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JDU के अंदर कोई कन्फ्यूजन है या फिर ये CM नीतीश कुमार की कोई खास रणनीति है?

News18 Bihar
Updated: November 1, 2019, 2:18 PM IST
JDU के अंदर कोई कन्फ्यूजन है या फिर ये CM नीतीश कुमार की कोई खास रणनीति है?
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार. (फाइल फोटो)

केसी त्यागी की 'हां' और सीएम नीतीश की 'ना' वाले बयान के बाद लोगों को लगा कि जेडीयू के भीतर कहीं न कहीं विरोधाभास है. ऐसे में बिहार के राजनीतिक गलियारे में यही सवाल चर्चा में है कि क्या पार्टी के भीतर वास्तव में कोई कन्फ्यूजन है? या फिर सीएम नीतीश किसी लंबी रणनीति पर चल रहे हैं? राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसकी कई वजहें हैं.

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पटना. बुधवार को जेडीयू के प्रधान महासचिव केसी त्यागी (KC Tyagi) ने दिल्ली में पार्टी के राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद दो महत्वपूर्ण बातें कहीं. पहला ये कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) में देश चलाने की क्षमता है. दूसरा ये कि अगर उचित भागीदारी मिले तो जेडीयू केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल हो सकती है. इस बात को जेडीयू महासचिव पवन वर्मा (Pawan Verma) ने भी आगे बढ़ाया और साफ-साफ कहा कि अगर ऐसा हो तो इसमें कोई बुराई नहीं. लेकिन गुरुवार को जब पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार (Bihar) के सीएम नीतीश कुमार जब पटना पहुंचे तो उन्होंने साफ-साफ कहा कि ये सब फालतू की बात है.

जाहिर है केसी त्यागी की 'हां' और सीएम नीतीश की 'ना' वाले बयान के बाद लोगों को लगने लगा कि जेडीयू के भीतर कहीं न कहीं विरोधाभास है. ऐसे में बिहार के राजनीतिक गलियारे में यही सवाल चर्चा में है कि क्या पार्टी के भीतर वास्तव में कोई कन्फ्यूजन है? या फिर सीएम नीतीश किसी लंबी रणनीति पर चल रहे हैं? राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसकी कई वजहें हैं.

दूर की सोचते हैं CM नीतीश
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार कहते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं और वो राजनीतिक समझ के मामले में पीएम मोदी और अमित शाह से कतई कम नहीं हैं. नीतीश कुमार जैसे राजनीतिज्ञ आने वाले आठ-दस साल की राजनीति को भांपते और आंकते हुए अपनी राजनीतिक गोटियां चलते हैं. ऐसे में केसी त्यागी और नीतीश कुमार के बयान को अलग-अलग समझने की जरूरत नहीं है. ये दोनों बयान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, बस उसके अर्थ को समझें.

'दूर-दूर, पास-पास' वाली राजनीति
बकौल प्रेम कुमार बिहार में हुए एक लोकसभा और 5 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव से पहले जब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि 2020 का विधानसभा चुनाव सीएम नीतीश की अगुआई में ही लड़ा जाएगा तो फिलहाल एनडीए में आपको सबकुछ ठीक लग रहा है, लेकिन आने वाले समय में क्या होगा, ये कोई नहीं जानता. दरअसल सीएम नीतीश कुमार की बीजेपी की राजनीति का सबसे अहम पहलू दूर-दूर, पास-पास वाली राजनीति है.

पीएम मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

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ताकि कोई सवाल न उठे
वहीं, बिहार की राजनीतिक गलियारों की हर हलचल से वाकिफ वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि नीतीश कुमार की राजनीति हमेशा ही बीजेपी के साथ रहने के बाद भी उनसे दूरी बनाए रखने की रही है. यह सिलसिला आज से नहीं बल्कि वर्ष 1996 से चला आ रहा है. सीएम नीतीश का ताजा बयान भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. दरअसल यह उस बात का भी संकेत है कि आने वाले समय में अगर राजनीति में कुछ परिवर्तन हो तो नीतीश के लिए किसी भी तरह से असहज स्थिति न हो.

'नीतीश टाइप पॉलिटिक्स यही है'
सीएम नीतीश की राजनीति को बेहद करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेल्लारी कहते हैं कि सीएम नीतीश की राजनीति को समझना हो तो हाल में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की प्रक्रिया के दौरान और उसके बाद में उनके दो नेताओं के बयानों को समझिए. पहला उनके मंत्री श्याम रजक ने कहा कि यह काला दिन है. उन्होंने यह बात दूसरे और तीसरे दिन भी दोहराई. दूसरा उनके बेहद करीबी राज्यसभा सांसद आरसीपी सिंह ने कहा कि अब तो कानून बन गया और सबको यह मानना चाहिए. जाहिर है नीतीश टाइप पॉलिटिक्स यही है.

CM नीतीश की प्रेशर पॉलिटिक्स
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय कहते हैं कि यह प्रेशर पॉलिटिक्स का भी हिस्सा हो सकता है. दरअसल आने वाले 2020 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दोनों ही पार्टियां अपनी रणनीति बना रही हैं. इसमें बड़ा भाई कौन होगा इसको लेकर अभी बात होनी है. ऐसे में सीएम नीतीश कुमार पहले से ऐसा माहौल बनाए रखना चाहते हैं कि बीजेपी को हमेशा ये लगे कि इनका साथ हमारे लिए जरूरी है. ऐसे में सीटों की बारगेनिंग (मोलभाव) में इसका असर हो सकता है.

सीएम नीतीश ने जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को ममता बनर्जी के लिए काम करने की इजाजत देकर अपने विकल्प के बारे में भी बता दिया है. (फाइल फोटो)


बीजेपी-जेडीयू में आम सहमति  
बकौल रवि उपाध्याय जेडीयू के विरोध के बावजूद तीन तलाक और धारा 370 जैसे कोर मुद्दों के आसरे बीजेपी अपने वोट बैंक को जहां एड्रेस करती रही है, वहीं जेडीयू के लिए असहज स्थिति भी उत्पन्न करती रही है. हालांकि धारा 370, 35 ए और ट्रिपल तलाक जैसे विभिन्न मुद्दों पर अलग मत होने के बावजूद बीजेपी-जेडीयू के बीच एक आम सहमति सी है कि आप अपने स्टैंड पर रहें और हम अपने मुद्दों पर. यह स्थिति दोनों ही ओर से है और एक दूसरे पर किसी तरह का दबाव भी नहीं डाला जाता है.

कांग्रेस की पहल का इंतजार
वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार कहते हैं कि देश की राजनीति में बड़ी दावेदारी (प्रधानमंत्री पद) पेश करने की इच्छा नीतीश कुमार के सीने में वर्षों से दबी पड़ी है. इसी बात का इजहार केसी त्यागी ने भी कर दी है. यह एक तरह से कांग्रेस जैसे धर्मनिरपेक्ष कही जाने वाली पार्टियों के संदेश भी है. दूसरा पहलू ये है कि कांग्रेस में नेतृत्वहीनता की स्थिति नीतीश कुमार के लिए एक और अवसर लेकर आ सकती है.

सोनिया गांधी का अंतरिम अध्यक्ष बनाने के बाद यह भी उम्मीद की जा रही है कि विपक्षी दलों की एकता के लिए वो बड़ी भूमिका निभा सकती हैं. ऐसे में 2024 के आम चुनाव के लिए विपक्षी खेमे का नेतृत्व के लिए वो नीतीश के चेहरे को भी आगे कर सकती हैं.

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First published: November 1, 2019, 2:02 PM IST
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