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...जो CM नीतीश चाहते हैं वही कहते हैं प्रशांत किशोर, पढ़िए बिहार की सियासत की इनसाइड स्टोरी

News18 Bihar
Updated: January 15, 2020, 5:04 PM IST
...जो CM नीतीश चाहते हैं वही कहते हैं प्रशांत किशोर, पढ़िए बिहार की सियासत की इनसाइड स्टोरी
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ प्रशांत किशोर (फाइल फोटो)

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि CAA-NRC के मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सोची-समझी रणनीति के तहत अधिकतर समय तक खामोश रहे हैं. अब सवाल है कि आखिर आने वाले समय में क्या देख-सोच रहे हैं सीएम नीतीश, क्या है उनकी आगे की रणनीति?

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पटना. जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की तरफ से लगातार सीएए-एनआरसी के विरोध के बीच लंबे समय तक नीतीश कुमार (Nitish Kumar) इस मुद्दे पर खामोश रहे. लेकिन सोमवार को विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान नीतीश कुमार बोल पड़े और एनआरसी का कड़ा विरोध करते हुए दावा किया कि बिहार में ये लागू नहीं होगा. दरअसल एक दिन पहले ही प्रशांत किशोर ने ऐलान कर दिया था कि बिहार में एनआरसी और सीएए लागू नहीं होगा. जाहिर है इसके बाद सीएम नीतीश का बयान आने पर बिहार की सियासत में कहा जाने लगा है कि पीके, नीतीश की रणनीतिक मजबूरी भी हैं क्योंकि उन्हीं के जरिए नीतीश कई काम कर रहे हैं, जो वे चाहते हैं.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि CAA-NRC के मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सोची-समझी रणनीति के तहत अधिकतर समय तक खामोश रहे हैं. अब सवाल है कि आखिर आने वाले समय में क्या देख-सोच रहे हैं सीएम नीतीश, क्या है उनकी आगे की रणनीति?

अधिक से अधिक सीटों की दावेदारी
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेल्लारी कहते हैं कि सीएम नीतीश कुमार पॉलिटिक्स के माहिर खिलाड़ी हैं. पीके उतना ही बोलते हैं, जो सीएम नीतीश कुमार उन्हें बोलने को कहते हैं. एनआरसी और सीएए को लेकर पीके और नीतीश के बयान को मिलाकर देखें तो ये स्क्रिप्टेड है और एनडीए में अधिक से अधिक सीटों की दावेदारी के लिए है.

कन्हैया भेल्लारी इस बात को आधार बनाते हुए पुष्ट करते हैं कि एक तरफ पीके आक्रामक बयान देते हैं तो दूसरी ओर आरसीपी सिंह के नरम तेवर सामने हैं. ये संकेत ऐसे हैं जो राजनीति का कोई भी जानकार समझ सकता है कि ये नीतीश कुमार टाइप पॉलिटिक्स की ही अगली कड़ी है. वो बीजेपी के साथ भी रहना चाहते हैं और बारगेनिंग कर अधिक से अधिक सीटें पाना चाहते हैं.

दिल्ली चुनाव नतीजों का इंतजार
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा कहते हैं कि सीएम नीतीश कुमार दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों का इंतजार कर रहे हैं. इसमें अगर बीजेपी की हार होती है तो वे और भी हावी होंगे और बीजेपी को बैकफुट पर जाना पड़ेगा. ये भी साफ है कि दिल्ली चुनाव नतीजे अगर बीजेपी के पक्ष में रहे तो सीएम नीतीश कुमार अपनी अगली रणनीति उसी के अनुसार तय करेंगे.बकौल अशोक कुमार शर्मा, बीजेपी भी अपने तरीके से बारगेनिंग कर रही है. भाजपा नेता संजय पासवान और सच्चिदानंद राय के बयान को इन्हीं संदर्भों में देखा जाना चाहिए. नीतीश के विरोध के बाद भी अगर सच्चिदानंद राय कहते हैं कि पूरे देश में एनआरसी लागू होगा, तो यह एक रणनीति के तहत ही है. इसमें बीजेपी खुद को बारगेनिंग की स्थिति में रखना चाहती है और वो छोटा भाई बनने को फिलहाल तैयार नहीं दिखती है.

फिलहाल कमजोर पड़ी बीजेपी
हालांकि अशोक शर्मा ये भी कहते हैं कि दरअसल आज की स्थिति में बीजेपी कमजोर दिख रही है. महाराष्ट्र में शिवसेना का अलग होकर सरकार बना लेना उसके लिए बड़ा झटका रहा तो झारखंड की करारी हार ने एक तरह से उसकी साख को काफी नुकसान पहुंचाया है. वहीं हरियाणा में जेजेपी से गठबंधन करना भी कोई सुकूनदायक नहीं रहा है.

नीतीश कुमार हैं कॉमन फैक्टर
कन्हैया भेल्लारी कहते हैं कि बिहार की स्थिति भी एक तरह से स्पष्ट है कि नीतीश कुमार जिधर रहेंगे सरकार उसी पक्ष की बनेगी. दूसरा आज की तारीख में ये भी तय माना जा रहा है कि सीएम नीतीश आरजेडी के साथ नहीं जाने वाले हैं. हालांकि दिल्ली चुनाव के बाद ये काफी हद तक क्लीयर होगा कि अगर एनडीए में बात नहीं बनी तो क्या कांग्रेस के साथ जेडीयू की कुछ संभावनाएं बन सकती हैं अथवा नहीं.

ऐसे में यही कहा जा सकता है कि सीएम नीतीश फिलहाल अधिक से अधिक सीटों के लिए ही बीजेपी के साथ खेल रहे हैं और इसका चेहरा प्रशांत किशोर को बनाए हुए हैं. पीके का ही चेहरा है जो आने वाले समय में कांग्रेस के साथ भी नीतीश का समीकरण फिट कर सकते हैं. इसलिए जो पीके हैं, वही नीतीश हैं और जो नीतीश हैं वही पीके हैं.

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First published: January 15, 2020, 3:53 PM IST
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