतर तकरीबन 15 लाख प्रवासी मजदूर बिहार लौटे हैं.

 

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