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आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव पर राष्ट्रीय परिसंवाद, प्रो. अरुण भगत ने बताया 'त्रिभाषा परम्परा' के प्रतीक पुरुष

आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव पर राष्ट्रीय परिसंवाद, प्रो. अरुण भगत ने बताया 'त्रिभाषा परम्परा' के प्रतीक पुरुष

आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव पर राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन.

आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव पर राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन.

Patna News: बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि रचनात्मकता की त्रिवेणी श्रीरंजन सूरिदेव के व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती थी. भाषा की दृष्टि से वे 'त्रिभाषा परम्परा' के प्रतीक पुरुष थे. उनके साहित्यिक आदर्श शिवपूजन सहाय, नलिन विलोच शर्मा और लक्ष्मी नारायण सुधांशु थे. वे वैदिक ज्ञान परम्परा, बौद्ध दर्शन और जैन चिंतन के प्रकांड अध्येता रहे. उन्होंने जानकारी दी कि राजकुमार पाठक नाम उन्हें घर से मिला परन्तु श्रीरंजन सूरिदेव नाम उन्होंने स्वयं रखा.

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    पटना. साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली (Sahitya Academy, New Delhi) के तत्वावधान में ‘आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव : व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ ( Acharya Dr. Ranjan Suridev) विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया. श्रीरंजन सूरिदेव के तैल चित्र पर सामूहिक पुष्पांजलि एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन हुआ. संयोजक अभिजीत कश्यप ने अतिथियों का परिचय सह स्वागत किया. उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नंद किशोर पांडेय ने की. बिहार विधान परिषद् के सभापति अवधेश नारायण सिंह ने कहा कि बिहार में साहित्यकारों की बड़ी परम्परा रही है. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर से ले कर श्रीरंजन सूरिदेव का जन्म इसी धरती पर हुआ है. राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह से जुड़े संस्मरणों को सुना कर उन्होंने अपनी वाणी को विराम देते हुए आश्वासन दिया कि आचार्य जी के ‘शब्दकोश’ के प्रकाशनार्थ जो भी सहयोग होगा, वह जरूर किया जाएगा.

    अध्यक्षीय उद्बोधन में केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नंद किशोर पांडेय ने कहा कि भारत ने विश्वगुरु की परंपरा का निर्वहन किया है. उन्होंने कहा कि श्रीरंजन सूरिदेव को राहुल सांकृत्यायन और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परंपरा में देखा जाना चाहिए. उन्होंने स्पष्ट कहा कि आचार्य जी को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे. तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें अपने आसन से नीचे उतरकर उन्हें सम्मानित किया था. प्रो० पांडे ने आगे कहा कि उनकी जो पांडुलिपियाँ अभी प्रकाशनार्थ पड़ी हुई हैं उन्हें अतिशीघ्र प्रकाशित कराया जाना चाहिए. बाल साहित्य पर उन्होंने आठ पुस्तकें लिखीं. अन्य भारतीय भाषाओं से हिंदी को जोड़कर उन्होंने विराट कार्य किया

    त्रिभाषा परंपरा के प्रतीक पुरुष थे डॉ. सूरिदेव
    बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. अरुण कुमार भगत ने अपने बीज वक्तव्य में कहा कि रचनात्मकता की त्रिवेणी श्रीरंजन सूरिदेव के व्यक्तित्व में दिखाई पड़ती थी. भाषा की दृष्टि से वे ‘त्रिभाषा परम्परा’ के प्रतीक पुरुष थे. उनके साहित्यिक आदर्श शिवपूजन सहाय, नलिन विलोच शर्मा और लक्ष्मी नारायण सुधांशु थे. वे वैदिक ज्ञान परम्परा, बौद्ध दर्शन और जैन चिंतन के प्रकांड अध्येता रहे. उन्होंने जानकारी दी कि राजकुमार पाठक नाम उन्हें घर से मिला परन्तु श्रीरंजन सूरिदेव नाम उन्होंने स्वयं रखा.

    एमएलसी राजेन्द्र गुप्ता के विचार
    बिहार विधान परिषद् के सदस्य राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता ने कहा कि आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव के साथ उनका व्यक्तिगत सम्बन्ध रहा, वे देखने में जितने सुंदर थे उससे कहीं ज्यादा उनके व्यक्तित्व में गहराई थी जो उनके साहित्य में दिखती है. ए एन कॉलेज, पटना के प्रधानाचार्य शशि प्रताप शाही प्रो. अरुण भगत को उनकी आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव को समर्पित सद्य प्रकाशित पुस्तक के लिए बधाई दी और अपने कॉलेज की उपलब्धियों के विषय में बताया. साहित्य आकदमी, नयी दिल्ली के सहायक सम्पादक डॉ०अजय शर्मा ने कहा कि हम देशभर में ऐसे कर्यक्रम करते रहते हैं ताकि नयी पीढ़ी जागरूक हो सके.

    मौलिकता के विसर्जन सिद्धांत
    केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के उपाध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने कहा कि बिहार के साहित्यिक विकास में आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव का योगदान अतुलनीय है, ऐसे में उनके नाम पर एक युग का नामकरण होना चाहिये. उन्होंने आचार्यजी की ‘मौलिकता के विसर्जन’ सिद्धांत पर प्रकाश डाला.

    आचार्य सूरिदेव के बारे में क्या बोले वक्ता
    दिल्ली विश्वविद्यालय की वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. कुमुद शर्मा ने कहा कि ‘आचार्य’ शब्द यूंही प्राप्त नहीं होता. उनकी वैचारिक संवेदना ने उन्हें साहित्य का सिरमौर बनाया. उन्होंने भारतीय मनीषा के सभी मूल्यवान तत्त्वों का विवेचन और विश्लेषण किया है.

    प्रख्यात साहित्यकार डॉ. कुणाल कुमार ने कहा कि आचार्य जी की विशेषता यह थी कि वे सबका समादर करते थे, उन्होंने कभी किसी को छोटा नहीं समझा.वे नए शब्दों के सर्जक थे. उन्होंने हिंदी को ऐसे कई शब्द दिए जो शब्दकोश में नहीं मिलते. श्री गुंजन अग्रवाल ने कहा कि बिहार में सबसे ज्यादा पुस्तकों की भूमिका और समीक्षा आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव ने लिखी है. तृतीय सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में हिंदुस्तानी अकादमी, प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ० उदय प्रताप सिंह ने कहा कि हमें आचार्यजी की व्यवहारिकता को अपने जीवन में उतारना चाहिए.

    पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. शिवनारायण ने कहा पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी, पंडित जानकी वल्लभ शास्त्री की वैदुष्य परम्परा में आचार्य जी को देखा जाना चाहिए. साहित्यकार कैलाश प्रसाद स्वछंद ने आचार्यजी के व्यक्तित्व और कर्तृत्व पर प्रकाश डाला. मेहता नगेन्द्र ने आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव पर एक सुंदर कविता का पाठ किया. इस अवसर पर प्रो० वीरेंद्र झा, डॉ० ध्रुव कुमार, गौरव रंजन, शोभित सुमन, कृष्णा अनुराग, दिव्या, सुमित कुमार आदि ने कार्यक्रम में सक्रिय सहभागिता दी.कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्र शामिल हुए.

    Tags: Bihar News, Bihar News in hindi, PATNA NEWS, Patna News Update

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