नीतीश के साध लिया लव-कुश समीकरण, अब इसकी काट कैसे निकालेंगे तेजस्वी?

लव-कुश समीकरण बनने के बाद JDU बेहद मज़बूत

JDU के रणनीतिकारों ने अपने पुराने समीकरण लव-कुश को फिर से मजबूत करते हुए उपेन्द्र कुशवाहा को अपने पाले में कर बड़ा दांव खेला है. आरजेडी को MY समीकरण तक सिमटने को मजबूर कर दिया है. बिहार के लगभग 70% जातीय वोट बैंक पर NDA की दावेदारी मजबूत हो गई है.

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पटना. बिहार में लव-कुश समीकरण साधने के बाद नीतीश कुमार ने आरजेडी को जोरदार झटका दे दिया है. आरजेडी को MY समीकरण तक सिमटने को मजबूर कर दिया है. नीतीश की सहयोगी भाजपा, हम और VIP का जातीय समीकरण ऐसा है जिसके एक साथ होने पर 70% जातीय वोट बैंक पर NDA की दावेदारी मजबूत जाती है. बिहार की सियासत में जाति की राजनीति एक ऐसी सच्चाई है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता. विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा, टिकट के बंटवारे में तमाम राजनीतिक दल जातीय समीकरणों को प्राथमिकता देते हैं.

इस वक्त बिहार के सियासत में हर दल किसी ना किसी समीकरण में बंधा दिखता है, लेकिन विधानसभा चुनाव 2020 में JDU की उम्मीदों को धक्का लगा. चिराग पासवान और आरएलएसपी ने जेडीयू को खासा नुकसान पहुंचाया. चुनाव बाद जेडीयू ने लव-कुश समीकरण को साधना शुरू किया. पार्टी में नंबर दो की हैसियत रखने वाले आरसीपी सिंह को पार्टी की कमान सौंपी गई. एलजेपी के नेताओं को जेडीयू में शामिल कराया गया. JDU के रणनीतिकारों ने अब उपेन्द्र कुशवाहा को अपने पाले में कर बड़ा दांव खेला है. JDU को उम्मीद है कि लव-कुश समीकरण बनने के बाद JDU बेहद मज़बूत हुआ है.

बिहार का जातीय समीकरण
भाजपा- सवर्ण, अति पिछड़ा,वैश्य, दलित और हिंदुत्व का वोट
JDU- लव कुश यानी कुर्मी कोईरी , अति पिछड़ा, मुस्लिम , सवर्ण
राजद- MY यानी मुस्लिम यादव, दलित वोटरों में थोड़ी से पैठ
कांग्रेस- सवर्ण, मुस्लिम
हम- दलित वोटर
VIP- मल्लाह, बिंद
माले-- दलित
MIM- मुस्लिम

बिहार की राजनीतिक दलों के जातीय समीकरण के बाद एक बार उपेंद्र कुशवाहा से बिहार में आए सियासी उतार चढ़ाव पर नजर डालते हैं. कुशवाहा ने 1985 में राजनेता के रूप में अपना करियर शुरू किया. 1985-88 तक युवा लोकदल के राज्य महासचिव रहें, और बाद में 1988-93 तक राष्ट्रीय महासचिव रहें.
1994 से 2002 तक समता पार्टी के महासचिव के रूप में काम किया. नवंबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में हार के बाद जदयू से अलग हुए. नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए. 2010 में विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा. 2010 से 2013 तक राज्यसभा के सदस्य रहे. 4 जनवरी 2013 को जेडीयू से अलग हो गए थे. तीन मार्च 2013 को रालोसपा नाम की अलग पार्टी बनाई. 10 दिसम्बर 2018 को लोकसभा चुनाव 2019 को सीट बंटवारे से नाखुश होकर केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दिया. 14 मार्च 2020 को 8 साल बाद रालोसपा का जेडीयू में विलय हो गया. अनुमान के मुताबिक, बिहार में कुर्मी की आबादी 2 से 3 प्रतिशत है वहीं कोइरी की आबादी 10 से 11 प्रतिशत है.

लोकसभा चुनाव 2014 में रालोसपा 3 सीट पर लड़ी थी, तीनों जीती थी. वोट प्रतिशत 0.2% था. लोकसभा चुनाव 2019 में रालोसपा 5 सीट पर लड़ी, सभी हारी. वोट प्रतिशत 0.2% था. 2014 लोकसभा चुनाव में RLSP को 14,62,518 वोट मिले थे, 2019 लोकसभा चुनाव में RLSP को 10,78,473 वोट ही मिले.

2015 विधानसभा चुनाव में RLSP 23 सीट पर लड़ी. पार्टी को सिर्फ दो सीटों पर जीत नसीब हुई. वोट प्रतिशत 2.6% रहा. पार्टी को कुल 9,76,787 वोट मिले. 2020 विधानसभा चुनाव में RLSP 99 सीट पर लड़ी. एक पर भी जीत नहीं मिली. वोट प्रतिशत 1.8 % रहा. पार्टी को कुल 7,44,221 वोट मिले.

इस पूरे समीकरण को अगर गौर से समझने की कोशिश करेंगे तो साफ है कि बड़ा वोट बैंक NDA के खड़ा है. वहीं आरजेडी अपने पुराने समीकरण में बंधा दिखती है और उसके सहयोगियों को मिला दे तो MY समीकरण के अलावे दलित जातियों का थोड़ा वोट बैंक खड़ा दिखता है.

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