Opinion: दंगाइयों ने पूर्णिया के महादलितों की बस्तियां जला दीं, सब चुप बैठे, राजनीतिक हिसाब-किताब करते रहे

पूरा देश कोरोना से लड़ाई लड़ रहा था, वहीं दंगाइयों ने पूर्णिया के महादलितों की बस्तियां जला दीं, सब चुप बैठे, राजनीतिक हिसाब-किताब करते रहे.

पूरा देश कोरोना से लड़ाई लड़ रहा था, वहीं दंगाइयों ने पूर्णिया के महादलितों की बस्तियां जला दीं, सब चुप बैठे, राजनीतिक हिसाब-किताब करते रहे.

जब पूरा भारत कोरोना के खिलाफ महामारी में एकजुट होकर लड़ने की कोशिश में जुटा है ऐसे में बिहार के पुर्णिया जिले में महादलितों की बस्ती में आग लगाकर उन्हें बेघर कर दिया गया. इस घटना में एक सेवानिवृत चौकीदार नेवालाल राय की मौत हो गई और कई लोग ज़ख्मी हुए. जिन महादलित परिवारों के ऊपर हमला हुआ वे पूर्णिया के मझुआ गांव में दशकों से रहते हैं. 

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पटना. जब पूरा भारत कोरोना के खिलाफ महामारी में एकजुट होकर लड़ने की कोशिश में जुटा है ऐसे में बिहार के पुर्णिया जिले में महादलितों की बस्ती में आग लगाकर उन्हें बेघर कर दिया गया. इस घटना में एक सेवानिवृत चौकीदार नेवालाल राय की मौत हो गई और कई लोग ज़ख्मी हुए.

जिन महादलित परिवारों के ऊपर हमला हुआ (महादलित बिहार में कोई एक जाति नहीं बल्कि दर्जन भर से ज़्यादा जातियों का एक समुच्चय है) वो पूर्णिया के मझुआ गांव में दशकों से रहते हैं. इसमें बहुतों को सरकारी आवास दिया गया था और बहुत से लोग सरकारी ज़मीन पर घर बनाकर रह रहे थे.

इन्हीं महादलितों की बस्ती के पड़ोस में दूसरे समुदाय के लोग भी रहते हैं, जो इस इलाके में बहुसंख्यक हैं. 19 मई की रात को 11 बजे, दंगाइयों ने महादलितों की झोपड़ियों में आग लगा दी. जिनके घरों में आग लगाई गई वो गली मोहल्ले में सफाई का काम करने वाले लोग हैं. पुर्णिया के बायसी बासी थाने में पड़ने वाले मझुआ गांव में 19 मई की रात को आगजनी की घटना को अंजाम दिया जाता है, जिसमें 13 दलितों के घर जलकर स्वाहा हो गए. पुलिस द्वारा दर्ज किए गए एफआईआर के अनुसार कम से कम 100-150 के करीब लोग हमले में शामिल थे. तीन अलग अलग एफआईआर में  60 आरोपी तो नामजद किए गए हैं. कल शाम तक पांच लोगों की ही गिरफ्तारी हुई है. घटना के बाद ज्यादातर हमलावर में जो शामिल थे, फरार बताए हैं। ये सभी एक ही समुदाय से बताए जा रहे हैं.

बयासी थाने के मझुआ गांव में महादलितों की बस्ती है, जिसमें 90 से ज़्यादा घर हैं, वहीं साथ के टोले में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते हैं. जो वर्षों से ये दबाव बना रहे हैं कि महादलित इस इलाके से चले जाएं.
2015 के बाद से महादलितों की बस्ती पर कई बार हमले हुए ताकि वो बस्ती छोड़ कर भाग जाएं, लेकिन महादलितों के पास भी अपनी ज़मीन नहीं हैं, इसलिए वो यहीं सरकारी ज़मीन डटे रहे.

सूचना के मुताबिक इस गांव में पहले भी तनाव रहा है तीन वर्ष तक यहां पुलिस की भी तैनाती रही. बीते वर्ष अप्रैल के महीने में भी महादलितों की बस्ती में आग लगाई गई थी. इसका दोहराव फिर 19 मई को हुआ जब महादलितों के 13 घरों को आग के हवाले कर दिया गया. घटना के दौरान एक महादलित की मौत भी हो गई.

स्थानीय लोगों के अनुसार 19 मई को 150 से ज़्यादा लोगों ने महादलित के टोले पर हमला किया गया. कई घरों में आग लगा दी गई. दंगाई जिन घरों में आग नहीं लगा सके, उसको तोड़ दिया. गांव के लोगों ने बताया कि उनके ऊपर  लाठी, तलवार और साइकल के चेन से हमला किया गया. वहां की महिलाओं ने ये भी आरोप लगाया कि उनसे रेप की कोशिश की गई.



महिलाओं के साथ भी बदतमीजी

बहुत सी महिलाओं ने किसी तरह जान बचाकर यादव टोला में छिपकर जान बचाई. आज भी इन महिलाओं के शरीर पर जख्म के वह निशान मौजूद हैं. महिलायें उस वारदात को याद कर फफक कर रोने लगती है.

राजनीतिक दलों में चुप्पी पर सवाल

अचरज की बात है कि घटना के कई दिन गुजर जाने के बाद भी राजनीतिक दलों ने इस मामले पर चुप्पी अख़्तियार कर लिया है. स्थानीय वीएचपी नेता या अन्य हिन्दू संगठनों के अलावा अभी तक कोई भी महत्वपूर्ण नेता या मंत्री इस बस्ती में महादलितों का हाल पूछने नहीं आया.

2020 के विधान सभा चुनाव में यहां से असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से विधायक सैय्यद रुकनुद्दीन चुनकर आए हैं. इस बयासी प्रखण्ड में 65 फीसद के करीब मुस्लिम आबादी है. उनका कहना है यहां शुरु से गंगा जमुनी तहजीब के तहत हिन्दू मुस्लिम एक साथ रहते आए हैं. लेकिन ये घटना दर्शाती है कि महादलित यहां कई वर्षों से खौफ के साए में जी रहे हैं और स्थानीय मुस्लिम समुदाय द्वारा उन्हें हटाने का प्रयास वर्षों से चल रहा है. बंगालदेश बनने के बाद भारी संख्या में बाहरी मुस्लिम भी यहां आए और यहां की आबादी में घुल-मिल गए. आज यह पहचान कर पाना भी मुश्किल है कि वो यहां के स्थानीय हैं या बाहर से आए हैं.

मझुआ का विवाद क्या है?

- गांव में 30 साल से रह रही है महादलित आबादी

- सड़क किनारे सरकारी जमीन पर बसे हैं महादलित

-महादलितों के बाद गांव में मुस्लिम आबादी बसी

- महादलितों को सड़क किनारे से हटाने के लिए होते हैं हमले

- 2015 से अब तक कई बार हो चुके हैं हमले

- 19 मई को 13 घरों को जला दिया गया, मारपीट की गई

मझुआ कांड के बाद कई सवाल

घटना के हफ्ता भर बाद भी अब तक सिर्फ पांच लोगों की गिरफ्तारी क्यों हुई है. जब स्थानीय पुलिस को ये पता था कि महादलितों के ऊपर हमले हो सकते हैं, तो फिर उस इलाके से पुलिस बल को क्यों हटाया गया था. अप्रैल महीने में हुए हमले के बाद भी पुलिस अलर्ट पर क्यों नहीं थी. और तो और वो तमाम लोग जो महादलितों और पिछड़ों के अधिकारों की बात करते रहते हैं, आज कहां गायब हो गए सारे के सारे?

पूर्णिया सहित सीमांचल में बदली आबादी का समीकरण

बयासी अनुमंडल में 2 विधानसभा क्षेत्र है बयासी और अमौर विधानसभा. दोनों क्षेत्रों में इस बार एआईएमआईएम के विधायक हैं . बायसी के विधायक सैयद रुकनुद्दीन हैं जबकि अमौर  के विधायक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान हैं. बायसी अनुमंडल की कुल आबादी करीब आठ लाख है जिसमें 66% मुस्लिम जबकि 34% हिंदुओं की आबादी है. बयासी विधानसभा में दलित वोटरों की संख्या करीब 20,000 है जबकि जनसंख्या करीब 35000 है. पूर्णिया के बायसी और अमौर विधानसभा मिलाकर करीब एक लाख बांग्लादेशी बधिया मुस्लिम है जो शेरशाह वादी के नाम से भी जाने जाते हैं. सीमांचल में बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या करीब सात लाख है. जिसमें किशनगंज लोकसभा में चार लाख, कटिहार में डेढ़ लाख आबादी बांग्लादेशियों की है . इनका मुख्य पेशा खेतीवाड़ी, पशु पालन, पशु का कारोबार और पशु तस्करी है, कुछ लोग अफीम वगैरह की खेती से भी जुड़े हैं.

नोटः ये लेखक के निजी विचार हैं. 

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