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मोदी सरकार के हर गांव में बिजली के दावे की News18 ने खोली पोल

अब भी कई गांव रौशनी के लिए लालटेनों पर निर्भर

अब भी कई गांव रौशनी के लिए लालटेनों पर निर्भर

राजधानी पटना से कुछ ही किलोमीटर दूर के गांवों में बिजली पहुंचने के बावजूद भी लोग रौशनी के लिए लालटेन पर निर्भर है.

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मोदी सरकार ने रविवार को एक बड़ा ऐलान किया. इस ऐलान के तहत बताया गया कि मणिपुर के एक आखिरी बचे गांव को पावर ग्रिड से जोड़ने के साथ ही देश के सभी गांवों में बिजली पहुंच चुकी है. प्रधानमंत्री मोदी समेत दूसरे बीजेपी नेताओं ने इस उपलब्धी के लिए तेजी से बधाइयां देनी भी शुरु कर दी.

बिहार के एक गांव में न्यूज़18 ने इस बात का एक रियलिटी चेक किया. इस रियलिटी चेक में सामने आया कि राजधानी पटना से कुछ ही किलोमीटर दूर के गांवों में बिजली पहुंचने के बावजूद लोग रौशनी के लिए लालटेन पर निर्भर है. थोड़ा आगे बढ़ने पर ये साफ हो गया कि अभी भी कई गांव ऐसे हैं जहां कागज़ों पर तो बिजली पहुंच गई है लेकिन वहां बिजली सप्लाई की कोई व्यवस्था है ही नहीं.

केन्द्र सरकार से पहले पिछले साल दिसंबर में ही नीतीश सरकार ने भी इस बात का दावा किया था कि सभी गांवों में बिजली पहुंचाई जा चुकी है. राजधानी पटना से 15 किलोमीटर दूर गंगा के आस-पास के गांवों में बिजली सप्लाई का कोई नामो निशान तक नहीं मिला. पिछले साल मधोपुर गांव के लोग पहली बार बिजली के खंभे और ट्रांसफॉर्मर देखकर काफी उत्साहित भी हुए थे. इसके बाद जल्द ही इसे फीडर से जोड़ कर उद्घाटन का वक्त निर्धारित कर दिया गया. इलाके के सांसद रामकृपाल यादव और दानापुर के विधायक आशा देवी ने बटन दबाकर बिजली का बल्ब जलाया और बड़े उत्साह से गांव में बिजली शुरु की गई. लेकिन गांव वालों की ये खुशी सिर्फ चार घंटों के लिए ही थी.

गांव के एक शख्स प्रमोद कुमार ने कहा  "नेताओं के जाते ही बिजली चली गई" प्रमोदी की बीवी सोनिया ने बताया  "उस उद्घाटन के बाद कोई नहीं आया और हमें अंधेरे में ही छोड़ दिया गया". मधोपुर गांव की तरह पटना से 175 किलोमीटर दूर पश्चिम चंपारण जिले के 22 गांवो को अभी तक बिजली सप्लाई के लिए किसी इंफ्रास्ट्रक्चर से नहीं जोड़ा गया है. बिजली के खंभों और ट्रांसफॉर्मर का गांवों में नामो निशान तक नहीं है. हालांकि कुछ परिवारों ने बिजली के लिए खुद से सोलर पैनल खरीदे हैं.

चंपारण के रामनगर ब्लॉक में पड़ने वाले गोबरहिया, समरेहनी, नौरंगिया, धोकनी और गरदी समेत कुछ गांव ऐसे भी है जहां बिजली दूर का सपना है. क्योंकि वहां बिजली कनेक्शन या कोई और इंतजामों का नामो निशान तक नहीं है.

कुछ गांवो में बिजली के खंभे तो लगा दिए गए है लेकिन केबल नहीं बिछाए गए हैं. सरकार के सोलर पैनल मुहैया करवाने की योजना भी फेल है क्योंकि बैटरी इंस्टॉल नहीं की गई है.

सीतामराही डिस्ट्रिक हेडक्वाटर से सात किलोमीटर दूर मिसरौलिया गांव के लोगों ने बताया कि बिजली कनेक्शन के नाम पर कुछ बिजली अधिकारियों ने हर परिवार से दो-दो हजार रुपए भी वसूले लेकिन बिजली अभी तक नहीं आई. बिजली के खंभे तो लगे हैं लेकिन केबल गायब हैं कोई ट्रांसफॉर्मर भी नहीं है. हालांकि कुछ घरों में पैसे के बदले मीटर इंस्टॉल करके दिए गए. और तो और बिजली के बिना ही एक फिक्स अमाउंट का बिल भी आने लगा.

बिजली के बगैर बिजली का बिल


इस गांव में करीब चार हजार लोग रहते है और 1900 वोटर्स भी है. चुनावों के दौरान नीतीश कुमार अक्सर इस इलाके में आते हैं क्योंकि यहां के अधिकतर परिवार नीतीश कुमार की तरह कुर्मी समाज से ही आते हैं.

गांव में रहने वाले पप्पू पटेल ने बताया  "गांव की लगभग 250 परिवारों ने पांच साल पहले ही बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन दिया था लेकिन अभी भी हमारी किस्मत में लालटेन ही है. उपर से बिजली आए बिना बिजली का बिल भेजकर सरकार हमारा मजाक बना रही है. हमने शिकायत भी की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई."

मधेपुर से मिसरौलिया गांव तक लोग अब भी बिजली और करौसिन की कम उपलब्धता से परेशान है. मिसरौलिया गांव के ललन कुमार ने कहा "पहले हमें तीन लीटर कौरोसिन मिलता था चूंकि मेरे गांव में कागज़ो पर बिजली पहुंच गई है तो अब केवल 1.5 लीटर कौरोसिन ही मिलता है." गांवों में लोग रौशनी के लिए लालटेन और स्टोव के लिए कौरोसिन पर निर्भर रहते हैं.

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