नरम हिंदुत्व के साथ धर्मनिरपेक्ष छवि बनाए रखने की जद्दोजहद में नीतीश

राजनीति के चतुर खिलाड़ी रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नरम हिंदुत्व को अपनाते हुए धर्मनिरपेक्ष छवि बनाए रखने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

Alok Kumar | News18 Bihar
Updated: April 26, 2018, 5:39 PM IST
नरम हिंदुत्व के साथ धर्मनिरपेक्ष छवि बनाए रखने की जद्दोजहद में नीतीश
जानकी जन्मोत्सव में सीएम नीतीश कुमार (न्यूज18 फोटो)
Alok Kumar
Alok Kumar | News18 Bihar
Updated: April 26, 2018, 5:39 PM IST
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाए. पर राजनीति प्रयोग का दूसरा नाम है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश आज-कल ऐसा ही नया प्रयोग कर रहे हैं. उनकी राजनीति दोराहे पर है. भ्रष्टाचार के नाम पर लालू से अलग हुए. अब भाजपा से दोस्ती की दूसरी पारी निभानी है. लिहाजा नए तर्क ढूंढे जा रहे हैं.

भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता से समान दूरी नीतीश का नया नारा है. पर वास्तविकता में वो दुविधा में दिखाई देते हैं. 27 जुलाई 2017 को वो रातोंरात महागठबंधन से अलग हुए. भाजपा के साथ सरकार बनाई. फिर एनडीए में शामिल हुए. नीतीश भाजपा की गोद में बैठे या भाजपा उनकी गोद में बैठी, इस पर सियासी बहस थमी नहीं है. पर एक बात साफ है कि 2013 तक नीतीश के साथ 17 सालों का साथ निभाने वाली भाजपा का स्वरूप अलग है. ये संसद में 283 सदस्यों वाली भाजपा है. लिहाजा बिहार की पतवार भले नीतीश के हाथ हो लेकिन भाजपा की धमक सरकार में साफ सुनाई देती है.



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नीतीश भी राजनीति के चतुर खिलाड़ी रहे हैं. उनकी चुनौती भाजपा के साथ रहते अपनी पार्टी की बुनियाद बचाने की भी है. इस कोशिश में भाजपा के साथ मुठभेड़ भी लाजिमी है. नीतीश बड़ी चालाकी से भाजपा के कुछ तीर भी अपनी तरकश में सजाने की कोशिश कर रहे हैं.

हिंदूवादी नीतीश

नीतीश कुमार ने नरम हिंदुत्व को अपनाया है. वो भावनात्मक मुद्दों को राजनीतिक मुद्दा बनाने से परहेज नहीं कर रहे. गंगा की निर्मलता के मुद्दे को नीतीश ने जोर-शोर से उठाया. नमामि गंगे परियोजना के तहत नरेंद्र मोदी ने नीतीश की मांग मान ली. गंगा में गाद पर केंद्र सरकार खासा ध्यान दे रही है.

धार्मिक अनुष्ठानों में नीतीश की भागीदारी पहले कम दिखती थी. लेकिन नई सरकार के मुखिया के नाते अब उन्हें इससे परहेज नहीं है. पिछले साल सितंबर में आरा में रामानुज महाराज की 1000वीं जयंती पर महायज्ञ में नीतीश ने उपस्थिति दर्ज कराई. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत भी वहां पहुंचे थे. हालांकि दोनों के बीच मुलाकात नहीं हो पाई.
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इसके ठीक महीने भर बाद नीतीश कुमार ने सिमरिया महाकुंभ का उद्घाटन किया और संतों का आशीर्वाद प्राप्त किया. इस आयोजन में भाजपा का संगठन सक्रिय रहा लेकिन नीतीश ने सरकारी सुविधाओं की पोटली खोल श्रेय हथियाने की कोशिश भी की.

इसके बाद जनवरी में मोहन भागवत संघ के विस्तार के लिए दस दिनों के प्रवास पर बिहार में रहे. मुजफ्फरपुर में उन्होंने बयान दिया कि सेना को लड़ाई के लिए तैयार रहने में समय लगता है लेकिन जरूरत पड़ी तो संघ के लाखों स्वयंसेवक एक महीने में इसके लिए तैयार हो सकते हैं. तमाम विरोधी दलों ने भागवत को निशाने पर लिया. नीतीश की पार्टी भी सकते में थी. लेकिन जब सवाल नीतीश से पूछा गया तो जवाब साफ था – अगर कोई स्वयंसेवी संगठन देश की सीमा की रक्षा के लिए इस तरह तैयार है तो इसमें हर्ज क्या है?

नीतीश कुमार (पीटीआई फोटो)


अगली बारी थी विधानसभा के बजट सत्र की. इसमें कब्रिस्तानों की तर्ज पर मंदिरों की चहारदीवारी के लिए भी लगभग 400 करोड़ रूपए का आबंटन चर्चा में आ गया. लेकिन ये नीतीश का ऐसा वार था जिस पर विरोधी दल भी खुल कर सामने नहीं आ पाए. हां, नीतीश पर भाजपा के दबाव में काम करने का आरोप जरूर लगा.

नीतीश की अग्नि परीक्षा

नीतीश के नरम हिंदुत्व की परीक्षा रामनवमी के बाद नौ जिलों में हुई सांप्रदायिक हिंसा ने ली. नीतीश इसमें सफल रहे. चिंगारी भड़की जरूर लेकिन आग फैली नहीं. प्रशासन ने चुस्ती दिखाई. भाजपा के कई नेता गिरफ्तार किए गए. नीतीश ने संदेश दिया कि समाज को बांटने वाली राजनीति उन्हें बर्दाश्त नहीं होगी.

भाजपा और जेडीयू के बयानबहादुरों ने जल्दी ही मोर्चेबंदी की लेकिन नीतीश का संकल्प साफ था. वो अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बचाए रखना चाहते थे. पीएम मोदी ने चंपारण की धरती से ‘असामाजिक तत्वों’ के खिलाफ नीतीश की सख्ती की सराहना की. आखिर गठबंधन भी बचाना ही था और उसी के साथ दोनों दलों का तनाव भी समाप्त हो गया.

पर नीतीश इस दुविधा में रहे कि कहीं उन्हें हिंदू विरोधी न करार दिया जाए. खास कर मस्जिदों और मदरसों को हुए नुकसान के लिए सरकारी कोष से पैसा देने के फैसले पर वो घिरते दिखे. लेकिन एक सधे हुए राजनेता की तरह उन्होंने संकटकाल को पार किया. किसी भी संभावित ध्रुवीकरण से जेडीयू को होने वाले नुकसान की चिंता भी नीतीश को थी. नीतीश ने तनावग्रस्त इलाके में गुप्तेश्वर पांडे जैसे आला पुलिस अधिकारी को भेजा जिनकी चर्चा पुलिसिंग के अलावा ‘भक्त’ के रूप में होती है.

मंदिर की राजनीति

नीतीश कुमार ने तनाव काल बीत जाने के बाद एक बार फिर नरम हिंदुत्व की राह पकड़ी. भगवान राम की पत्नी सीता की जन्मस्थली सीतामढ़ी पर उन्होंने फोकस किया. उनकी पार्टी ने कहा कि राम मंदिर का मसला कोर्ट में है लेकिन सीता मंदिर के लिए कोई बाध्यता नहीं है.

खुद नीतीश कुमार ने जानकी नवमी के मौके पर सीतामढ़ी में भव्य सीता मंदिर बनाने की घोषणा की. नीतीश ने ही पहली बार दो साल पहले जानकी नवमी को राजकीय छुट्टी घोषित किया था. रामायण सर्किट से सीतामढ़ी को जोड़ने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है.

विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल नीतीश पर संघ की गोद में खेलने का आरोप लगा रही है. राजद का कहना है कि मंदिर से किस तरह का विकास होगा. पर नीतीश कुमार नए रास्ते पर ही चलेंगे. सुशासन और विकास उनकी राजनीति की धुरी रही है. अगर इसमें कोई कसर भी रह जाए पर धर्म की चासनी चुनावी राह आसान बना सकती है. ​
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